नास्तिक-आस्तिक

आधुनिक पढ़े-लिखे नास्तिकों में वेलेंटाइन डे सम्मानित है, लेकिन होली पाखंड |

Teacher’s-Day सम्मानित है, लेकिन गुरु-पूर्णिमा पाखंड |

Women’s-Day सम्मानित है, लेकिन करवा-चौथ पाखंड |

इसी प्रकार से ऐसी कई बातें हैं जो पाखंड, ढोंग दिखाई देती हैं उन्हें जो आत्मिक जगत से दूर हो जाते हैं, लेकिन उसी को नए रूप में अंग्रेजी नाम देकर स्वयं मनाते भी हैं | बस अंतर केवल इतना हो जाता है कि नास्तिकों के पर्व आस्तिकों के पर्व मनाने की विधि के बिलकुल विपरीत होती है | कल कोई ऐसे पर्व का विरोध करेंगे ये लोग जिसमें दान या जकात देना अनिवार्य होता है, तो इनका पर्व बन जाएगा उसी के विपरीत कि दान या जकात लेना अनिवार्य होगा |
कोई स्वयं को नास्तिक दिखाने के लिए सिंदूर और मंगलसूत्र का विरोध करेगा, तो कोई पूजा-पाठ कर्मकांडों का | और ये विरोध करना भी और कुछ नहीं एक पाखंड ही है, ढोंग ही है | क्योंकि जो नास्तिक होगा उसे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि कोई पूजा करता है या नहीं करता, कोई सिंदूर लगता है या नहीं लगाता…..

इसी प्रकार जो आस्तिक होगा, उसे भी इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा | वह सहज भाव से शामिल हो जाएगा उन सभी की प्रसन्नता के लिए उन उत्सवों में जिसे सभी मिलकर ख़ुशी से मना रहे हैं | फिर वह दिवाली हो, होली हो, ईद हो, क्रिसमस हो…. उसे कोई अंतर नहीं पड़ता | क्योंकि आस्तिक जानता है कि केवल ईश्वर सर्वस्व है, हर भाव, प्रेम ईश्वर का ही गुण है | न तो आस्तिक को किसी की मान्यताओं और परम्पराओं से कोई बैर होगा और न ही नास्तिक हो….हाँ इन दोनों का ही बैर होगा उनसे जो धर्म और सम्प्रदाय को आपस में फूट डालने, नफरत फैलाने का जरिया बना रखे हैं | इन दोनों का ही बैर होगा ऐसी कुप्रथाओं से, जिनसे समाज व परिवार को हानि होती हो | वरना तो नास्तिक और आस्तिक में केवल इतना ही अंतर है कि एक ईश्वर को नकारता है और दूसरा स्वीकारता है |

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दोनों ही कोई भी परम्परा या आडम्बर को ढोने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि दोनों ही आगे बढ़ना चाहते हैं, दोनों ही जानते हैं कि जीवन का अर्थ ही गति है, जहाँ ठहराओ आ जाये, वहीँ जीवन समाप्त | तो निरुद्देश्य अकारण ढोई जा रही परम्पराओं और रस्मों रिवाजों से वे स्वयं को मुक्त रखना चाहते हैं, ताकि वे आगे बढ़ सकें, लेकिन वे किसी के विरोधी नहीं हैं | वे किसी की मान्यताओं व भावनाओं का अपमान नहीं करेंगे | लेकिन वे यह भी नहीं चाहेंगे कि कोई उनपर अपनी मान्यताएं, परम्पराएं थोपे |

और जो विरोध करते हैं, वे न तो आस्तिक हैं और न ही नास्तिक…. वे केवल धर्मभीरु हैं, सांप्रदायिक हैं, उनका अपना एक सम्प्रदाय है जिसे वे श्रेष्ठ मानते हैं और बाकियों को निकृष्ट या मूर्ख | ~विशुद्ध चैतन्य

भारतीय नारी-सैनिक सीमा पर भी अपने दायित्वों को निभाते हुए भी करवा-चौथ मनाना नहीं भूलतीं

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