हम आज भी गुलाम हैं साम्राज्यवादियों के

जिन देशों में कृषियोग्य भूमि, खनिज आदि की कमी थी, उन्होंने उपनिवेश बनाने आरम्भ किये | ब्रिटेन, जर्मन, फ़्रांस, पुर्तगाल आदि प्रमुख देश रहे जो प्राकृतिक संसाधनों व खनिजों से भरपूर देशों पर आक्रमण करते या छल-कपट से उस देश के नागरिकों को गुलाम बना लेते, ऐसे ही देशों में भारतीय व अफ़्रीकी देश प्रमुख रहे | औपनिवेशिक देशों के नागरिकों का मौलिक अधिकार छीन लिया गया, और उनकी स्थिति पशुओं से भी बुरी हो गयी | कुछ मुट्ठीभर फ्रिरंगी, जर्मन, फ़्रांसिसी, पुर्तगाली करोड़ों कि बड़ी जनसँख्या वाले देशों को अपना गुलाम बना पाने में सफल हो गये | जो विरोध करते, स्वतंत्रता से जीना चाहते वे मारे दिए जाते | उनके लिए औपनिवेशिक नागरिकों की हत्या करना बिलकुल वैसा ही था, जैसे कि फ्लू की बिमारी फैलने के डर से मुर्गों-मुर्गियों की सामूहिक हत्या करना |

अफ्रीका जैसे उपनिवेशों में गोरे लोग बहुत कम थे, लेकिन जर्मनों का दर्जा बाकियों से कहीं ज्यादा था. 1914 में उपनिवेशों में 25 हजार जर्मन रह रहे थे जबकि 1.3 करोड़ मूल अफ्रीकी. लेकिन मूल निवासियों को कोई अधिकार नहीं था. जर्मनी के आधीन दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका (नामीबिया) में हेरेरो और नामा में सदी का पहला नरसंहार हुआ था. यह जर्मन औपनिवेशिक इतिहास का सबसे जघन्य अपराध है. 60 हजार हेरेरो लोग प्यास से मर गए थे क्योंकि जर्मन सेना ने पानी का रास्ता रोक लिया था. नामीबिया में सिर्फ 16 हजार हेरेरो लोग बचे थे. उन्हें यातना शिविरों में ले जाया गया. वहां भी हजारों और लोग मारे गए जिनकी सटीक तादाद कभी पता नहीं चल सकी.

इसी प्रकार भारत कि दुर्दशा हो रही थी | जलियाँ वाला बाग़ काण्ड तो आप सभी को याद होगा ही | तो एक समय बाद सभी जगह विद्रोह शुरू हुए, विश्वयुद्ध छिड़ा और भारत भी स्वतंत्र हुआ साम्राज्यवाद या औपनिवेशवाद से | सभी ने यही समझा कि वे स्वतंत्र हो गये, लेकिन वास्तविकता बिलकुल अलग थी | बिल्ली केवल थोड़ी देर के लिए ओझल ही हुई थी ताकि चूहा यह समझे कि बिल्ली चली गयी | जैसे भारत जब स्वतंत्र हुआ, तब तक प्रमुख नेताओं के मन में ही नहीं, जनता तक के मन में अंग्रेजी और अंग्रेजियत ऐसी बैठ चुकी थी, कि भारतीय संस्कार, रहन-सहन, वेशभूषा ही उनको असहनीय लगने लगा था | नेताओं के मन में यह बात बैठा दी गयी थी कि अंग्रेजियत ही आधुनिकता है और अंग्रेजी बोलना ही शिक्षित होने का प्रमाण है | अब स्वतंत्र भारत के नेता अंग्रेजों के प्रभाव में ही थे, तो उन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति को नए सिरे से लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया | और यही फिरंगियों की जीत सिद्ध हुई |

