आंखों के किनारे से झरते आंसू वह चाह कर भी रोक नहीं पा रहा था…

टेलीविजन के कैमरामैनों के लेंस बार बार उस बुजुर्ग के पास सिमट जाया करते. झक सफेद मूंछों वाले इस शख्स को ब्राजील के दूसरे मैचों में भी देखा गया था. हर बार वह वर्ल्ड कप की इस रिप्लिका के साथ मौजूद होता. लेकिन तब उसकी सूरत कुछ अलग हुआ करती थी. ब्राजील जीत रहा होता था, तो उसके चेहरे पर भी खुशी झलक रही होती.

 लेकिन सेमीफाइनल के इस मैच में सब कुछ बदला बदला था. आगे की पंक्ति में खड़ा यह शख्स समझ नहीं पा रहा था कि दुनिया की सबसे बड़ी फुटबॉल टीम को हुआ क्या है. आंखों के किनारे से झरते आंसू वह चाह कर भी रोक नहीं पा रहा था. उधर, निर्मम जर्मन टीम कभी मुलर, कभी क्लोजे, तो कभी खेदिरा के रूप में उस पर वज्रपात कर देती. वह वर्ल्ड कप की रिप्लिका कुछ और करीब भींच लेता.

पास खड़ी एक बच्ची जो उस बुजुर्ग की पोती है या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना पक्का है कि वह पीढ़ियों को जोड़ने वाली तीसरी कड़ी जरूर है. बीच की पीढ़ी मैदान पर तार तार हो रही थी और तीनों पीढ़ियां इस ऐतिहासिक विध्वंस की अनचाही गवाह बन रही थीं. आंसू कप्तान डाविड लुइस के भी निकल रहे थे, इस बुजुर्ग के भी और वैसी ही पीली जर्सी पहने उस बच्ची के भी.

खेल वह माध्यम है जो आदिकाल से समाज को जोड़ती आ रही है | खेल वह उर्जा है जो अदृश्य धागों से हमें जोड़ देती है | हम खिलाड़ी के साथ कब भावनात्मक रूप में बंध जाते हैं हमें पता ही नहीं चलता | पहले कबीलों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी और आज राष्ट्रों के बीच होती है | खेल में हार जीत राष्ट्र की हार जीत हो जाती है |

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लेकिन कुछ लोगों को लोगों की इस भावना को कुछ पैसों के लालच में बेच देते हैं | उनके लिए इन लोगों की भावना मात्र व्यवसाय बन कर रह जाता है | जैसे कि क्रिकेट में होता है कि राष्ट्र और नागरिकों की भावना व मानसम्मान ताक पर रख दिए जाते हैं और कुछ पैसों में बिक जाते हैं खिलाड़ी |

दुःख होता है जब सुनता हूँ कि खेल पहले से ही फिक्स था | दुःख होता है जब महान बल्लेबाजों को दो चार रन में आउट होते देखता हूँ | दुःख होता है यह सोच कर कि चंद रुपयों में कोई कैसे बिक जाता है ?

सौभाग्यशाली थे हम जब हमारे पास मेजर ध्यानचंद जैसे हॉकी प्लेयर थे, सौभाग्य शाली थे हम जब मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे धावक थे, सौभाग्य शाली थे हम जब सुनीलगावस्कर और कपिलदेव जैसे क्रिकेटर थे….पर आज वह बात कहाँ ? आज वह राष्ट्र भक्ति कहाँ ? आज वह संस्कार कहाँ ?

मैं ब्राजील को बधाई देना चाहता हूँ और कहना चाहता हूँ कि उनकी हार नहीं उनकी जीत हुई है | क्योंकि उनके पास इतने अच्छे खिलाड़ी और इतने संवेदनशील नागरिक तो हैं !

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