गुरु की तलाश

लल्लन पनवाड़ी एक दिन अपनी दूकान बाद करके सुबह सुबह निकल पड़ा | लोगों ने पूछा, “अरे लल्लन, आज सुबह सुबह दुकान खोलने की जगह बंद करके कहाँ निकल रहे हो ?”

“रात सपने में भगवानजी आये थे | बोले कि जब तक गुरु नहीं बनाओगे किसी को तब तक तुम्हारा उद्धार नहीं होगा | बस इसलिए दूकान आया था गल्ले से पैसे निकालने और अब निकल रहा हूँ गुरु की तलाश में |” लल्लन ने उत्तर दिया |

गाँव वालों ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना और निकल गया |

दिन भर चलने एक बाद उसे पेड़ के नीचे तीन लोग बैठे मिले | उसने उनसे पूछा, “क्या आप लोग बता सकते हैं कि गुरु कहाँ मिलेगा ?”

“अरे भाई हम लोग भी गुरु की तलाश में ही भटक रहें हैं कई महीनों से | आज तक एक भी गुरु नहीं मिला |” उनमें से एक बोला |

“आओ तुम भी आ जाओ, साथ ही ढूंढते हैं गुरु को |” दूसरा बोला |

लल्लन उनके पास पेड़ की छाँव में बैठ गया सुस्ताने को |

“एक बात बताओ भाई, कैसा गुरु तलाश रहे हो आप ?” तीसरा बोला |

“भाई मुझे तो ज्यादा जानकारी नहीं है गुरु के बारे में | लेकिन माँ कहा करती थी कि गुरु के लम्बी दाढ़ी और बाल होते हैं और हाथ में लाठी लिए रहता है |” लल्लन ने भोलेपन से उत्तर दिया |

“भाई मुझे तो पक्का पता है कि गुरु कैसा होता है | गुरु गंजा होता है और सफ़ेद रंग का गाउन पहने रहता है |” दूसरा बोला |

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अरे नहीं भाई गुरु कुछ पहने या न पहने महत्वपूर्ण नहीं होता, पर गुरु बहुत ही ज्ञानी होता है और उसके पास ढेर सारी किताबें होती हैं | वह शुद्ध ब्राम्हण होता है और केवल दूध और रोटी ही खाता है |

लल्लन सोच में पड़ गया कि गाँव से निकलने से पहले किसी बुजुर्ग से पूछ लेना चाहिए था कि गुरु कैसा होता है |

थोड़ी देर सुस्ताने के बाद चारों निकल पड़े गुरु की खोज में | चलते चलते वे एक पहाड़ पर पहुँचे | वहाँ उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा आदमी एक कुटिया के पास ध्यान में बैठा हुआ है | चारों को पक्का हो गया कि यही गुरु है |

वे उस बुजुर्ग के पैरों के पास बैठ गए और हाथ जोड़ कर बोले गुरूजी हमें अपना शिष्य बना लीजिये |

बुजुर्ग ने आँख खोली और चारों को देखा, “गुरूजी…? कौन गुरूजी ? मैं तो खुद गुरु की तलाश में निकला था आज साठ पैंसठ साल पहले | आज तक तो मिला नहीं | जब मुझे ही गुरु नहीं मिला तो मैं किसी का गुरु कैसे बन सकता हूँ ?”

चारों एक दूसरे की शक्ल देखने लगे | “लेकिन बाबा आपको गुरु क्यों नहीं मिला ?” लल्लन ने पूछा |

बेटा क्या बताऊं ! कई जगह भटका, कईयों की सेवा की लेकिन सभी में कोई न कोई खोट निकल ही आया और पता चला कि वह गुरु बनने लायक नहीं है | बस अब कहीं चलने फिरने लायक रहा नहीं तो यहीं बैठ कर ध्यान तप कर लेता हूँ |” बुजुर्ग बोला |

लेकिन बाबा ऐसा क्यों कि आपको गुरु नहीं मिला ? किस तरह का गुरु तलाश रहे थे आप | लल्लन ने फिर प्रश्न किया |

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“देखो बेटा, गुरु तो गुरु की तरह ही होना चाहिए न ! विद्वान् हो, गुनी हो, ब्रम्हचारी हो, मांस-मदिरा से दूर रहने वाला हो, झूठ न बोलता हो, चोरी न करता हो, गाली न देता हो, काम क्रोध लोभ मोह से मुक्त हो, जिसे न गर्मी लगे न ठण्ड लगे हर मौसम में लँगोट में रहता हो, काँटों के बिस्तर पर सोता हो…..”

“अरे बाप रे !!! इतने सारे गुण होते है एक गुरु में ?” चारों एक साथ बोले |

“क्या आपको एक भी नहीं मिला ऐसा ?” एक बोला |

“नहीं मिले तो बहुत थे लेकिन सभी में एक न एक बुराई तो मिली ही मुझे | किसी में सभी गुण थे तो लंगोट नहीं पहनता था वीआईपी के अंडरवियर पहनता था | कोई बहुत ज्ञानी था तो खाना बनाना नहीं जानता था…”

“खाना बनाना ?” चारों फिर चौंके | खाना बनाने से क्या मतलब ?”

“अरे भाई अगर गुरु है तो खाना बनाना तो आना चाहिए न ? जिस गुरु को खाना बनाना और कपड़े धोना भी नहीं आता तो काहे का गुरु ?” बुजुर्ग आँखे तरेर कर बोला |

“फिर ? फिर मिला आपको कोई ऐसा गुरु जो खाना बनाना और कपड़े धोना भी जानता हो ?” लल्लन ने कौतुहल पूर्वक पूछा |

“हाँ मिला था | बहुत ही भला गुरु था वह | मेरे भी सारे कपड़े वही धोता था |” बुजुर्ग गहरी साँस लेते हुए बोला |

“फिर आपने क्यों नहीं बनाया उसे अपना गुरु ?” चारों ने एक साथ पूछा |

“अरे उसमें सब ठीक था, बस एक बुराई थी उसमें इसलिए नहीं बनाया उसे गुरु |” बुजुर्ग बोला

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“कौन सी बुराई ?” लल्लन पूछा |

“उसे माधुरी दीक्षित बहुत पसंद थी | उसका बड़ा सा पोस्टर उसने अपने कमरे में लगा रखा था |” बुजुर्ग ने बुरा सा मुंह बनाकर बोला |

“बहुत बुरी बात !” बहुत बुरी बात !! चारों बोले |

“क्या वह पूजा पाठ नहीं करता था ?” पहले ने पूछा |

“अरे पूजा पाठ करने वाला तो मैं उसके जैसा कोई देखा ही नहीं | लेकिन मुझे माधुरी पसंद नहीं है, मुझे तो करीना कपूर पसंद है | बस इसलिए उसे गुरु नहीं बनाया |” बुजुर्ग ने लम्बी आह भरते हुए अपनी आँखें बंद कर ली |

चारों अपना सर पकड़ कर वहीँ बैठ गए | -विशुद्ध चैतन्य

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