पति-पत्नी के आपसी प्रेम, अपनत्व, समर्पण का पर्व है करवाचौथ

भारतीय परम्पराओं में विवाह एक ऐसी परम्परा है, जिसका न केवल सम्मान किया जाता है, बल्कि विवाह के पलों को जितना सुंदर बनाया जा सके उसे बनाया जाता है | भारत ही शायद एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ विवाह को सात जन्मों का सम्बन्ध माना जाता है, इसलिए यहाँ तलाक, डिवोर्स जैसे शब्दों का आविष्कार ही नहीं हुआ | क्योंकि किसी ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि ईश्वर द्वारा बनाई गई जोड़ी कभी टूट भी सकती है |
उसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि प्राचीन काल में स्वयंवर, गंधर्व विवाह जैसे विवाह प्रचलित थे और यह माना जाता था कि विवाह तन और मन के मिलन का सर्वोच्च माध्यम है | यदि हम पौराणिक कथाएं पढ़ें तो उस समय केवल किसी को पसंद कर लेने मात्र से ही वह प्रणय निवेदन भेज सकता था, फिर वह राजकुमार हो, फ़कीर हो या कोई ऋषि मुनि | शारीरिक सम्बन्ध हो या आजीवन साथ रहने की प्रतिज्ञा यानि विवाह, समाज कभी भी आड़े नहीं आता था | यह दो दिलों के बीच का विषय होता था और उसे दो दिल ही सुलझाते थे | समाज केवल सहयोगी ही हो सकता था, विरोधी नहीं |

लेकिन आज वही विवाह और उसके संस्कार मजाक का विषय बने हुए हैं | आज तलाक महत्वपूर्ण हो गया और आजीवन सम्बन्ध-विच्छेद न होने पाए, इसके उपाय निंदनीय हो गये | तलाक या डिवोर्स विदेशी संस्कार हैं और इसके समर्थक कभी ईश्वरीय किताबों की दुहाई देकर तो कभी सांप्रदायिक स्वतंत्रता के नाम पर तलाक का समर्थन करते आये | हमारे यहाँ विवाह की नींव, सम्बन्ध कभी न टूटे, कभी भी ऐसी स्थिति न आये कि दोनों को अलग होना पड़े, यह मानकर रखी जाती है, जबकि विदेशी संस्कृतियों में सम्बन्ध विच्छेद होने की सम्भावना को प्राथमिकता दी जाती है | क्योंकि वे आत्मिक संबंधों में विश्वास नहीं करते | उनकी नजर में तो शरीर के सिवाय और कुछ है ही नहीं | विवाह यानि भौतिक, शारीरिक सुख प्राप्त करना और मन भर जाए तो तलाक ले लेना और फिर नए शरीर की खोज में निकल पड़ना | अभी कल ही पढ़ा कि एक व्यक्ति एक सौ सात विवाह कर चुका है और अभी भी अपने लिए कमसिन दुल्हन की खोज में हैं | उसका मानना है कि वह अल्लाह का दिया काम कर रहा है और औरतों का उद्धार कर रहा है उनसे विवाह करके |
तो जब विवाह नास्तिकों, भौतिक्तावादियों की दृष्टि से देखा समझा जाये तो केवल शारीरिक या भौतिक सुख के सिवाय और कुछ नहीं है | यहाँ भावनाओं का भी महत्व केवल इतना ही है, जितना एक व्यापारिक समझौते में होता है | जैसे दो व्यापारी किसी प्रोजेक्ट के लिए समझौता करते हैं, बस उतना ही सम्बन्ध है |
लेकिन भारत में ऐसा पहले नहीं था, यह तो आधुनिक शिक्षा पद्धति है जो विवाह जैसे पावन सम्बन्ध को भी व्यापारिक मोल-भाव की नजर से देखती है | आज विवाह भी धन-दौलत, शोहरत पर आधारित होता है | माता पिता अपने विवाह योग्य संतानों की बोली लगाते हैं, और जो अच्छी कीमत देता है उसे अपनी संतान सौंप देते हैं |
इसी क्रम में करवाचौथ नामक पर्व भी आ जाता है | चूँकि नास्तिकों का आत्मा-परमात्मा पर कोई विश्वास नहीं होता, इसलिय वे करवाचौथ का भी मजाक उड़ाते हैं | उन्हें यह बड़ा अटपटा सा लगता है कि कोई अपने पति की लम्बी आयु के लिए भूखी रहे तो उम्र भला कैसे बढ़ सकती है | यह बिलकुल भी अव्यवहारिक लगता है |
