शिर्डी के साईं बाबा

हिन्दुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शिर्डी के साईं बाबा के खिलाफ विवादित बयान देते हुए उनकी पूजा का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि साईं बाबा की पूजा करना गलत है। उन्होंने साईं बाबा का मंदिर बनाने का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि साईं बाबा कोई भगवान नहीं है जो उनकी पूजा की जाए। आइए, जानें भक्तों की नजरों में साईं बाबा की क्या अहमियत है। उनकी दृष्टि में साईं बाबा का स्वरूप कैसा है। वे उन्हें हिंदू के रूप में देखते हैं या मुसलमान मानते हैं? या फिर केवल उनके प्रति श्रद्धाभक्ति उनके लिए मायने रखती है।

साईं बाबा, जिन्हें शिर्डी के साईंबाबा का ओहदा दिया गया है, वह एक भारतीय गुरु, योगी और फकीर थे। भक्त इन्हें संत मानते हैं। माना जाता है कि उनका जन्म महाराष्ट्र के पाथरी (पातरी) गांव में हुआ 28 सितंबर 1835 को हुआ था। जन्मतिथि को लेकर कुछ लोगों का मानना यह भी है कि उनका जन्म 27 सितंबर 1838 को तत्कालीन आंध्रप्रदेश के पथरी गांव में हुआ था। साईं के जन्म स्थान पाथरी (पातरी) में एक मंदिर बना है, जहां उनकी मूर्ति रखी हुई हैं। बताया जाता है कि यह उनका निवास स्थान है, जहां कुछ पुराने सामान, बर्तन और देवी-देवताओं की मूर्तियां भी रखी हुई हैं।

लोगों की मानें तो यही साईं बाबा का जन्म स्थान है। वे कहते हैं कि साईं के पिता का नाम गोविंद भाऊ और माता का नाम देवकी अम्मा था। कुछ लोग उनके पिता का नाम गंगाभाऊ बताते हैं और माता का नाम देवगिरी अम्मा। कुछ हिन्दू परिवारों में जन्म के समय तीन नाम रखे जाते थे, इसीलिए बीड़ इलाके में उनके माता-पिता को भगवंत राव और अनुसूइया अम्मा भी कहा जाता है। वे यजुर्वेदी ब्राह्मण होकर कश्यप गोत्र के थे। देवगिरी के कुल 5 बेटे थे और साईं (जिनका नाम पहले हरिबाबू भुसारी था) आपने माता-पिता के तीसरे पुत्र थे।

कहा जाता है कि साईं जिस इलाके में रहते थे वह हैदराबाद निजामशाही का ही एक हिस्सा था। उनकी राजशाही में मुस्लिमों के एक संगठन को रजाकार कहा जाता था, जो हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया करते थे। पांच बच्चों और गरीब माता-पिता के इस परिवार ने आखिरकार इस जगह को छोड़ने की ठानी और वहां से निकल पड़े। कहते हैं कि किसी नदी को पार करते समय नाव पलट जाने से इस दुर्घटना में उनके पिता की मौत हो गई। एक फकीर की मदद से पिता को छोड़ परिवार के सारे लोग बचा लिए गए। फिर बाद में उस फकीर ने ही सभी अंतिम कार्य संपन्न कराए और माता समेत पांचों बच्चों के भोजन की व्यवस्था की। बाद में देवगिरी के दो बच्चे काम की तलाश में हैदराबाद चले गए और दो बच्चों को लेकर देवगिरी अपनी मां के गांव चली गईं। वली फकीर साईं को अपने साथ ले गए। इस तरह उनका परिवार अस्त-व्यस्त हो गया। लोग बताते हैं कि सूफी वली फकीर ने ही उन्हें पाला और बाद में इस्लाम के प्रचारक रोशनशाह फकीर उन्हें लेकर अजमेर आ गए। इस तरह साईं वली फकीर के बाद रोशनशाह के साथी बन गए। लेकिन, उन्होंने किसी एक धर्म में आस्था को अस्वीकार करते हुए अपने पथ पर आगे निकल गए।

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कहा जाता है कि 16 वर्ष की उम्र में वह शिर्डी पहुंचे। उन्हें सिर्फ लोगों से ही नहीं, बल्कि जानवरों से भी प्यार था। कई बार तो ऐसा होता था कि वह खुद भूखे रहकर अपना भोजन दूसरों को खिला दिया करते थे। लोग मानते हैं कि एक भिक्षुक की तरह जीवन यापन करने वाला वह इंसान आज के समय में सबसे बड़ा धनवान है, क्योंकि उनके लाखों करोड़ों भक्त इस दुनिया में मौजूद हैं। वह एक नीम के पेड़ के नीचे ही अपना आसन जमाया करते और इतनी कम उम्र में साईं को पेड़ के नीचे ध्यान लगाए देख गांव के लोग हैरान भी थे। लोगों को आश्चर्य होता था कि इतना छोटा लड़का बिना सर्दी या गर्मी की परवाह किए कैसे इतनी कठिन तपस्या कर रहा है।

साईं बाबा गांव वालों के बीच अजीब कौतुहल का विषय बन चुके थे। कुछ लोग तो उन्हें पागल भी समझते थे और उनपर पत्थर तक फेंका करते थे। लोगों का मत है कि साईं बाबा शिर्डी में करीब 3 साल तक रहे, फिर करीब साल भर के लिए कहीं गायब हो गए और 1858 में हमेशा का लिए शिर्डी लौट आए। करीब 4-5 साल तक बाबा उस नीम के पेड़ के नीचे ही रहते और ज्यादातर समय शिर्डी के आसपास मौजूद जंगलों में भटकते रहते। वह अपना अधिकतर समय मेडिटेशन में गुजार दिया करते, जिस कारण लोगों के करीब आने का उन्हें वक्त नहीं मिलता था।

