नास्तिक, आस्तिक और धर्म

कल यानि शुक्रवार को स्वामी बालेन्दु के अनुयाइयों व समर्थकों ने वृन्दावन में नास्तिक सम्मेलन आयोजित किया, लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदारों ने वहाँ पहुँचकर तब तक उपद्रव मचाया, जब तक कि सम्मेलन रद्द नहीं किया गया | सुनने में आया कि वहाँ महिलाओं के साथ मार-पीट भी की गयी, स्वामी बालेन्दु के रेस्टोरेंट पर तोड़फोड़ की गयी | यह भी सुनने में आया कि पुलिस अधिकारी आयोजकों से पूछते हैं की आप राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ क्यों चला रहे हैं…… धार्मिकों का कहना है कि नास्तिकों को धर्म की नगरी में सम्मेलन नहीं करना चाहिए था, कहीं और जगाकर करें सम्मलेन…
तो हिन्दू धर्म ही खतरे में पड़ गया धर्म की नगरी वृन्दावन में पाँच सौ नास्तिक जमा हो गये तो | चलिए वृन्दावन धर्मनगरी है, बाकि जितने नगर हैं वे अधर्म नगरी हैं ? यानि नास्तिकों को यदि सम्मेलन करना हुआ तो उन्हें अधर्म नगरी में जाना पड़ेगा ? ये धर्मों के ठेकेदार बता पाएंगे कि भारत के कौन कौन से नगर अधर्म नगरी हैं ?

वास्तव में समस्या धर्म कभी रहा ही नहीं, समस्या बनी परम्पराएं, मान्यताएं, कर्मकाण्ड, आडम्बर, पंडों-मुलाओं की कमाई और धर्म का कम्बल ओढ़े बैठे धर्मों के पाखंडी ठेकेदार | समस्या बने वे आस्तिक, जिन्हें न धर्म की समझ न ईश्वर की | समस्या बने वे लोग जो नास्तिक बन गये क्योंकि न धर्म समझ में आया न ईश्वर | समस्या है अपनी अपनी मान्यताएं दूसरों पर थोपने की जिद | मैं सही हूँ और दूसरे गलत यह तब तक ठीक है, जब तक दूसरों को उससे परेशानी नहीं होती, लेकिन यदि दूसरों के कार्यों में कोई बाधा उत्पन्न करने लगे, तब यह मान्यता गलत हो जाती है |

नास्तिकता आज एक सम्प्रदाय का रूप ले चूका है और यह उतना ही घातक रूप में उभर रहा है, जितना कि धर्मों से अनजान धर्मो के ठेकेदारों का आस्तिकतावाद | और जितने भी वाद हैं वे विवादित ही रहते हैं फिर वह मनुवाद हो या समाजवाद या पूंजीवाद या हिन्दू या इस्लामवाद | क्योंकि ये वाद तभी पैदा होता है, जब लोग मूल से अपरिचित होते हैं और मान्यताओं और परम्पराओं को धर्म समझ बैठते हैं |

गौतम बुद्ध ने कोई वाद नहीं शुरू किया था, केवल सनातन धर्म को ही सरल शब्दों में समझाया था | न ही महावीर ने कोई वाद शुरू किया था | लेकिन उनके अनुयाई उनके ही दिखाए मार्ग से भटक गये और उन्हीं की मूर्तियाँ बनाकर करने वही लगे, जिसके विरोध में थे बुद्ध और महावीर | यानि करना तो वही है जो समाज करना चाहता है, बस किसी भी प्रसिद्ध व्यक्ति का मुखौटा भर लगा लेते हैं या प्रतीक चिन्ह बना लेते हैं और फिर वह वाद में परिवर्तित हो जाता है | और जहाँ वाद है वहां विवाद है |

उदाहरण के लिए, जीसस के अनुयाई अमेरिकी जीसस के दिखाए रस्ते पर नहीं चलते | जीसस ने कहा था कि कोई एक गाल में थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर देना, उन्होंने कभी भी अपने विरोधियों पर कोई हमला नहीं किया उलटे क्रूसिफाइड करने वालों के लिए ईश्वर से क्षमा ही माँगी यह कहकर कि “हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना ये लोग नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं” | लेकिन ब्रिटेन से पूरे विश्व में अत्याचार किया, गुलाम के रूप में इंसानों को रखा | अमेरिका ने ईराक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक को बर्बाद कर दिया अपने पालतू ओसामा, अबुबकर, आइसिस नाम के अश्वमेघ घोड़ों को भेजकर | हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है | अमेरिका हिंसा के मामले में विश्व में प्रथम स्थान पर स्थापित है | लेकिन सभी दावा करते हैं कि वे जीसस के अनुयाई हैं | इस्लाम के अनुयाई अलकायदा हो या आइसिस, तैमुर हो या ओरंगजेब….सभी के इतिहास रक्तरंजित हैं लेकिन वे इस्लाम यानी शांति के अनुयाई मानते हैं स्वयं को |