लेकिन यदि हम हिप्नोसिस या आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की बात करें, तो केवल चिन्तन मात्र से ही बहुत कुछ परिवर्तित हो सकता है | चूँकि हम जैसे भाव रखेंगे, हम जैसा विचार रखेंगे, वैसी ही दुनिया हमें दिखाई देगी, वैसा ही हमारा शरीर बनेगा | इसीलिए इस जगत को माया कहा जाता है | हम अपने भीतर यह धारणा बना लें कि हम गरीब ही रहेंगे, तो हमें कोई अमीर नहीं बना सकता | हम यह धारणा बना लें कि पहाड़ को एक अकेला आदमी नहीं काट सकता, तो दशरथमाँझी का नाम अमर न होता | दशरथ माँझी प्रमाण है इच्छा शक्ति का, इसी प्रकार ऐसे कई प्रमाण मिल जायेंगे जिससे यह सिद्ध होता है जो सम्पूर्ण विश्व के लिए जो कार्य असंभव लगता है, वह कोई एक व्यक्ति बड़ी सरलता से कर लेता है |
तो करवा चौथ भी ऐसा ही एक भावनाओं से जुड़ा, पति-पत्नी के संबंधों पर आधारित पर्व है | यह तलाक की तरह विकृत नहीं है कि तलाक समर्थक इस पर्व का मजाक उड़ायें | यह पति-पत्नी के सम्बन्धों में आई बोरियत, रुखापन, नीरसता को समाप्त करने का एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग है | यह आपसी सम्बन्ध में आई कटुता को समाप्त करने और सुहागरात को दोबारा जीने का एक उपाय है | पूरे दिन स्त्री के व्रत रखने का अर्थ यह नहीं कि केवल भूखा रहना है | व्रत का अर्थ ही यह होता है कि उस दिन वह क्रोध नहीं करेगी, उस दिन वह अनावश्यक चिन्तन नहीं करेगी, उस दिन वह प्रसन्नचित रहेगी | पति का भी धर्म है कि पत्नी के इस व्रत में उसका सहयोग करे और उसे प्रसन्नचित रखे, कम से कम काम करने दे ताकि रति-बेला का उचित लाभ उठा सकें | जीवन को फिर से नए सिरे से नवीनता प्रदान करते हुए शुरू कर सकें | दिन भर भोजन न करने से पेट को आराम मिलता है और शरीर से कई टोक्सिंस बाहर हो जाते हैं | भोजन न करने के करने कारण पानी अधिक पीना पड़ता है और उससे भी शारीरिक विकार दूर होते हैं | यह और बात है कि आज व्रत के नाम पर फलाहार ही इतना हो जाता है, कि महीने का बजट ही बिगड़ जाता है | यह और बात है कि आजकल व्रत की थाली से डोसा, चाउमीन तक मिल जाता है | हो सकता है निकट भविष्य में व्रत का चिकन-मटन भी मिलने लगे 🙂
तो विवाह कोई हँसी-मजाक या रंडीबाजी का खेल नहीं है कि जब मन भर गया छोड़ दिया, जब पसंद आई उठा लिया | यह आत्मा से जुड़ा सम्बन्ध है आजीवन साथ निभाने की प्रतिज्ञा है | यदि आपकी पत्नी माँग नहीं भर्ती, सिन्दूर नहीं लगाती, मंगलसूत्र नहीं पहनती… तो न सही | लेकिन जो ऐसा करती हैं, उसका मजाक तो मत उड़ाइए | आपकी पत्नी करवाचौथ नहीं मनाती, आपकी पत्नी भूखी नहीं रह सकती, तो कोई बात नहीं | लेकिन जो ऐसा करती हैं उनका मजाक तो मत उड़ाइए….यह आवश्यक तो नहीं कि जो आपकी पत्नी करती है, वही सबकी पत्नियाँ करें ? फिर करवाचौथ केवल पति-पत्नी के आन्तरिक संबंधों पर आधारित है उस पर बाहरी लोगों को दखल देने का कोई अधिकार नहीं बनता | न ही करवाचौथ ऐसा कोई पर्व है कि हर किसी को मनाना अनिवार्य है | जो भौतिकतावादी हैं, जो नास्तिक हैं, जो लिंग-इन जैसे संबंधो को जीते हैं, उनपर कभी भी कोई दबाव नहीं बनाता होगा कि वे भी वही करें जो हिन्दू करते हैं | यही भारतीय धर्म और संस्कार हैं | हम किसी पर कोई चीज नहीं थोपते और न ही बाध्य करते हैं मानने के लिए, कि ईश्वरीय किताब में लिखा है इसलिए मानना ही है, चाहे समझ में आये या न आये | चाहे आपकी आत्मा स्वीकार करे या न करे…. | और जो लोग भारतीय पर्वों को संस्कारों को बिना जाने समझे मनाते हैं, उनके लिए विवाह जैसे संस्कार भी केवल कर्मकांड और पाखंड बनकर रह जाते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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