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आज भारतीयों की अपनी कोई पहचान नहीं रही सिवाय वोटर कार्ड और आधार कार्ड के | आज अपने ही देश के अपने ही वे नेता जिसे जनता ने ही चुनकर भेजा है, वे अंग्रेजों, विदेशियों के कठपुतली बने बैठे हैं | कारण यही है कि उन्हें जो शिक्षा मिली उसमें यही सिखाया गया कि आत्मनिर्भरता यानि फिरंगियों की गुलामी | यही कारण है कि भारतीय किसान, आदिवासी उनके लिए आज भी वे गुलाम हैं, जिनको जीने का कोई अधिकार नहीं, यदि वे अपनी भूमि उनको नहीं देते | उदाहरण के लिए जिन क्षेत्रों में खनिजों का अम्बार है, उसे सरकार नीलाम कर देती है और उसके साथ ही नीलाम कर देती है उस क्षेत्र में रहने वालों का स्वाभिमान, उनका मौलिक अधिकार, अपनी ही भूमि में जीने का अधिकार | उन्हें पुनर्वास के नाम पर नई जगह दे दी जाती है और शिक्षा के नाम पर अंग्रेजियत | वे अपनी भूमि बेचकर नौकरी खोजने लगते हैं या दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हो जाते हैं | कुछ नीलाम में बोली लगाने वाले सेठों के यहाँ गुलामी करने लगते हैं….. और एक दिन जब वहां से खनिज समाप्त हो जाता है, तब सेठ अपना बोरिया बिस्तर समेट कर कहीं और निकल जाता है | इस बीच वह अरबों-खरबों का मालिक बन जाता है, लेकिन जिनकी भूमि से खनिज निकला, वे वही दिहाड़ी मजदूर या कोई सरकारी नौकर बनकर जीवन यापन करने के लिए पीढ़ियों तक के लिए विवश हो जाता है |

फिर इतना धन कमाने वाले सेठ का पैसा जाता कहाँ है ?

कहते हैं कि विकास कार्यों में खर्च होता है |

किसके विकास कार्यों में ?

सेठों, नेताओं, उनके चापलूसों के विकास कार्यों में |

तो मूल निवासी कहाँ गये ?

उनका तो विकास हो गया और वे स्वर्ग में सारी सुख-सुविधाएँ भोग रहे हैं | कुछ भूख-प्यास से तड़पकर स्वर्गवासी हो गये, कुछ सरकारी गुंडों की बंदूकों से निकली गोलियों के कारण, कुछ पुलिस की लाठियों और यातनाओं की मेहरबानी से स्वर्गवासी हो गये और कुछ जेलों में स्वर्गमई जीवन का आनंद ले रहे हैं |

जो गुलामी को अपना मौलिक अधिकार समझकर और ईश्वर की मेहरबानी समझकर जी रहे हैं, वे ही इस दुनिया में सुरक्षित हैं… ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजों के राज में कुछ लोग निक्कर पहनकर, अंग्रेजों को सलाम बजाकर ऐश कर रहे थे |

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तो पूंजीपतियों की मानसिकता नहीं बदलती | वह दुनिया को गुलाम के रूप में देखना चाहता है और उसके लिए वह किसी भी हद तक गिर सकता है | किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है |

आज ही मुझे अपने ही क्षेत्र की एक बुढ़िया के विषय में पता चला, जो इतनी जुझारू थी कि आज तक उसकी भूमि पर किसी भूमाफिया को हाथ नहीं रखने दिया | वह बुढ़िया अपने समय राजघराने से सम्बन्ध रखती थी, इसलिए उसके पास काफी भूमि थी | धीरे धीरे उसके सभी परिचित रिश्तेदार दूर शहरों में चले गये और फिर वे भूल गये बुढ़िया को | लेकिन बुढ़िया ने अपनी भूमि नहीं छोड़ने का निर्णय लिया और अकेली ही वहां रहने लगी | एक दिन यहाँ का सबसे कुख्यात डॉन उस बुढ़िया के पास पहुँचा और बोला, “माई आप अकेली ही रहती हैं, मन भी नहीं लगता होगा, इसलिए हमने सोचा कि आपकी जमीन पर मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बना दें | आप को भी सारी सुख-सुविधाएं मिल जाएगी और बुढ़ापा भी आराम से कट जाएगा |”

बुढ़िया बोली, “तेरे अपने खाने का पीने का तो कोई ठिकाना नहीं, दूसरों की जमीनें हड़पकर ही गुजरबसर करता है | और तू मुझे खिलायेगा, मेरा बुढ़ापा संवारेगा और वह भी मेरी ही जमीन पर ? मेरे घर आया है, पानी पिला दूंगी, चाय पिला दूंगी, कहे तो भोजन भी करा दूंगी, लेकिन दोबारा मेरी चिंता मत करना और न ही मेरी जमीन पर नजर डालना |”

