धर्म-निरपेक्षता का अर्थ यह कदापि नहीं रहा कि लोग धर्म से विमुख हो जाएँ

 भारत एकमात्र ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश है, जहाँ कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं है | न मीडिया, न सरकार, न न्यायव्यवस्था, न पुलिसप्रशासन, न वकील, न शिक्षक, न धार्मिक संस्थाएं, न राजनैतिक पार्टियाँ…..

केले में कई पौष्टिक तत्व होते हैं, उसके विषय में जानकारी देना गुरु का धर्म है

कूपमंडूकों के देश में धर्मनिरपेक्षता की नींव शायद इसीलिए रखी गयी थी आज से सत्तर वर्ष पहले क्योंकि भारत एक सनातन धर्मी देश था हज़ारों वर्ष पहले | यहाँ धर्म कोई विवाद नहीं था, विवाद था तो केवल जमीन, भोजन, स्त्री व सत्ता को लेकर | लेकिन कालान्तर में जब सम्प्रदायों को धर्म की उपाधि दे दी गयी, तब भारत को धर्मनिरपेक्षता की नींव रखने कि पहल करनी पड़ी |

धर्म-निरपेक्षता का अर्थ यह कदापि नहीं रहा कि लोग धर्म से विमुख हो जाएँ, बल्कि यह केवल प्रशानिक कार्यों व कार्यपालकों के लिए अपनाया गया था | इसका उद्देश्य था कि कोई भी प्रशानिक, न्यायिक या शासकीय अधिकारी, मंत्री या नेता धर्म (किसी भी मत-मान्यताओं व पूर्वाग्रहों) से आसक्त, प्रभावित होकर कोई निर्णय न करे | एक शासक को सभी के प्रति सामान भाव रखना चाहिए यह मनु-संहिता कहती है, उसी के आधार पर भारत के संविधान को धर्म-निरपेक्षता पर आधारित किया गया |

लेकिन दुष्टों ने न केवल संविधान की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं, बल्कि धर्म का भी नामों निशान मिटाकर रख दिया | अब हिन्दू मान्यताएं, मुस्लिम मान्यताएं, इसाई, बौद्ध, जैन, सिख…. आदि मान्यताएं धर्म हो गयीं और मूल वास्तविक सनातन धर्म (सत्य, प्रेम, सहयोगिता, सद्भाव, सर्व-धर्म समभाव, दया, करुणा, निर्बल व असहाय पर हिंसा या अत्याचार न करना, अपने से कमजोर की सहायता व रक्षा करना… आदि) तिरोहित कर दिया गया | अब धर्म का अर्थ साम्प्रदायिकता, उन्माद, हिंसा, निंदा, अत्याचार व शोषण मात्र बनकर रह गया | कोई तिलक जनेऊ डाल ले तो धार्मिक हो न हो, हिन्दू अवश्य हो जाएगा | कोई जालीदार टोपी लगा ले, पांच वक्त की नमाज अदा कर ले,वह धार्मिक हो न हो मुसलमान अवश्य हो जाएगा |

तो भारत कभी धार्मिक देश हुआ करता था इसलिए उस समय धर्मनिरपेक्षता अलिखित लेकिन व्यवहारिक था | लेकिन आज धर्मनिरपेक्षता लिखित लेकिन अव्यवहारिक है | ~विशुद्ध चैतन्य

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