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इसी प्रकार भारतीय जितने भी धर्म हैं, वे अहिंसा को सर्वोपरि मानते हैं, सर्वधर्म समभाव व वसुधैव कुटम्बकम भारतीय संस्कार हैं, लेकिन आज इसे ही तिरोहित कर दिया गया और उपद्रवियों ने धर्म की नई परिभाषा लिख दी, “न जीओ और न जीने दो” | फिर कहते हैं कि हम आस्तिक हैं, हम धार्मिक हैं |

कैसा धर्म कौन सा धर्म ?

कौन निभा रहा है धर्म ?

धर्म तो तभी कोई निभायेगा जब धर्म का पता होगा | यहाँ तो धर्म का ही नहीं पता किसी को और हो गये आस्तिक या नास्तिक | न नास्तिकों को पता है कि धर्म क्या है और न ही आस्तिकों को लेकिन धर्म की रक्षा और विरोध में सर-फुटव्वल कर रहे हैं |

गौतम बुद्ध की तरह चलने से, बोलने से, प्रवचन करने से क्या गौतम बुद्ध के अनुयाई हो गये ? महावीर की तरह नंगे घुमने से क्या महावीर के अनुयाई हो गये ? मोहम्मद या पैगम्बर की तरह कुरता पैजामा लगा लेने से या जालीदार टोपी लगा लेने से उनके अनुयाई हो गये ? चौबीस घंटे राम-राम क्या कृष्ण-कृष्ण जपने से धार्मिक हो गये ?

बड़ी अजीब है आप लोगों की धर्मिकता ?

नहीं ये सब न तो धार्मिकता है और न ही महान आत्माओं का अनुसरण | और चूँकि ढोंग कर रहे हैं, इसलिए जरा जरा सी बात पर आहत हो जाते हो, आपका धर्म खतरे में पड़ जाता है | बिलकुल वैसे ही जैसे पानी की हलकी बूँद या सूरज की तेज धूप से मेकअप उतर जाने का भय लगा रहता है अभिनेताओं को, वैसे ही इन धार्मिक-अभिनेताओं, अनुयाइयों को भय लगा रहता है कि कहीं बरसों से जमाया हुआ उनका मेकअप न उतर जाये | उस मेकअप की आढ़ में हो रहे काले धंधों और कमाई का मार्ग न अवरुद्ध हो जाए | फिर वृन्दावन तो टिका ही हुआ है श्रीकृष्ण के नाम पर हो रहे कारोबार पर | ऐसे में यदि नास्तिक जाकर यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि ये सब पाखंड कर रहे हैं पण्डे-पुरोहित तो स्वाभाविक ही है, वे विरोध करेंगे ही | फिर नास्तिकों को वृन्दावन ही क्यों चुनना पड़ा अपने नास्तिकता के प्रदर्शन के लिए ?

यह भी बिलकुल वैसा ही उत्पात है जैसा कि हिन्दू जाकर मुस्लिमों के क्षेत्र में जागरण करने लगें या मुस्लिम हिन्दुओं के तीर्थ स्थलों में जाकर अल्लाह हूँ अकबर करने लगें | यहाँ धर्म का कोई लेना देना है ही नहीं, यह तो केवल उपद्रव है | उपद्रव है एक समूह का दूसरे समूह के प्रति असम्मान व्यक्त करना, दूसरों की मान्यताओं और परम्पराओं के प्रति असम्मान व्यक्त करना.. न तो अल्लाह कहीं आया बीच में और न ही हिदुओं के देवी देवता, नास्तिकों के देवता पेरियार का भी कोई लेना देना नहीं है…. बस उपद्रव है | क्योंकि धर्म से सभी अनभिज्ञ हैं लेकिन धर्म के नाम पर सारे उपद्रव किये जा रहे हैं | नास्तिकों का अस्तित्व भी तभी तक है, जब तक वे आस्तिकता के विरोध में हैं यानि उन्हें भी अपने आस्तित्व की रक्षा के लिए धर्म का ही सहारा लेना पड़ रहा है |