वह डॉन अपमानित होकर लौट तो आया, लेकिन रात में ही उसने अपने गुंडे भेज दिए | बुढ़िया पर जब गुंडों ने बन्दूक तानी और कहा कि जमीन के पेपर पर साइन कर दो, तो बुढ़िया बिफर गयी | उसने कहा कि गोली चलानी है तो सीधे चला दे, बेकार की बातों में समय बेकार मत कर | उन्होंने बहुत डराने धमकाने कि कोशिश की, लेकिन बुढ़िया नहीं डरी | अंत में उन्होंने बुढ़िया पर गोली चला दी, लेकिन बुढ़िया भी अपने ज़माने की शेरनी ही थी, तुरंत बन्दुक का मुँह ऊपर उठा दिया और गोली के सर को छूकर, हल्का सा घाव बनाते हुए निकल गयी | बुढ़िया भी बेहोश होकर गिर पड़ी | गोली की आवाज सुनकर पड़ोस के मकान में ही जो किरायेदार था, उसका परिवार आ गया और बदमाश फरार हो गये | बुढ़िया पर पानी के छींटे मारे तो बुढ़िया को होश आ गया | वह तुरंत उठी और एसपी कोठी के लिए एक शराबी रिक्शेवाले को राजी करके पहुँच गयी एसपी के पास | तुरंत एसपी ने रिपोर्ट दर्ज की और अगले दिन ही डॉन को जेल भिजवा दिया | वह बीस दिन जेल में रहा और फिर जमानत पर छूट गया | जेल से छूटकर बुढ़िया के पास गया, पैर छुए और कहा, माई आज के बाद आपकी जमीन पर कोई हाथ नहीं रखेगा |”

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तो यह जीवंत उदाहरण है अपनी भूमि की रक्षा करने का | मातृभूमि केवल देश ही नहीं, वह भूमि भी है, जिसपर हम निवास करते हैं, जिसमें हमारा जन्म होता है, जो पैत्रक संपत्ति है, वही हमारी मातृभूमि भी है | उसकी रक्षा करना हर नागरिक का उतना ही अधिकार है, जितना कि देश के सैनिकों का अधिकार है सीमाओं की रक्षा करना | जो अपनी भूमि के प्रति लगाव नहीं रखता, जो उसे केवल उपभोग की वस्तु समझता है और व्यक्तिगत स्वार्थवश बेच देता है, उसे आजीवन कभी भी सुख नहीं मिलता | मातृभूमि को बेचना, अपनी माँ को बेचने के समान है |

यह बात सभी को इसलिए ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि पिछले हजार वर्षों में हमने कई बार अपनी माँ को नीलाम होते देखा है, कई बार हम अनाथ  हुए, कई बार हमने अपनों को खोये, कई बार हम अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हुए, कई बार हम गुलाम हुए…. लेकिन अब नहीं | अब तय कर लीजिये कि हम गुलाम नहीं होंगे | अपनी खेती हो, अपने कुँए हों, दो वक्त की रोटी अपने ही खेत से उगाकर अपने परिवार का ही पेट भर लेते हों, उससे अधिक सुख व ऐश्वर्य और कुछ नहीं हो सकता |

आज किसी ने प्रश्न किया कि स्वामी जी ये कृषि वाली खेती क्यों छीनते है ये भूमाफिया, उद्योगपति और सरकार ? रेगिस्तान में प्रोजेक्ट क्यों नही विकसित करते ?

तो मेरा उत्तर था, “खेती नहीं छीनेंगे तो भूमि छिन जाने के कारण बेरोजगार हुए किसानों को नौकरी कैसे देंगे ?”

जब तक किसानों आदिवसियों के पास भूमि है, तब तक वे बेरोजगार नहीं होंगे इसलिए ही खेती योग्य भूमि छीनी जाती है, ताकि अधिक से अधिक लोग बेरोजगार हों और सरकार उन्हें नौकरी दे सके | ~विशुद्ध चैतन्य

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