आखिरकार एक पुरानी मस्जिद के कोने में उन्हें रहने के लिए मनाया गया, वहीं वह एकांत में रहते और भीख मांगकर वह अपना पेट भरते थे। साल 1910 के बाद उनकी आस्था के किस्बासे मुंबई तक पहुंच चुके थे। इसके बाद उनके पास पहुंचने वालों का तांता लगने लगा और अब इन्हें अनोखी शक्तियों वाला अवतार बताया जाने लगा था। हालांकि वह तब भी अपना जीवन संन्यासी के तौर पर गुजारना पसंद करते और अपने अनुयायियों को आम जीवन जीने की प्रेरणा देते रहे। वह अपने अनुयायियों को प्यार से रहना, दूसरों की मदद करना औऱ बिना किसी भेद-भाव के लोगों से प्यार करना सिखाया।

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वहां वह एक जगह आग जलाया करते, जिसे ‘धुनी’ कहा जाता था और फिर उनके पास आनेवाले लोग जब जाने लगते ते वह इसके राख को ‘उधि’ कहकर उन्हें दिया करते थे। लोगों का विश्वास था कि उस राख में किसी भी दर्द-पीड़ा को दूर करने की क्षमता है। यहां तक कि लोकल हकीम के सामने इस राख से लोगों का इलाज किया जाता। अपने पास आनेवाले श्रद्धालुओं को हिन्दू धर्म और कुरान से जुड़ी धार्मिक बातें बताया करते थे साईं बाबा। वह हर धर्म के पर्व-त्यौहारों में शामिल होते और अपने पास आनेवाले लोगों के लिए प्रसाद के नाम पर भोजन की व्यवस्था स्वयं किया करते। धार्मिक गाने गाना और उस गाने पर झूमना उन्हें खूब भाता था।

भक्त और इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि जन्म स्थान और तिथि के सन्दर्भ में कोई भी विश्वनीय स्रोत मौजूद नहीं है। यह ज्ञात है कि उन्होंने काफ़ी समय मुस्लिम फकीरों संग व्यतीत किया, लेकिन माना जाता है कि उन्होंने किसी के साथ कोई भी व्यवहार धर्म के आधार पर नहीं किया।

वह अपने भक्तो से बहूत प्रेम करते थे और उनके साथ सभी त्यौहारों में शामिल होते और त्यौहार मनाते थे। वे हिन्दू भक्तों के साथ रामनवमी, दीपावाली और कृष्ण जन्माष्टमी और मुस्लिम भक्तों के साथ मुहर्रम और ईद मनाते थे। अपने जीवन में उन्होंने कई ऐसे चमत्कार किए हैं, जिसके कारण भक्तों के मन में अंतहीन श्रद्धाभक्ति मौजूद है आज भी। 15 अक्टूबर 1918 को साईं बाबा ने अपना देह त्याग दिया।

आज धर्म के ठेकेदारों के पेट में दर्द है क्योंकि इनके लिए धर्म का अर्थ है धन | आज इनके आँखों में खटकता है उनके नाम से चल रहे मंदिरों बढ़ते चढ़ावे और बढती भीड़ | आज ये लोग धर्म की दुहाई दे रहे हैं और किसे पूजना है और किसे नहीं सिखा रहे हैं…… लेकिन आज तक यही धर्म के ठेकेदार कैसे रहना है, कैसे व्यवहार करना है, कैसे सभी का सम्मान करना है, कैसे बड़ो और छोटों से व्यवहार करना है, नैतिकता, राष्ट्रीयता, भाषा का सम्मान, सदाचार…..जैसे व्यवहारिक धर्म भी लोगों को नहीं सिखा पाए | आज तक ये धर्म गुरु नफ़रत के बीज ही बोते आये और इसे प्रयास में रहे कि देश धर्म, जाति, प्रान्त के नाम पर आपस में लड़ते रहें और उनकी चिताओं में इनकी रोटियाँ सिंकती रहे |
मैं साईं का सम्मान करता हूँ कि कम से कम उनके अनुयाई आपस में तो नहीं लड़ते और न ही किसी दूसरे सम्प्रदाय से लड़ने जाते हैं | यही उदाहरण बहुत ही यह सिद्ध करने के लिए कि वे एक महान आत्मा थे और वे मानवता का पाठ पढ़ाते थे | उनके भक्तों से मेरा आग्रह है कि वे किसी और के मंदिरों में साईं को स्थापित करके उनका अपमान न करें और न ही अपमान करें किसी और देवी देवता के रूप में उन्हें चित्रित करके | ऐसा करके आप किसी और का नहीं, स्वयं साईं का अपमान कर रहे हैं | वे गुरु थे, पथ-प्रदर्शक थे और एक महान आत्मा थे | इसलिए उन्हें गुरु ही रहने दें ईश्वर न बनाएँ क्योंकि ईश्वर बनाकर पूजने का अर्थ होगा कि आप उनके दिखाए मार्ग पर चलने से बचना चाहते हैं | जैसे राम-कृष्ण को लोग ईश्वर बनाकर पूज रहे हैं लेकिन उनके आदर्शो को अपने जीवन में नहीं उतार पाए | ~विशुद्ध चैतन्य


#Sai Baba

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