हम सिद्ध कर देंगे कि हमारा धर्म मानवता है और हमारे साथ जुड़ने का अर्थ दंगा और दरिद्रता नहीं समृधि है

एक बच्चा किसी पब्लिक स्कूल में दाखिला लेता है ताकि वह अंग्रेजी संस्कृति और भाषा सीखे ताकि वह अंग्रेज बन सके, एक बच्चा किसी संस्कृत विद्यालय में दाखिला लेता है ताकि वह संस्कृत सीखे और पंडित बने, एक बच्चा आर्मी स्कूल में दाखिला लेता है ताकि वह अच्छा सैनिक बने….. इस प्रकार हर माँ बाप कुछ न कुछ बनाने के लिए ही बच्चों को स्कूलों में भर्ती करवाते हैं |

ठीक इसी प्रकार धर्म, सम्प्रदाय और पंथ हैं | अपनी सुविधानुसार कोई भी एक धर्म या संप्रदाय या पंथ चुनता है ताकि वह मानवता को समझ सके और एक अच्छा मानव बन सके |

स्कूल से तो बच्चा उत्तीर्ण होकर बाहर आ जाता है और जो अनुत्तीर्ण हो जाते हैं वे पुनः प्रयास करते हैं | लेकिन धर्म सम्प्रदाय और पंथ वह भूलभुलैया सिद्ध होते हैं जो कभी भी व्यक्ति को बाहर नहीं निकलने देते और जीवन भर वह स्कूल का आईकार्ड और बस्ता और ड्रेस टाँगे घूमता रहता है और अंत में मरते समय भी यह सोचता है कि वह जो बनना चाहता था वह बनने के लिए और कितने जन्म लेने पड़ेंगे !

आप एक अच्छी नौकरी पाते हैं और समृद्ध होते हैं तो लोग जानना चाहते हैं कि आपने किस स्कूल से शिक्षा प्राप्त की ? ताकि वे भी अपने बच्चों को उसी स्कूल में दाखिला दिला सकें | लेकिन धर्म या सम्प्रदायों के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि हर सम्प्रदाय परधर्म निंदा पर ही जीवित है | अपने धर्म की कमियों को दूर करने में कोई रूचि नहीं है लेकिन दूसरों को सुधारने के लिए दिन रात एक किये बैठे हैं | कोई भी धर्म ऐसा नहीं जो अंपने धर्म या सम्प्रदाय के लोगों के विकास के लिए कोई कदम उठाता हो, लेकिन दूसरों को नष्ट करने के लिए करोड़ों रूपये खर्च कर देते हैं |

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उदाहरण के लिए अमेरिका को ही ले लीजिये | अपने देश के बेघरों को घर नहीं दिलवा पाता वह बेचारा, लेकिन हमारे देश के गरीबों के लिए दुनिया भर के मिशनरी भेज रखें हैं | क्योंकि वह जानता है कि भारतीय तो हिन्दू-मुस्लिम विवाद में उलझे रहेंगे और कभी भी इतना समय नहीं निकाल पायेंगे कि अपने देश के आदिवासियों या गरीबों के लिए कुछ कर पायें | यही अवसर है गरीबों और आदिवासियों को प्रेम से समझाया जाए कि ये दोनों धर्म केवल लड़ने-मरने वालों के लिए है | मानवता तो केवल हमारे ईसाई धर्म में ही है जो गरीबों के सुख दुःख में काम आता है | और यह समझाने के लिए उन लोगों को पादरी के रूप में चुनते हैं जिनमें सेवाभाव के जन्मजात गुण हों | वे सेवा करते समय यह न देखें सामने पीड़ित किस धर्म का है |

मैंने मणिपुर में देखा है कैसे पादरी गाँव के किसी बीमार के घर आधी रात को भी दौड़ कर जाता है पूरी दवाइयों के साथ और निःशुल्क दवाइयाँ उपलब्ध करवाता है | वह भी बिना यह पूछे कि पीड़ित किस धर्म का है | मैं भी उस समय उनकी सेवा भाव से इतना प्रभावित हुआ था कि तय कर लिया था कि मैं भी पादरी ही बनूँगा | मैं चर्च जाता था, उनके सारे भजन कंठस्थ होते थे मुझे उस समय, मेरी उम्र तब तेरह साल की ही थी, लेकिन मैंने कई मिशनरी संस्थाओं की सदस्यता ले रखी थी और वहाँ से निःशुल्क पुस्तकें व बाइबल की कहानियों की छोटी छोटी पुस्तिकाएँ आ जाया करती थी पोस्ट के द्वारा….

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अभी पिछले महीने एक महिला मुझ से मिलने आयीं जो कि मिशनरी स्कूल की प्रबंधक थीं और वह भी नन बनना चाहती थीं | लेकिन हमारे आश्रम के पूर्व गुरूजी स्वामी विनयानंद जी से मिलने के बाद उन्होंने उनसे ही दीक्षा ले ली और इसाई बनने का विचार त्याग दिया था | मुझसे जानना चाहती थीं कि क्या हम भी उनकी ही तरह ऐसा कुछ कर सकते हैं जिनसे गरीबों के लिए सहायता उपलब्ध करवाई जाए ? उतनी ही जितनी मिशनरी उपलब्ध करवाते हैं ? उनका मानना था कि ईसाई लोग जितना काम पूर्वी भारत के लोगों के लिए करते हैं सरकार या कोई और धर्म इतना करने की सोच भी नहीं सकता | उन्होंने स्वयं भी कई मिशनरी स्कूलों की स्थापना करवाईं और उनको सफलता पूर्वक चलाया भी |

मैंने कहा कि अभी तो मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि अपना ही खर्च निकाल पाऊं, किसी और के लिए कर पाना तो अभी असंभव है | लेकिन भविष्य में मैं ऐसा कर पाउँगा यह मेरा अंतर्मन कहता है | हमारे आश्रम के सन्यास का अर्थ भविष्य में सेवा ही होगा और मिशनरियों से अधिक सेवा प्रदान कर पायेंगे ऐसा विश्वास है | केवल अपने ही देश में ही नहीं, दूसरे देशों तक जाकर सेवा करेंगे वह भी बिना धर्म और जाति पूछे | हम सिद्ध कर देंगे कि हमारा धर्म मानवता है और हमारे साथ जुड़ने का अर्थ दंगा और दरिद्रता नहीं समृधि है | हम श्री रामकृष्ण मिशन की तरह ही आदर्श प्रस्तुत करेंगे न की दूसरों की तरह दूसरों की निंदा करके अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने का मूर्खतापूर्ण प्रयास करेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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