समाज कहता है, पुजा करना धर्म है, टीका लगाना धर्म है, धर्म जैसे कोई मिलिट्री कि कवायद है….

“समाज के ढांचे में ढाला गया व्यक्ति आध्यात्मिक तो हो ही नहीं पाता, पाखंडी हो जाता है, हिपोक्रेट हो जाता है ! क्योंकि उसे हम जो बनाने कि कोशिश करते है वह बन नहीं पाता, फिर वह क्या करें ? फिर वह धोखा देना शुरू करता है कि मैं बन गया हूं ! भीतर से वह जानता है कि मैं नहीं बना हूं! भीतर से अपराध अनुभव करता है! लेकिन जीने के लिए चेहरे बनाने फिर जरुरी हो जाते है! वह कहता है, मैं बन गया हूं! भीतर रहता है अशांत, भीतर रहता है पाप और अपराध से घिरा हुआ, और जाकर मंदिर में पूजा करता है! जब वह पूजा करता है, अगर कोई उसके प्राणो में झांक सके, तो पूजा को छोड़ कर उसके प्राणो में सब कुछ हो सकता है पूजा उसके प्राणो में बिलकुल नहीं हो सकती! 

लेकिन सोशल कनफरमिटी, समाज कहता है, पुजा करना धर्म है, टीका लगाना धर्म है, धर्म जैसे कोई मिलिट्री कि कवायद है कि आप इस-इस तरह का काम कर लें तो आप धार्मिक हो जाएंगे ! धर्म के नाम पर समाज ने एक व्यवस्था बनाई हुई है ! उसके अनुकूल आप हो जाएं, आप धार्मिक हो गए ! जब कि आध्यात्मिक होने का मतलब ही यह है कि आपकी जो व्यक्तिगत चेतना है उसकी फलावरिंग हो, आपका जो व्यक्तिगत चेतना का फूल है वह खिले ! और आप जैसा आदमी इस दुनिया में कभी नहीं हुआ ! न राम आप जैसे थे, न बुद्ध आप जैसे, न महावीर आप जैसे !” —ओशो (भारत: समस्याएं व् समाधान)

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