सनातन मवेशी


कई हज़ार साल पुरानी बात है | राजस्थान के घने रेगिस्तान के जंगल में एक गाँव होता था और आज भी है | उनके पास ढेर सारी मवेशियाँ थी इसलिए उन्हें दूध दही की कोई कमी नहीं थी | मवेशियाँ दिन भर जंगल में चरतीं और शाम को लौट आती अपने आप इसलिए उनके खाने पीने की चिंता भी नहीं करनी पड़ती थी | कुछ को जंगली जानवर अपना शिकार बना लेते थे तो भी गाँव वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मवेशियों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें पता ही नहीं चलता की कोई कम भी हो गया | शाम को जब वे लौटती तब सभी अपने अपने बर्तन लेकर उनकी प्रतीक्षा करते हुए पाए जाते | दूध दुहकर फिर वे भूल जाते उन्हें |

अक्सर मवेशी जंगल में बैठ कर बातें करते की न तो ये लोग हमारे लिए कोई हॉस्पिटल बनवाते हैं, न ही इलाज करवाते हैं और न ही जंगली जानवरों से हमारी रक्षा करते हैं, तो इनको हम दूध क्यों देते हैं ?

लेकिन बुजुर्ग मवेशी कहते की दूध दान करना हमारा धर्म है, इसी से हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी |

एक दिन अचानक ऐसा हुआ कि आधे से भी कम मवेशियाँ लौटीं, दूध से नहाना तो दूर चाय बनाने तक लिए दूध बचाना कठिन हो गया था | गाँव में सभा बुलाई गई कि सभी लोग आज जाकर पता करते हैं की कौन सा ऐसा जानवर आ गया है जो इतनी तेजी से हमारे मवेशियों को मार रहा है ? तो सभी सज-धज कर जंगल के भीतर गए | जंगल में जितनी दूर तक जा सकते थे गए लेकिन शाम हो जाने के कारण वापस लौट आये |

इस तरह कई दिन तक जंगल में जाते और ढूंढ कर आ जाते |सारा जंगल छान मारा लेकिन ऐसा कोई जंगली जानवर नहीं मिला जो अकारण मवेशियों को मारता हो | भेड़िया मिला था लेकिन वह तो केवल अपने भोजन के लिए ही शिकार करता है न की आतंकवाद फ़ैलाने के लिए | गीदड़ मिले तो वे भी केवल अपने भोजन के लिए ही शिकार करते हैं न की साम्प्रदायिकता फैलाने के लिए | इस प्रकार कहीं भी कोई ऐसा जानवर नहीं मिला जिसने अकारण किसी मवेशी को मारा हो या जमाखोरी के उद्देश्य से मारा हो | सभी बहुत ही चिंता में पड़ गये की सब गए तो गए कहाँ ?

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एक दिन ढूंढते ढूंढते वे जंगल पार निकल गये और एक दूसरी बस्ती में पहुँच गए | वहाँ जाकर उन्होंने पीने के लिए पानी माँगा और अपनी विपदा भी बताई | गाँव वालों से ही पता चला कि उनके मवेशियों के साथ कुछ और मवेशियाँ भी आ गईं थी और उनके गले में पड़े पट्टे से ही पता चला कि वे किसी और की मवेशियाँ हैं | हमने सोचा की जब कोई आएगा खोजता हुआ तो सौंप देंगे | चलिए अच्छा है आप लोग आ गये तो ले जाइए अपनी मवेशियाँ |

अब तो इनकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा | ख़ुशी ख़ुशी वे लोग अपनी मवेशी लेने पहुँचे तो देखा कि एक डॉक्टर वहाँ मवेशियों का इलाज कर रहा है और कुछ उनको नहला धुला रहा है….कुछ लठैत वहाँ पशुओं की रक्षा के लिए तैनात हैं |

उन्हें बहुत ही आश्चर्य हुआ की ऐसा भी कहीं होता है भला | मवेशियों को डॉक्टर और नहलाने धुलाने वालों की क्या आवश्यकता ? वे तो खुद ही नहा-धो लेती हैं और बीमार पड़ कर मर भी गईं तो क्या फर्क पड़ता है, इतनी सारी और मवेशियां भी तो हैं | लेकिन उस गाँव के लोग तो ऐसा ही करते थे |