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इस्लाम को कलंकित किया इस्लाम के ही कट्टरपंथियों ने और हिंदुत्व को कलंकित कर रहे हैं हिन्दू कट्टरपंथी, क्योंकि इन्हें धर्म की समझ नहीं | आडम्बर, दिखावा ढोंग, कर्मकांडों को धर्म मान चुके ये लोग अब खुद को ऐसे कुँए में कैद कर चुके हैं, कि धर्म कभी नहीं समझ में आ सकता इनको | ये लोग धर्म के नाम पर उत्पात मचाएंगे, तोड़फोड़ करेंगे लेकिन वास्तविक धर्म सभी के लिए सहयोगी होना, इनसे नहीं निभाया जाएगा | ये लोग कभी किसी गरीब की सहायता करने नहीं जायेंगे, ये लोग कभी किसी असहाय की सहायता करने नहीं जायेंगे, ये लोग किसी शोषित पीड़ित की सहायता करने नहीं जायेंगे, लेकिन धर्म के नाम पर उपद्रव करने के लिए लाखों की संख्या में जमा हो जायेंगे |

अभी हाल ही मैं एक १३ वर्ष की बच्ची जैन धर्म के पाखंड की भेंट चढ़ गयी | और जैनी कह रहे हैं कि हमारे धर्म के मामले में दखल मत दो… कौन सा धर्म ? क्या जैनियों को धर्म की समझ है ? एक बच्ची को व्रत करने के लिए उकसाते हो और फिर उसे दो चार दिन नहीं, बल्कि पूरे दो महीने का व्रत करवाते हो, जब वह मर जाती है तो कहते हो धर्म के मामले में दखल मत दो ? यह कैसा धर्म है ?

महावीर नंगे घुमे तो क्या उनकी तरह नंगे घुमने से महावीर बन जाओगे ? या महावीर का कोई अंश भर भी ज्ञान या समझ आ जाएगी ?

जितने भी लोग महावीर या बुद्ध बने घूम रहे हैं, जितने भी लोगो अघोरपंथ की आढ़ में नंगे घूम रहे हैं, यदि उन्हें लगता है कि दाढ़ी बढ़ा कर या सर मुंडा कर घुमने से, नंगे घुमने से धर्म की रक्षा हो रही है, तो फिर उन्हें
आधुनिक वाहनों, मकानों, मोबाइल, लेपटॉप का प्रयोग भी बंद कर देना चाहिए… जब नंगे रहना ही ही है तो पूरी तरह से रहो… पैदल ही चलो, फिर सात समद्र पार ही क्यों न जाना हो… उस ज़माने में जो संसाधन प्रयोग आते थे उन्हें ही प्रयोग करो | यह कैसा धर्म है जहाँ महावीर की नकल तो करनी है, अघोरी बनकर तो घूमना है, लेकिन मोबाइल भी चाहिए, कार भी चाहिए, हवाई जहाज का टिकट भी चाहिए, मान सम्मान भी चाहिए, कोई निंदा भी न करे यह भी सुनिश्चित होना चाहिए और यदि कोई निंदा करे तो तुरंत कानून की शरण में पहुँच जायेंगे कि संविधान में ऐसा लिखा है और वैसा लिखा है |

कुछ लोग माँसाहार के विरोध में अभियान चला रहे हैं तो कुछ लोग इस्लाम के विरोध में, कुछ लोग अन्धविश्वास के नाम पर हिन्दू मान्यताओं के विरोध में अभियान चला रहे हैं तो कुछ लोग नास्तिकता की आढ़ में मूर्ती पूजकों का मजाक उड़ा रहे हैं | लेकिन ये धार्मिक कभी भी भ्रष्टाचार के विरोध में अभियान नहीं चलाते, कभी भी जघन्य अपराधो में लिप्त अपराधियों को वोट न दे कोई, इस बात पर अभियान नहीं चलाते | बड़ा ही अजीब है आपकी नास्तिकता और आस्तिकता ?

