१२ जून, १८५७ को रोहिणी (देवघर) में स्वतंत्रता का प्रथम शंखनाद गूंजा

२१ मार्च, १८५७ को बैरकपुर छावनी (बंगाल) के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया | अंग्रेज सार्जेंट ह्युम और लेफ्टिनेंट बॉब को भारत माता के चरणों में बलि देने (क़त्ल करने) के जुर्म में ८ अप्रैल, १८५७ को भारत माता के वीर सपूत मंगल पाण्डेय को अंग्रेजों ने अपनी सैनिक अदालत में प्रातः ५ बजे फाँसी पर लटका दिया |

बैरकपुर सैनिक विद्रोह और वीर मंगल  पाण्डेय की फाँसी की खबर जब रोहिणी (देवघर) स्थित देशी घुड़सवार सैनिक छावनी पहुँची तो १२ जून, १८५७  को रोहिणी (देवघर) में स्वतंत्रता का प्रथम शंखनाद गूंजा | रोहिणी छावनी के घुड़सवार सैनिकों ने विद्रोह कर दिया |

भारतीय सैनिकों कने हाथों में हथियार ले कर भारत माता की जय जयकार करते हुए तीन अंग्रेज सेनाधिकार जो उनके ऊपर तैनात थे, मेजर मेक्डोनाल्ड, लेफ्टिनेंट सर नॉर्मन लेजली तथा सहायक सर्जन डॉ० ग्राहम पर हमला कर दिया | इस हमले में लेफ्टिनेंट मारे गए और दो अंग्रेज घायल अवस्था में भागने में सफल हो गये | सैनिकों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया और समवेत स्वर में मुक्ति के गीत गाने लगे |

इस विद्रोह की सुचना अंग्रेजी सैनिकों के मुख्यालय भागलपुर पहुँची और वहाँ से तीन डिविजन अंग्रेजी फ़ौज रोहिणी आ गयी और सैनिक छावनी को चारों और से घेर लिया गया | १६ जून, १८५७ को सैनिक न्यायालय में विप्लवी सेना नायक वीर सलामत अली, वीर अमानत अली, वीर शेख हारो एवं अन्य हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों को विशाल आम वृक्ष की शाखाओं में लगे फाँसी के फंदों में हाथियों पर चढ़ा चढ़ा कर लटका दिया गया |

महामृत्यु के पूर्व इन देशभक्त क्रान्तिवीरों ने नमाज अदा की, धरती पर माथा टेका और सिंहनाद करते हुए कहा;

“आज ही के दिन, उस काले १६ जून, १७५७ को सत्तालोलुप मीरजाफ़र ने पाक क़ुरान शरीफ़ पर हाथ रख कर झूठी कसम खाई थी और वतनपरस्त नवाब सिराजुद्दौला के साथ गद्धारी की थी , उस कलंक को आज हम अपने लहू से धो रहें हैं | अलविदा !”

इस प्रकार, आजादी के परिंदों ने फाँसी के फंदे को चूम लिया और सदा के लिए अमर हो गये | अन्य भारतीय सैनिकों के साथ अंग्रेज फौजियों ने घोर अमानुषिक अत्याचार कर उनको भी मौत के घाट उतार दिया |

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इस विद्रोह को दबाने के क्रम में ६ मास तक अंग्रेजी सेना रोहिणी में ठहरी रही और उनका सारा राशन बन्दूक की नोंक पर रोहिणी के किसानों और व्यापारियों को देना पड़ा | जिस मैदान में गोरी फ़ौज ठहरी थी, उस स्थान पर बसा मोहल्ला आज ‘गोराडीह’ के नाम से जाना जाता है |  –बैकुंठ नाथ झा द्वारा लिखित पुस्तक: मातृ-बंधन मुक्ति-संग्राम में संथाल परगना से साभार 

“मेरा शत शत नमन हैं देश के उन सच्चे वीरों को | लेकिन दुःख इस बात का है कि उन वीरों को नहीं मालुम था, कि मीर जाफर के वंशज आज भी उनके बलिदान को कलंक लगायेंगे | फिर विदेशियों के साथ हाथ मिलाकर, देश को फिर से गिरवी रखने के लिए ऍफ़डीआई के समर्थन में नारे लगायेंगे |” -विशुद्ध चैतन्य 

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