उन्होंने मवेशियों को वापस ले जाने की बहुत प्रयास किया लेकिन वे साथ चलने को तैयार ही नहीं हुईं | आखिर खाली हाथ उन्हें वापस लौटना पड़ा | गाँव लौट कर सभी को यह बात बताई की मवेशियाँ गद्दार हो गयीं हैं उन्हें बहकाया गया है, लालच दिया गया है…. वे कायर निकलीं अपने गाँव को छोड़ वे दूसरे गाँव के लोगों से जा मिलीं….आदि इत्यादि |

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बची हुई मवेशियों ने सुना तो उन्होंने भी माना की उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था | वे लालची निकली, अपने सुख को ही महत्व देने लगीं वे.. | लेकिन अगले दिन कुछ और मवेशियां नहीं लौटी |

अब गाँव वालों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मवेशियां खतरे में हैं उन्हें अपने गाँव से गद्धारी करने के लिए उकसाया जा रहा है, बहकाया जा रहा है | आज हमारी सनातन मवेशीयां खतरे में हैं….और उस गाँव के लिए दुष्प्रचार शुरू कर दिया तो यही एक परंपरा बन गई | वह गाँव अपने मवेशियों की सभी सुख सुविधाओं का ध्यान रखता था तो मवेशी भी उन्हें खूब दूध देती थीं | परिणाम हुआ की वे अमीर होते चले गए | उन्होंने दूध से कई नए उत्पाद बनाये और अन्य गाँवों में बेचना शुरू कर दिया | अपने बच्चों को वे मवेशियों से प्रेम करना व उनकी सेवा करना सिखाते थे इसलिए वे अच्छे अच्छे डॉक्टर व वैज्ञानिक बने |

जबकि पहले गाँव में आज भी सनातन मवेशी की राजनीति होती है लेकिन मवेशियों पर कोई ध्यान नहीं देता | उनके बच्चे सम्पना देखते की बड़े होकर वे भी दूसरे गाँव जायेंगे और अच्छे डॉक्टर बनेंगे, इंजिनियर बनेंगे… लेकिन जब वे उस गाँव में पहुँचते और सुख सुविधा देखते तो फिर वापस लौटने का विचार बदल देते और वहीँ बस जाते | इस गाँव के माँ-बाप भी बच्चों को अपने गाँव में रखने से अधिक दूसरे गाँव में भेजने के लिए उत्सुक रहते | दूसरे गाँवों में इलाज के लिए जाते हैं, वहाँ से समान खरीदते हैं, उन्हीं के बनाये कपड़े पहनते हैं, उन्हीं की नकल करते हैं और स्वयम को विकसित समझते हैं | जबकि वे नहीं जानते कि यदि वे अपने ही गाँव और मवेशियों का ध्यान रखें तो किसी को रोकने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, कोई जाना ही नहीं चाहेगा | यदि अपने ही गाँव तरक्की करे को कौन ऐसा होगा जो कहीं और जाना चाहेगा ?

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वह दिन है और आज का दिन, वे एक ही राग अलाप रहें हैं कि हमारी सनातन मवेशी खतरे में हैं और उसकी रक्षा के लिए हमें एक जुट होना चाहिए, उनके उत्पादों का बहिष्कार करो… उनके त्योहारों का बहिष्कार करो… आदि इत्यादि | वे जंगली जानवरों के शिकार के कारण शहीद हुई मवेशियों की तस्वीरे दिखा कर फेसबुक पर उनकी बहादुरी के किस्से सुनाते | दूसरे गाँव वालों की निंदा के गीत गाते उनके मवेशियों में फूट डलवाने की कोशिश करते |

हज़ारों साल से जिन खोये मवेशियों की चिंता नहीं की अब उनके अवशेष ढूँढने जंगल में भटकते और उनके ऊँचे से ऊँचे स्मारक बनवाते |

लेकिन आज भी जंगली जानवरों से सुरक्षा का कोई उपाय नहीं किया और न ही कभी अपने मवेशियों की सुख-दुःख की कभी कोई चिंता की | बस उनकी चिंता है जो दान मिल रहा था उसे घटने से कैसे रोका जाए | –विशुद्ध चैतन्य

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