जिनका विवेक जागृत नहीं है, वे घोड़ों से भयभीत हैं

काम, क्रोध, लोभ मोह से हर धार्मिक, ब्राह्मण-पुरोहित, साधू-संत इतने भयभीत क्यों रहते हैं, इतनी घृणा क्यों करते हैं, कभी सोचा आप लोगों ने ?

मैं बताता हूँ !

आपने महाभारत की तस्वीरें यदि देखी हों, तो उसमें अर्जुन का जो रथ श्रीकृष्ण चला रहे हैं, उसमें चार ही घोड़े दिखते हैं और किसी किसी तस्वीर में पाँचवाँ घोडा भी दिखाई देता है | वे पाँचो घोड़े और कोई नहीं, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ही हैं | रथ है हमारा शरीर, अर्जुन है हमारा मन, सारथि यानि श्रीकृष्ण है हमारा विवेक जो कई कलाओं में पारंगत है और कुरुक्षेत्र है यह संस्कार |

जिनका विवेक जागृत नहीं है, वे घोड़ों से भयभीत हैं क्योंकि घोड़ों को साधना हर किसी के बस की बात नहीं है | जो साध लेते हैं, उनके लिए ये ही घोड़े वरदान हो जाते हैं और जो नहीं साध पाते, उन्हें जमीन पर पटक देते हैं | यही कारण है कि बुद्धिमानों ने आसान विकल्प निकाला कि घोड़ों का ही त्याग कर दो, न रहेगा बाँस और न बजेगी बांसुरी | इसलिए वे साधू जो निर्वस्त्र रहते हैं, उनका लिंग-भंग कर दिया जाता है यानि लिंग की वह नस तोड़ दी जाती है, जिससे कामोत्तेजना के समय लिंग उत्तेजित हो जाता है | और फिर यह बताया जाता है कि उसने काम पर विजय प्राप्त कर ली और स्त्रियों को देखने के बाद भी उसके लिंग में कोई उत्तेजना नहीं होती | वास्तव में उन्होंने इन्द्रिय को नहीं जीता होता, बल्कि अप्राकृतिक रूप से नष्ट करने का प्रयास किया होता है |

तो ये सभी धार्मिक भयभीत हैं पाँचो घोड़ों से और उन्हें रथ से ही अलग कर देने की सलाह देते हैं | जबकि ये पांचो घोड़े आपके रथ को कुरुक्षेत्र के भयंकर युद्ध में सहयोगी होते हैं | लेकिन दुर्भाग्य से धार्मिकों ने इन चारों को अपना शत्रु मान लिया क्योंकि वे इन घोड़ों से कमजोर सिद्ध हुए | वे इनको अपनी इच्छानुसार नहीं हाँक पाते, बल्कि वे अपनी इच्छानुसार इनके रथ को लेकर दौड़ते हैं…. बस इसीलिए विद्वानों ने इनका बहिष्कार ही कर दिया |

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~विशुद्ध चैतन्य

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