सन्यासियों को तो तामझाम से दूर भभूत लगाए, लंगोट डाले कहीं भीख माँगते बैठा होना चाहिए

My personal Room
मेरा निजी कक्ष 

यह है मेरा कमरा जो कि मुझे मिला था रहने के लिए | बाद में आश्रम के नियम के विरुद्ध कंप्यूटर ले लिया क्योंकि पिछले सौ सालों में यहाँ कंप्यूटर तो दूर टाइपराइटर भी नहीं लिया गया था | हज़ारों रूपये घूमने फिरने में खर्च कर देते थे यहाँ के अध्यक्ष और ट्रस्टी लेकिन आश्रम के विकास के लिए एक रूपये भी नहीं खर्च करते थे | जिसके भी पास पैसा आता वही घूमने निकल जाता था और आज भी यही नियम लागू है |

लेकिन मैंने नियम तोड़ा और यह सब तामझाम ले लिया यह कहकर कि यदि मुझे यह सब नहीं मिला तो वापस हरिद्वार चला जाऊँगा क्योंकि मुझे वहां यह सब मिला हुआ था | अध्यक्ष महोदय और ट्रस्टी तो नहीं माने लेकिन गाँव वालों ने दबाव बनाया तो हाँ तो कह दिया लेकिन किसी प्रकार की आर्थिक सहयोग देने में असमर्थता व्यक्त की | उन्होंने एक रूपये भी देने से मना कर दिया | लेकिन जब गाँव वालों का मानना था कि ईश्वर ने मुझे यहाँ लाया है, तो आर्थिक व्यवस्था भी ईश्वर ने करवा दी और जब उन्होंने मुझसे लैपटॉप भी वापस लेने की बात कही, तब चौबीस घंटे के अन्दर ही अनजान जगह पर इतने पैसों की व्यवस्था हो गयी कि मैं एक एडवान्स कंप्यूटर ले सकूँ | यह और बात है कि यह कंप्यूटर स्वयं ही असेम्बल किया ताकि कम खर्च में अपनी पसंद का कॉन्फिगुरेशन मिल जाये

बाद में बहुत भला बुरा सुनने मिला, खाना वाना घटिया देने लगे….लेकिन मैं डटा रहा बेशर्मों की तरह | क्योंकि मैं जानता था कि मुझे क्या करना है और कैसे करना है आश्रम और गाँव के हित के लिए |

आज कल सुनने में आ रहा है कि लोग कहने लगे हैं कि असली सन्यासी तो यही है |

अब आते हैं असल मुद्दे पर |

क्या सन्यासी मेरे जैसे होते हैं ? शायद नहीं |

क्योंकि सन्यासियों को तो तामझाम से दूर भभूत लगाए, लंगोट डाले कहीं भीख माँगते बैठा होना चाहिए | यहाँ भी यही नियम था कि सन्यासी यानि लाचार, मजबूर बेबस व्यक्ति जो आश्रम के अध्यक्ष और ट्रस्टियों की सेवा करे, मालिश करे, खाना बनाये, झाड़ू पोंछा करे और जो रुखा सुखा मिले खा लिया करे | सुबह उठाकर बीज मन्त्र का जाप करे और शाम को संकीर्तन | बस यही था इनका सन्यास धर्म |

नियम तोड़ दिए मैंने इसलिए सभी नाराज थे और अलग अलग तरीके से डराने की भी कोशिश की गयी ताकि डर से भाग जाऊं | कभी कोई फोन पर कहता था कि अपनी मर्जी से चले गए तो ठीक नहीं तो अर्थी में भेजेंगे लोग….. कोई फर्क नहीं पड़ा इस बेशर्म सन्यासी को | मेरे पास विकल्प खुले थे वापस हरिद्वार जाने के लिए क्योंकि वे बार बार वापस आने के लिए कह रहे थे क्योंकि मैं तो केवल दस दिन की कहकर आया था | लेकिन मैंने देखा कि यहाँ एक अध्यात्मिक वातावरण बनाया जा सकता है क्योंकि यहाँ सब कुछ अस्त व्यस्त था, जबकि हरिद्वार के आश्रम में अध्यात्मिक कोई चिंतन नहीं था | वहाँ तो शुद्ध व्यवसाय होता है |

सारी कठिनाइयों और अभावों के बाद भी खुश हूँ क्योंकि अब यही मेरा कर्म क्षेत्र है | एक दिन इसी आश्रम (जो कि आज खंडहर और उपेक्षित पड़ा हुआ है) को श्रेष्ठ अध्यात्मिक केंद्र के रूप स्थापित होता हुआ देखना चाहता हूँ | यहाँ गाँव के लोग भी आस लगाए बैठे हैं कि मैं कोई ऐसा काम करूँ ताकि आर्थिक रूप से भी सशक्त हो जाऊँ और अपने ही बल पर आश्रम को फिर से उठाने का प्रयास करूँ | लेकिन मैं जानता हूँ कि यह सब इतना आसान नहीं है और मेरा कोई करोड़पति भक्त भी नहीं है जो मुझे सहयोग दे और न ही कोई देशी या विदेशी भक्त जो सहयोग करे | मुझे कोई जल्दी नहीं है, लेकिन शरीर त्यागने से पहले हो जाए तो अच्छा है |-विशुद्ध चैतन्य

(नोट: इस पोस्ट को भी मेरे शुभचिंतक और ब्रम्हज्ञानी आत्मप्रशंसा और अन्यों की निंदा ही मानेंगे क्योंकि वे ब्रम्हज्ञान की दृष्टि से इस पोस्ट को पढ़ेंगे और समझेंगे | हो सकता है वे सही हों, चूँकि मैं ब्रम्हज्ञानी नहीं हूँ तो उनकी दूरदर्शिता मुझे नहीं समझ में आएगी | लेकिन जो भी हो यह सब कहने का मन हुआ तो कह दिया, बाकी आप लोगों को जो समझना है समझते रहें )

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