सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं !

कई हज़ार साल पहले की बात है | दरोगा सिंह नाम का एक महान योद्धा एक गाँव में रहता था | उसने कई लड़ाइयाँ लड़ीं थी और किसी भी लड़ाई में उसे खरोंच तक नहीं आयी थी इसलिए हर कोई उसकी युद्ध कौशल की चर्चा करता था | उसने अपने आईफ़ोन से युद्ध क्षेत्र में संघर्ष करते हुए कई फोटो खींच रखी थी और उनमें से कई को फ्रेम करवा कर दीवारों पर भी लगा रखी थी | वे उस गाँव की शान हुआ करते थे | वे हमेशा कहा करते थे कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं |
एक दिन दूर किसी राज्य से एक योद्धा जंग बहादुर आ गया दरोगा सिंह को चुनौती देने | दूर दूर तक के गाँवों में मुनादी करवा दी गयी कि सभी लोग दरोगा सिंह और जंग बहादुर की ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा देखने के लिए उपस्थित हों | 
निश्चित तिथि को सभी एक बड़े मैदान में उपस्थित हुए और दोनों योद्धा भी पहुँच गए | लेकिन जब दरोगा सिंह और जंग बहादुर आमने सामने आये तो सभी आश्चर्य चकित रह गये | क्योंकि दरोगा सिंह खाली हाथ थे और उनकी ऐतिहासिक तलवार भी उनके हाथ में नहीं थी | सभी बोले कि बिना तलवार के सामना कैसे करेंगे दरोगा सिंह जी ? लेकिन दरोगा सिंह मुस्कुराते रहे और बोले मैंने अपनी तलवार सुरक्षित रखी हुई है और सत्य केवल परेशान हो सकता है, परास्त नहीं | इसलिए जीत तो मेरी ही होगी |
प्रतिस्पर्धा आरंभ करने का शंख नाद हुआ और दोनों योद्धा एक दूसरे के ओर बढ़ने लगे | जंग बहादुर के हाथ में तलवार थी जिसे लिए वह दरोगा सिंह की ओर बढ़ा | दरोगा सिंह बोले, “तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते | क्योंकि मेरे पास तुम्हारी तलवार से भी
मजबूत तलवार है | मेरे पास कई प्रमाणपत्र हैं वीरता के….”
अभी दरोगा सिंह यही सब गिना रहे था कि जंग बहादुर ने उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी | –विशुद्ध चैतन्य  

“कथा सार: सत्य हमेशा जीतता है, यदि सत्य की सार्थकता तथा कब और कहाँ प्रयोग करना है का ज्ञान हो !”

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