अब नास्तिकों का कहना है कि वे किसी का अहित नहीं करते… करेंगे कैसे ? यहाँ उनसे बड़े उपद्रवी बैठे हैं धार्मिकता के कम्बल में लिपटे हुए | चीन में देखिये नास्तिकों ने क्या क्या कानून बना रखे हैं | तो नास्तिकता भी तब तक ही शांति प्रिय है, जब तक कि ताकत उनके हाथ में नहीं आ जाती, और जिस दिन ताकत आ जाएगी, उस दिन शांति प्रिय इस्लाम भी खून की होली खेलने लगेगा, सर्वधर्म समभाव वाला हिन्दुवाद भी परधर्म निंदा से लेकर दंगे-फसाद तक पर उतर आएगा…क्षमाशील जीसस के अनुयाई ईसाईयों ने जो नरसंहार किए क्या उसे जानने का प्रयास किया किसी ने ?

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नहीं ! न नास्तिकता, न आस्तिकता और न ही जीसस, महावीर या बुद्ध के अनुयाई ही धर्मपथ पर हैं और नहीं हिन्दू या मुसलमान | सभी केवल परम्पराओं को धर्म मानकर जी रहे हैं | दान करना, जकात करना ईश्वरीय किताब में लिखा है, इसलिए कर रहे हैं… मजबूरी में कर रहे हैं, वरना तो फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे किसी को | नास्तिकों को भगवाधारियों से ही इतनी चिढ है कि फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे चाहे कितनी ही आवश्यकता हो किसी को…. क्योंकि भगवाधारी उनकी तरह नौकरी नहीं करते, उनकी तरह कमाते नहीं हैं…… तो यह ध्यान रखें… हर कोई अपने अपने मान्यताओं को सही सिद्ध करने के प्रयास में लगा रहता है और उनमें से एक मैं भी हूँ | मैं भी यह सिद्ध करना चाहता हूँ कि सनातन सिद्धांत, यानि सहयोगी भाव में जीने से सभी का हित होगा, सभी का हित होता है…… लेकिन शर्त यह है कि कुछ पाने के लिए सेवाभाव का दिखावा नहीं करना है |

धर्म के ठेकेदारों का कहना है कि धर्म नहीं रहेगा तो अराजकता फ़ैल जायेगी, धर्म है तभी शांति है…. | लेकिन यदि आप देखें तो समाज में धर्म के कारण ही सबसे अधिक उपद्रव है | क्योंकि जिस धर्म की आढ़ लेकर लोग धार्मिक बने बैठे हैं, उस धर्म से कोसों दूर हैं | न तो हिन्दू कोई धर्म है, न ही इस्लाम कोई धर्म है, न ही इसाई कोई कोई धर्म है और न ही बौद्ध या जैन… ये सभी सम्प्रदाय हैं | कुछ विशेष, भिन्न जीवन शैली, परम्पराओं के अनुयाई हैं… धर्म से कोई लेना देना नहीं | और यदि हम वन्य प्राणियों में देखें, तो उनका तो न कोई धर्म है, न कोई धर्मगुरु और न ही कोई ईश्वरीय किताब, लेकिन वे कैसे मर्यादित रहते हैं ? क्या उनका धर्म खतरे में पड़ता है कभी ?

नहीं धर्म को बीच में मत लाइए… क्योंकि धर्म का नास्तिकता, आस्तिकता और साम्प्रदायिकता से कोई लेना देना नहीं है | धर्म सभी के लिए समान है फिर चाहे वह मानव हो या पशु-पक्षी | एक कुत्ता आप पाल लें, या एक बिल्ली आप पाल ले तो वह बिना रामायण पढ़े, बिना क़ुरान पढ़े भी धर्म को बेहतर निभाना जानते हैं | जबकि यहाँ हजारों वर्षों से धर्म के नाम पर उपद्रव कर रहे लोगों को धर्म नहीं समझ में आया |

धर्म को समझिये.. परम्पराओं, आडम्बरों, दिखावों और कर्मकांडों को धर्म बनाकर उपद्रव मत करिए… सच्चे धार्मिक बनिए उन लोगों का विरोध करके, जिनसे देश को आर्थिक, भौतिक व सामाजिक हानि हो रही है | उनका विरोध करिए जो भ्रष्ट, अपराधी नेताओं को वोट देते हैं, उनका समर्थन करते हैं | किसी की मान्यताओं, कर्मकांडों का विरोध या समर्थन करके नास्तिक या आस्तिक होने के ढोंग से बाहर निकलिए | ~विशुद्ध चैतन्य


“पांच सौ लोगों के जुटने से धर्म की चूलें हिल गईं. इससे मालूम होता है कि धर्म कितना कमजोर है.” -स्वामी बालेन्दु

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