अजीब कशमकश है ये ज़िन्दगी

 व्हाट्सएप पर सिद्धार्थ ने प्रश्न किया,

“स्वामी जी मै एक 20-22 साल का नौजवान लड़का हु । मै आपसे पूछना चाहता हु की एक युवा आज के परिपेक्ष्य में किस प्रकार से अपना जीवन जिए की उसे किसी प्रकार का अफ़सोस ना हो एवं उसके जीवन की सार्थकता भी बनी रहे ।

क्योकि आज हर जगह competition है, मेरे जेसे युवा सिर्फ भाग रहे है, मंजिल क्या है पता नहीं……;

कभी कभी बहुत Nervous हो जाता हु, सिर्फ में ही नहीं सभी युवाओ का यही हाल है ।

क्या सफलता के पीछे भागू या फिर जो मिला है उसी से संतोष कर लू..?

भगवान को मानु या नहीं मानु….? देखता हु की जो अनीति करते है, भष्टाचार करते है, लोगो का दमन करते है वो आज बहुत ऊँचे पदों पर बेठे है..और हर काम में सफल हो रहे है इसके विपरीत जो ईमानदारी से काम कर रहे है उनको एक समय की दाल रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिल पा रही है ।

एक समय मेरे पिताजी ने समाज के लिए ईमानदारी से काम करना चाहा तो कुछ ठेकेदारो ने उन्हें गुट बनाकर कर किनारे कर दिया ।

आज कोई समाज के लिए भी कोई कुछ योगदान करना चाह्ता है तो भी उसे नहीं करने दिया जाता या फिर झुटे आरोप लगाकर निष्कासित करवा दिया जाता है । और इस समाजसेवा के कारण इतने दुश्मन हो गए की जीना मुश्किल हो गया क्योकि ये ठेकेदार तो ग्रुप बनाकर झुण्ड में रहते है ।

आखिर कोई करे तो क्या करे ?

अजीब कशमकश है ये ज़िन्दगी !!! जीत जाओ तो अपने छुट जाते है और हार जाओ तो अपने ही छोड़ देते है”

सिद्धार्थ जी, सबसे पहले तो यह समझिये कि सफलता क्या है | अधिकांश यह मानते हैं कि सफलता यानि आर्थिक, सामजिक रूप से समृद्ध होना है | अच्छा बैंक बेलेंस हो, अच्छी नौकरी हो, बंगला, कोठी कार हो, मंत्री या उच्च पदस्थ अधिकारियों से मित्रता हो…. इसे सफलता मानते हैं | लेकिन वास्तव में यह सफलता नहीं है | यदि यह सफलता होती, तो जर्मनी में लोग शहर छोड़कर गाँव नहीं भाग रहे होते | यदि यह सफलता होती तो गौतम बुद्ध राजपाठ छोड़कर जंगलों में नहीं भटक रहे होते, यदि यह सफलता होती तो अम्बानी अदानी… जैसे धनकुबेरों को गरीबों, आदिवासियों की भूमि हड़पने और अधिक पाने की कामना न होती….यदि यह सफलता होती तो नेता गरीबों को मुर्ख बनाकर अपनी तिजोरियाँ न भर रहे होते |

वास्तव में यह दौड़ ही गलत है | कहते हैं कि जवानी में जितना अधिक कमा सके कमाओ, बुढ़ापे में ऐश करो… लेकिन क्या बुढ़ापे में कोई ऐश कर पाता है ? दवा, डॉक्टर पर टिका जर्जर शरीर क्या ऐश करेगा ?

तो सफलता वह नहीं, जो समाज समझाता या सिखाता है | सफलता है जो आपको पसंद है वह काम करते हुए प्रसन्नचित रहते हुए, आर्थिक व सामाजिक रूप से समृद्ध होना | उदाहरण के लिए आपको चित्रकारी का शौक है तो आपने आर्ट्स ले लिया | आपको संगीत का शौक है तो आपने संगीत की शिक्षा ले ली | अब अपने इन्हीं शौक को आपने अपना रोजगार का माध्यम बना लिया | इसी से जो भी सीमित या असीमित कमाई हो रही है, उसी में आप संतुष्ट हैं | आपको और अधिक पाने के लिए छल-कपट, मार-काट की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही, आप खुश हैं अपने जीवन से… बस यही सफलता है | स्वयं में जीना स्वयं को संतुष्ट व तृप्त रखते हुए जीना यही सफलता है | फिर आप कैसे जी रहे हैं और दूसरे कैसे जी रहे हैं, उसमें तुलना नहीं होनी चाहिए | आप किसी के कर्जदार नहीं हैं, कोई आपका मालिक नहीं है, आप स्वयं ही अपने मन के मालिक हैं… यह सफलता है | जब तक आप दूसरों की नकल करने की जरूरत महसूस कर रहे हैं, जब तक आप दूसरों की तरह होना चाह रहे हैं, तब तक आप असफल हैं | सफलता तब मानी जायेगी, जब आप स्वयं की उस योग्यता का सफलता पूर्वक प्रयोग कर पाते हैं जो ईश्वर से आपको प्राप्त है | जब आप स्वयं के आस्तित्व को महत्व दे पाते हैं, तब आप सफल हैं | उदाहरण के लिए एडिसन को ले लीजिये… तबला वादक जाकिर हुसैन, गायक मोहम्मद रफ़ी या किशोर कुमार या लता जी को ले लीजिये | आप कंप्यूटर सॉफ्टवेर में रूचि रखते हैं तो बिलगेट, जुकरबर्ग आदि हैं ही सामने आदर्श | क्या ये लोग दूसरों की नकल करने निकले थे ? सभी की अपनी अपनी मौलिकता है और सभी समृद्ध हैं |

