मैं बहुत ही स्वार्थी व्यक्ति हूँ

पच्चीस वर्ष की आयु तक इस आशा में दौड़ा कि खूब धन कमाऊंगा, परिवार बसाऊंगा, शोहरत कमाऊंगा, ऑस्कर जीतूँगा……लेकिन पच्चीसवें वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते समझ में आया कि मैं भेड़चाल में दौड़ रहा हूँ | जो कुछ कमाने की बात सोच रहा था, वह सब तो मेरा है ही नहीं दूसरों का है | धन कमाऊंगा तो वह भी पराया ही है, नाम कमाऊंगा तो वह भी पराया ही है, शोहरत, परिवार.. सभी गैर ही हैं, मेरा अपना तो कभी होना नहीं है | एक बार इन जंजालों में फंस गया तो आजीवन कोल्हू का बैल बनकर रह जाऊँगा, आजीवन गुलाम बन जाऊंगा दूसरों का |स्वतंत्रता छीन ली जायेगी, दूसरों को खुश करने के लिए स्वयं की खुशियों को बलिदान करना पड़ेगा…. नहीं यह मेरे लिए संभव नहीं था | क्योंकि तब तक मैंने स्वयं को जान लिया था, स्वयं से पहचान हो चुकी थी और जाना कि मैं बहुत ही स्वार्थी व्यक्ति हूँ | अपनी स्वतंत्रता, अपनी प्रसन्नता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता हूँ | मैं दूसरों के दिखाए मार्ग पर नहीं चल सकता, मैं दूसरों जैसा नहीं बन सकता क्योंकि ईश्वर ने मुझे मौलिकता प्रदान की है, ईश्वर ने मेरा मार्ग मुझे दे रखा है, ईश्वर ने मुझे मेरी अपनी ही पहचान दी है… तो मैं दूसरों की तरह क्यों बनूँ ?

उसके बाद न नौकरी में मन लगा, न कमाने में | न ही स्त्रियों में कोई रूचि रही और न ही प्रेम-प्यार, विवाह बच्चों में | ये सभी गैर लगने लगे…दुनिया में स्वयं को बिलकुल अकेला अनाथ महसूस करने लगा | दोस्त भी मिले तो मतलब के मिले… सबकुछ त्याग दिया | यहाँ कोई भ्रमित न हों, मैंने विवाह नहीं किया था, इसलिए गौतम बुद्ध की तरह किसी को छोड़कर नहीं भागा था | और न ही कोई प्रेमिका ही थी, क्योंकि शक्ल ही ऐसी नहीं थी कि कोई लड़की आकर्षित होती और न ही कोई अच्छा बैंक बेलेंस था |

READ  असली मूल निवासी कौन है ?

तो परिवार ने मुझे त्याग दिया मैंने सबकुछ त्याग दिया | अब त्याग कहना भी गलत है, क्योंकि जो मेरा था ही नहीं, उसे त्याग कैसे सकता हूँ ? और जो मेरा अपना है, उसे कोई और कैसे ले सकता है ?

आज मैं और मेरी जीवन संगनी यानि मेरी तन्हाई साथ हैं, मेरे पाँचों सेवक यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार मेरे साथ हैं और यही आजीवन मेरे साथ रहेंगे क्योंकि इन्होने बुरे वक्त में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा था | ~ विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of