वे जो कुछ भी कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं

 तब हम बहुत छोटे थे करीब नौ दस वर्ष के जब हम दिल्ली पहुँचे | वहाँ जो हमारे लिए सबसे बड़ा आकर्षण बना वह था टेलीविजन | सन्डे सुबह बापा-पापा, और बच्चों के कई विभिन्न कार्टून फिल्म और शाम को फीचर फिल्म | फिर शुक्रवार को भी कोई न कोई फिल्म दिखाई जाती थी |

तो हम चारों भाई-बहन जब भी कोई फिल्म देख लेते, तो हफ्ते भर तक उसके डायलॉग, गाने, सीन आदि एक दूसरे को सुनाते रहते | बड़ा रोमांच होता था कि कैसे धर्मेन्द्र जलती हुई ट्रेन में हेमामालिनी और यात्रियों को बचाया, कैसे बसंती तांगा दौड़ा कर भागी…. फिर हीरो और विलेन की लड़ाई का रोमांच… पूरा हफ्ता निकल जाता इन सब पर चर्चा करते हुए | तो हमारी दुनिया उतने में ही सीमित रही कुछ समय तक, फिर पिताजी तोलोस्तोय, पुश्किन, प्रेमचंद आदि की किताबें लाने लगे तो हम उस पर व्यस्त हो गये |

समय आगे बढ़ा और हम बड़े हो गये और अब कोई इंजीनियरिंग ड्राइंग में खोया था तो कोई इलेक्ट्रोनिक्स फॉर यु और सर्किट डायग्राम में | कोई अपनी जॉब के कारण कई कई दिन घर से बाहर रहता तो कोई अपनी ट्रेनिंग के वजह से…. तो आपस में बातचीत का अवसर ही कम मिलता था और उस जमाने में मोबाइल फोन भी नहीं होते थे |

तो अब फिल्मों की बातें बेकार लगने लगी थी क्योंकि अब हम जान चुके थे कि यह सब एक्टिंग है और स्टंट भी हीरो नहीं कोई और करता है | अब यह भी समझ चुके थे कि ये कसरती शरीर भी इनके नहीं होते, किसी और के होते हैं…. एक दिन मेरा भाई किसी सार्वजनिक स्थल पर राजेश खन्ना को अपने बहुत पास से गुजरते हुए पाया, तो शाम को मुझे बताया कि भईया अरे उसकी हाईट तो बहुत ही कम है… फिल्मों में तो वह बहुत लम्बा लगता था | ईसी प्रकार जब मेरी नियमित भेंट फिल्म की महान हस्तियों से होने लगीं, तो उनके प्रति कोई क्रेज नहीं रह गया | बल्कि कई तो इतने बदतमीज निकले कि उनकी फिल्मे तो छोड़िये, शक्ल तक देखने का मन नहीं करता |

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इसी प्रकार हम सब समय समय पर किसी न किसी स्थिति में होते हैं और वही सर्वस्व लगता है | हमें लगता है कि बस वही दुनिया है और कोई दुनिया है ही नहीं | लेकिन जैसे जैसे हम परिपक्व होते जाते हैं, हमारी संकीर्णता मिटती जाती है और हम बड़े दायरे में सोचने लगते हैं | फिर हम सोचने लगते हैं कि किसी क्रिकेटर या किसी नेता-अभिनेता के व्यक्तिगत जीवन से हमें क्या लेना देना | फिर हम सोचने लगते हैं कि ये लोग जो कुछ कर रहे हैं, अपने लिए कर रहे, अपनी रूचि के अनुसार कर रहे हैं.. उसमें ये लोग महान कैसे हो गये ? क्रिकेट से न तो राष्ट्र का हित होता है और न ही जनता का कल्याण | लेकिन हम मरे जाते हैं उनके लिए | अभिनेताओं के व्यक्तिगत जीवन में रूचि लेने से न तो हमारा कोई लाभ होता है और न ही राष्ट्र का | नेताओं के जुमलेबाजी, बयानों और उपद्रवों से भी न तो हमारा कोई कल्याण होता है, न गाँवों का होता है, न राष्ट्र का.. ये सभी अपनी अपनी लड़ाई और उलझनों में उलझे होते हैं, राष्ट्र की समस्याओं में उपरोक्त किसी की कोई रुचि नहीं होती | फिर नेता यदि किसी ग्राम कि सेवा करने आएगा भी, तो इन्सान बनकर नहीं, बल्कि एक कमीशनखोर व्यापारी बनकर | एक सड़क भी पास करेगा तो अपना कमीशन पहले तय कर लेगा | चुनाव के लिए किसी को टिकट भी देगी कोई पार्टी तो कम से कम एक करोड़ का दक्षिणा पहले रखवा लेगी |

तो उपरोक्त सभी व्यक्तिगत स्वार्थों में उलझे हुए हैं, वे जो कुछ भी कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं | उनकी कुर्सी की लड़ाई हो, परिवार की लड़ाई हो, सभी उनका व्यकितगत विषय है, हम क्यों उन सब में उलझ जाते हैं ? हेमा मालिनीं समेट कितने संसद ऐसे हैं जिन्होंने जनकल्याण के लिए सांसदनिधि से एक रूपये भी खर्च नहीं किया | उन्हें पता ही नहीं चलता कि उन्हें जो पैसे दिए जाते हैं, उसे खर्च कहाँ करना है, क्योंकि उनकी दुनिया तो बिलकुल अलग होती है.. बस चुनावी मौसम में ही उन्हें पता चलता है कि दाल महँगी है या महँगाई डायन है, बाकी तो उन्हें पता ही नहीं चलता कि देश में कुछ लोग भूख से मर रहे हैं | कभी किसी फिल्म अभिनेता से बात करके देखिये (नाना पाटेकर को छोड़कर) … आपको पता चल जायेगा कि वे लोग अलग दुनिया में रहते हैं, जहाँ ऐश है, ऐय्याशी है, पैसा है… ये रोते-ढोते, भूखे लोग उनकी दुनिया से दिखाई नहीं देते |

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इसलिए अपनी सोच को व्यापक बनाइये, संकीर्णता से बाहर आइये, इन नेताओं, अभिनेताओं, क्रिकेटरों की जय जयकार में अपना कीमती समय मत व्यर्थ करिए… वे अपना कमा खा रहे हैं, वे अपने पैरों पर खड़े हैं….आप अपने पैरों की तरफ देखिये | कहीं जय जयकार करने के चक्कर में आपको यही पता न चले कि आपके पैरों के नीचे से जमीन ही खींच ली गयी है | कल आपके पास सिवाय गुलामों का जीवन जीने के कोई और विकल्प ही न बचे, कल आपकी आने वाली पीढ़ी यह न कहे कि हमारे पूर्वजों में कोई राष्ट्रभक्त नहीं था, जिसके कारण आज हम गुलामी का जीवन जी रहे हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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