दूसरी बात कि भगवान को माना जाए या नहीं |

भगवान कोई मानने की चीज है ही नहीं यह गाँठ बाँध लीजिये | भगवान् जानने, अनुभव करने की चीज है | आप स्वयं के शरीर के अंगों को देखिये और उनके कार्यों पर चिंतन मनन कीजिये… कैसे बने यह सब, कैसे अपने आप कार्य करता है सारा शरीर, कैसे ब्रेन कोई निर्णय लेता है बिना किसी रिमोट के… इन सब पर चिंतन करिए आप पायेंगे कि ईश्वर तो आपके भीतर ही है, बल्कि आप स्वयं ही ईश्वर हैं | हर वह प्राणी ईश्वर है जो दूसरों के लिए सहयोगी है, जो प्रकृति, पृथ्वी के लिए हितकारी है और हर वह प्राणी शैतान है जो विध्वंसकारी है | फिर भी समझने में परेशानी हो, तो इस विषय को छोड़ दीजिये कि ईश्वर है या नहीं है, आप जीवित हैं, आप क्रियाशील हैं, आप गतिमान हैं, यही बहुत है | स्वयं में ही ईश्वर को खोज लीजिये और कहिये, “अहम् ब्रह्मास्मि !

नर्वस होना यह सामान्य घटना है, सभी होते हैं और मैं भी नर्वस हो जाता हूँ कई बार जब आगे कोई दिशा नहीं दिखती, कोई गति नहीं दिखती | यह स्वाभाविक है, इससे मस्तिष्क को कुछ नवीन चिंतन करने का अवसर मिलता है | इसे इस प्रकार समझ लीजिये, जैसे आपने कई कमांड एक साथ कंप्यूटर को दे दिए तो वह थोड़ी देर के लिए हेंग हो जाएगा या फिर उसे रिस्टार्ट करना पड़ेगा, बिलकुल यही स्थिति मस्तिष्क के साथ होती है और उससे हम नर्वसनेस कहते हैं | ऐसे समय में कुछ नहीं करना है कहीं पार्क में या खुले स्थान में भीड़ से दूर घुमने निकल जाइए, वह काम करिए जो आपको रुचिकर लगते हों, फिर वह खाना बनाना हो, या गाना गाना |

अब रही बाद अधर्मियों के फलने-फूलने और सद्कर्मियों के शोषित व पीड़ित होने की बात, तो जो ताकतवर होगा वह शोषण करेगा ही यह तय है | फिर वह रावण हो, कंस हो, ब्रिटेन हो, अमेरिका हो, सत्तापक्ष में बैठा कोई नेता हो, कोई अधिकारी हो… सभी अपने से कमजोर को डराते, धमकाते रहते हैं | अपने घर में ही देख लीजिये जो घर में बड़ा होगा, उसकी जायज नाजायज डांट सुननी ही पड़ती है | बस वे अपने  होते हैं इसलिए आपका बुरा नहीं चाहते, जबकि बाहर ऐसा नहीं है | बाहर सभी अपने लिए ही जीते हैं, उनकी दोस्ती, उनका प्रेम, सब स्वार्थ पर आधारित होता है | जब तक उनका स्वार्थसिद्ध होगा आपसे, वे आपके साथ अच्छा व्यवहार करेंगे, लेकिन जैसे ही उनका मतलब निकल जायेगा, वे शत्रु भी बन सकते हैं | तो स्वयं को समर्थ बनाइये और प्रयास करिए कि दूसरों पर निर्भरता जितनी कम से कम हो सके उतना ही अच्छा है | इसलिए समाज में परिवार का महत्व है क्योंकि एक परिवार आपस में सहयोगी रहते हुए एक दूसरे के हित के लिए कार्य करते हैं |

