विद्वान् लोग तो अंग्रेजी पढ़ते हैं और समझते हैं….

बहुत ही अजीब बात है ! कुछ लोग पोस्ट पढ़ते हैं तो यह देखते हैं कि मैंने उस पोस्ट को डेस्कटॉप पर लिखा है या मोबाइल फ़ोन पर | कुछ लोग पोस्ट को देखते हैं यह देखने के लिए कि ब्राह्मण के पक्ष में लिखा है या दलित के | कुछ लोग पोस्ट में यह ढूँढते हैं कि मैंने इस्लाम के विरुद्ध कुछ क्यों नहीं लिखा | कुछ लोग यह देखकर पोस्ट पढ़ते हैं कि मैं संस्कृत जानता हूँ या नहीं …..कुल मिलाकर पोस्ट समझने के लिए कोई नहीं पढ़ता | किसी को रूचि नहीं है पोस्ट में लिखे विषय से | सभी के अपने अपने चश्में हैं और उन चश्मों को उतारने के लिए कोई तैयार नहीं है |

वहीँ कई लोग ऐसे भी हैं जो पोस्ट को महत्वपूर्ण मानते हैं और चाहते हैं कि मैं हर पोस्ट को अंग्रेजी में भी लिखूं और नहीं तो कम से कम अपने विचारों को अंग्रेजी में अवश्य लिखूं ताकि दक्षिणभारत के मित्रों को वे शेयर कर सकें | कुछ बंगाल से जुड़े मित्र हैं तो वे भी अंग्रेजी में ही लिखने पर जोर दे रहें हैं |

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हो रहा है कि हिंदी भाषी आध्यात्मिक नहीं है और उनका आध्यात्म में कोई रूचि नहीं है | उन्होंने अपना अपना थैला ले रखा है और उस थैले के हिसाब से ही विषय को देखते और समझते हैं | जबकि अहिन्दी भाषी लोग विषय और विचारों को महत्व देते हैं | उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैंने पोस्ट डेस्कटॉप पर लिखा है या स्मार्टफोन  पर या सिम्बियन फोन पर |

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शायद यही कारण है कि ठाकुर दयानंद देव (१८८१-१९३७) ने केवल अंग्रेजी को ही चुना अपने विचारों को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए | शायद यही कारण है कि सारे बुद्धिजीवी अंग्रेजी ही पसंद करते हैं | शायद यही कारण है कि हिंदी गँवारों की भाषा मानी जाती है |

लेकिन मुझे न जाने क्यों विश्वास है कि सुलझे लोग अधिक होंगे हिंदी भाषियों में अंग्रेजी की तुलना में | और न भी हों तो कोई बात नहीं, हम तो अनपढ़ ही ठीक हैं | अंग्रेजी में लिखने लगा तो लोग मुझे भी विद्वान् समझ लेंगे और मैं नहीं चाहता कि लोग धोखा खाएँ | क्योंकि मैं जन्मजात ही विद्वान् नहीं हूँ और विद्वान् बनने का स्वप्न भी देखना मेरे लिए पाप है | बस विचार दिमाग में आते हैं वह लिख देता हूँ ताकि किसी अनपढ़ को समझ में आ जाए | विद्वान् लोग तो अंग्रेजी पढ़ते हैं और समझते हैं, मेरे विचार भला उनको कहाँ से समझ में आयेंगे ! ~विशुद्ध चैतन्य 

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