चाइनीज़ वस्तुओं का बहिष्कार एक नौटंकी

 
बेहतर है यह नौटंकी बंद कर दें, क्योंकि आपके आका चाइना को घर पर बुलाकर मेट्रो बनवा रहे हैं और आप लोग सड़कों में नौटंकी कर रहे हैं | यह नौटंकी बिलकुल वैसी ही नौटंकी है, जैसे २०१३ में महँगाई और एफडीआई के विरोध में की गयी थी, जैसे गौरक्षा के नाम पर की जा रही है, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर की जा रही है… ये केवल उत्पात है, न तो कोई राष्ट्रभक्ति है और न ही कोई राष्ट्रहित से सम्बंधित कार्य  |


सबसे पहले तो यह भ्रान्ति ही निकाल दीजिये अपने मन से कि आपके या किसी के विरोध करने से चाइना का माल बिकना बंद हो जाएगा… यदि इस देश के नागरिक और नेता इतने ही स्वाभिमानी होते, तो विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने वाला यह देश आज अपने ही देश के हथकरघा उद्योग को मिटटी में न मिला चुका होता, आज अपने देश के बुनकर भुखमरी के कागार में न पहुँच चुके होते | आज विदेशी पेंट शर्ट और बूट पहनकर लोग देशभक्ति न झाड रहे होते, आज चाइनीज़ मोबाइल से फेसबुक पर देशभक्ति न झाड रहे होते, बल्कि आज हम निर्यातक होते इन सब वस्तुओं के और वह भी अपने देश को समृद्ध करते हुए |

दूसरी बात यह कि निषेध से कभी भी कोई राह नहीं निकलती और न ही कोई उत्थान होता है.. जैसे ब्रहमचर्य के नाम पर स्त्री का निषेध करने वाले ब्रह्मचारी ही सबसे अधिक लम्पटता करते पकडे जाते हैं |

तीसरी बात यह कि निषेध करने की नौटंकी करने से बेहतर है, लोगों को यह बताइये कि उनके पास विकल्प क्या है… जैसे आप लोग मुझसे विकल्प माँगते फिरते हैं… लोगों को विकल्प दीजिये कि चाइनीज़ सामानों से बेहतर यह भारतीय सामान है और चाइना से सस्ता है क्योंकि स्वदेशी है |

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चौथी बात यह कि विरोध करना ही है, बहिष्कार करना ही है तो नौटंकी मत कीजिये, नागपुर जाइए और मेट्रो का जो कारखाना चीन के लिए बनाया जा रहा है, उसका विरोध करिए, सरकार से कहिये कि चाइना से जितने भी व्यापारिक सम्बन्ध हुए हैं, वे सम्बन्ध तोड़ दे, क्योंकि हम चाइना के सामानों का बहिष्कार कर रहे हैं | न तो भारत में चाइना कि बनी ट्रेन चलेगी, न मेट्रो, न मोबाइल, न घडी, न झाड़ू-पोंछा |

~विशुद्ध चैतन्य

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