बाहरी लोगों से वह अपेक्षा मत रखिये जो अपने पारिवारिक सदस्यों से रखते हैं | अपने केंद्र को मजबूत करिए, अपने आसपास के वातावरण को सुरक्षित बनाइये | यह एक सामान्य नियम है कि जब आप दूसरों के लिए अच्छा करते हैं, तो स्वयं का अच्छा होता है | क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का हर एक कण आपस में सम्बद्ध है | जो बुरा कर रहे हैं, जो दूसरों का शोषण कर रहे हैं, वे बाहरी रूप से दिखावा कर रहे होते हैं कि वे सुखी हैं, जबकि भीतर से वे टूटे, बिखरे हुए होते हैं | यहाँ एक बहुत बड़े व्यवसायी का उदाहरण देता हूँ, जिसके विषय में एक जांच आधिकारी ने मुझे बताया था |

वह व्यवसायी इतना अमीर था कि उसे खुद नहीं पता था कि उसके पास कितनी दौलत है | किसी केस में उसे जेल में डाल दिया था | जब जाँच अधिकारी उससे मिलने जेल पहुँचा तब पता चला कि उसके पूरे शरीर से मवाद निकलता रहता है, उसे अजीब ही बिमारी हो रखी थी | उसकी एकलौती बेटी सात साल से कोमा में है और एक बड़े अस्पताल में दस हज़ार रूपये प्रतिदिन के खर्च पर उसे रखा गया है | उसकी विवशता यह है कि उसने इतने गुनाह कर लिए धन कमाने के लिए कि अब वह गुनाह कि दुनिया से बाहर नहीं निकल सकता | उसने अधिकारी से कहा कि, वह कोर्ट में नहीं स्वीकार करेगा कि उसने कोई गुनाह किये हैं, लेकिन उसे किसी ऐसे बियाबान में ले जाकर छोड़ दिया जाए, जहाँ कोई इंसान न हो | वह बिलकुल निर्जन स्थान में अकेले मरना चाहता था |

तो इस उदाहरण से आपको समझ में आ गया होगा, कि ये ऊपर जिन अधर्मियों को आप ऐश करते देख रहे हो, वास्तव में वे दिखावे हैं | छल है केवल, जिसके आकर्षण में युवा बहक जाते हैं और अपराध की दुनिया में कदम रख देते हैं | वह ऐसी दुनिया है, जिससे फिर निकल पाना असम्भव हो जाता है | सभी बड़े नेता, अधिकारी इसी दलदल में धंसे हुए हैं, इसलिए वे गुलाम हैं अपराधियों के | अभी हाल ही में आपने पढ़ा होगा कि कुछ पुलिस वालों ने आरएसएस के कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन आरएसएस ने उनपर ही ऐसे केस ठोंक दिए कि वे फरार हैं… तो इसी प्रकार सभी पुलिस नेता इनके चंगुल में फंसे हुए हैं | वे चाहकर भी गलत का विरोध नहीं कर सकते क्योंकि उनकी गर्दन अपराधियों के ही हाथ में है | इसलिए ही आपके पिताजी को ईमानदारी से काम करने नहीं दिया गया, इसलिए ही कोई ईमानदार समाज में ईमानदारी से काम नहीं कर पाता | जो भी दूसरों की सहायता करने निकलता है वह हमेशा अकेला पड़ जाता है यहाँ तक कि उसे खाने के लाले पड़ जाते हैं | क्योंकि समाज स्वार्थियों का है, सभी अपने लिए जीते हैं | ‘मैं सुखी तो जग सुखी’ के सिद्धांत में चलने वाला समाज उसका साथ कभी नहीं देगा जो उनके सिद्धांतों के विरुद्ध चलता हो | उसका साथ तो वे लोग भी नहीं देंगे जिनके लिए वह अपने जीवन को दांव में लगाना चाहता है, क्योंकि समाज बलशाली का ही साथ देगा फिर वह कितना ही अत्याचारी, उपद्रवी क्यों न हो….भेड़िये राज करते हैं और भेड़ें गुलामी | और जब गुलाम भेड़ों को पता चलता है कि कोई भेड़िये के विरुद्ध है तो वह घबरा जाती है कि कहीं भेड़िया उनपर कोई विपदा न ले आये | इसलिए वह कभी भी भेड़ियों के विरुद्ध खड़े व्यक्ति का साथ तब तक नहीं देगी, जब तक उसे यह विश्वास न हो जाये कि यह भेड़ियों से निपट सकता है और उनपर कोई विपदा नहीं आएगी | यही कारण है कि भेड़ियों का गिरोह राज करता है समाज पर |

आपकी उम्र अभी बहुत कम है, इसलिए ही मैं आपको यह सलाह दे रहा हूँ कि कभी भी अनीति का साथ न दें | स्वयं को मजबूत करें, समृद्ध करें, शकिशाली बनाएं बिना इस बात की परवाह किये कि दुनिया क्या कहेगी… लेकिन ऐसे कार्यों से नहीं, जो बाद में आपको दूसरों का गुलाम बना दे, आपको पितामह भीष्म की तरह बेबस और लाचार बना दे |

आशा करता हूँ आपको मेरे उत्तर से संतुष्टि प्राप्त होगी | ~विशुद्ध चैतन्य

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