स्व + अभाव = स्वभाव| अर्थात स्वयं का अभाव…

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‘स्वभाव’ को हम बहुत ही सामान्य रूप में लेते हैं और कई बार तो हम ध्यान ही नहीं देते | लेकिन ‘स्वभाव’ पर आज से ध्यान देना शुरू कर दीजिये, क्योंकि स्वभाव ही हम हैं, हमारा वास्तविक ईश्वर प्रदत्त रूप और गुण है | स्वभाव = स्व + अभाव | अर्थात स्वयं का अभाव, जहाँ स्व अर्थात मैं अर्थात अहंकार शून्य हो जाता है | कोई कार्य या व्यवहार स्वतः हो जाता है बिना विचारे | जब कोई प्रतिक्रिया या भाव व्यक्त करने के लिए हमें मस्तिष्क पर जोर नहीं डालना पड़ता, जब हम सोचने से पहले ही कुछ कर गुजरते हैं बिना लाभ या हानि का विचार किये, वही हमारा वास्तविक रूप है | बाकी जो कुछ करते हैं वह समाज व परिवेश से प्राप्त और सीखे व्यवहार होते हैं और यदि उनमें से कुछ को आप अपना स्वभाव समझ रहें हैं तो भूल कर रहें हैं, क्योंकि वे व्यव्हार स्वभाव नहीं आदत है | जैसे रोज प्रार्थना करना, मंदिर जाना, जाप करना, चाय पीना, सिगरेट पीना… आदि इत्यादि |

स्वभाव होता है वह गुण और संस्कार जो आपने पिछले कई जन्मों के अनुभवों से प्राप्त की | जो आपको किसी ने सिखाया नहीं, आपने स्वयं ही जाना और सीखा | जैसे कि आप पिछले जन्म में गोरिल्ला रहे और आपने वह काम किया वह भी बिना कोई धर्मग्रन्थ पढ़े, जो कि वेदों, उपनिषदों को पढ़ने वाले भी आजकल नहीं करते | उदहारण देखिये कि एक मादा गोरिल्ला ने एक मानव बच्चे की जान बचाई… पूरी कहानी पढ़ें  या वीडियो देखे|

अब किसी दूसरी प्रजाति के बच्चों को बचाना गोरिल्लों का मूल स्वभाव नहीं है, लेकिन उस मादा गोरिल्ले ने अपने पूर्व जन्मों से सीखे व्यव्हार का प्रयोग स्वतः स्फूर्त रूप में किया इसके लिए उसे किसी शास्त्र का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं पड़ी |न ही वह किसी धर्म, पंथ या संप्रदाय से जुड़ी हुई थी | उसने न गीता पढ़ी थी न रामायण, न बाइबल न कुरान… यह सब उस संस्कार का परिणाम था जो उसने पूर्व के जन्मों में प्राप्त किया | हो सकता है पिछले किसी जन्म में किसी ने उसकी जान बचाई हो और उसने जाना कि जब कोई जान बचने पर कैसी अनुभूति होती है | वह बात न केवल उसके मस्तिष्क में, बल्कि उसके अचेतन मन में भी बैठ गई जो अविनाशी है | जो आपके शरीर के साथ नष्ट नहीं होता और जन्म-जन्मान्तर तक आपके संग्रह में रहता है |

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जब कोई पशु योनी से उन्नति करके मनुष्य योनी में आता है तो वह कई पशुवत गुणों के साथ आता है | जैसे कि छल करना, चोरी करना (लोमड़ी, गीदड़ आदि का गुण), हिंसा से सुख प्राप्त करना… आदि |हमारे अवचेतन मन में पूर्व जन्मों की कई अच्छे बुरे अनुभव दबे हुए रहते हैं जिसके प्रभाव से हमारा व्यक्तित्व या स्वभाव व्यक्त होना शुरू होता है बचपन में ही | यदि माँ-बाप समझदार हुए तो उसके पूर्व जन्म के गलत अनुभव को बदल सकते हैं | जैसे कोई बच्चा यदि छीना झपटी करता है तो माँ-बाप को यह समझ लेना चाहिए कि उसने पिछले जन्म के अनुभव में जाना की बिना छीने कुछ हासिल नहीं होता, तो वह जो कुछ कर रहा है वह पिछले अनुभव के कारण ही कर रहा है | इसलिए माँ-बाप को चाहिए कि बच्चे को तुरंत ही उसके उस व्यवहार पर अंकुश लगाएं और उसे यह अनुभव कराएं कि जो उसका है उसे अवश्य ही मिलेगा बेशक थोड़ी देर से ही सही | बच्चा धीरे धीरे पूर्व के अनुभव को अपने मन से मिटा देगा और यह नया सबक उसकी जगह ले लेगा |

आप अपने स्वाभाव पर ध्यान दें कि आप की अंतर्चेतना आपसे किस तरह के व्यव्हार करवाती है ? यदि आप किसी के कष्ट में मदद के लिए तुरंत आगे बढ़ते हैं बिना यह सोचे कि आप कौन हैं, तो निश्चित जानिये कि यह आपका स्वाभाव है और आपने पिछले जन्मों की अपनी शिक्षा पूरी ईमानदार से प्राप्त की बिना | हर धर्म में शास्त्रों में नैतिक ज्ञान और सद्कर्मों को करने पर महत्व दिया गया है | लेकिन हमने शास्त्र को समझने के बजाय रटने और पूजने में ही अपना जीवन लगा दिया ?  क्यों नहीं हमने जानने की कोशिश की कि शास्त्रों के रचयिता क्या कह रहें हैं और क्यों कह रहें हैं ? शास्त्र रटने की नहीं समझने व पिछले जन्मों में सीखे पाठ को फिर से याद करने के लिए लिखे गए | इसलिए शास्त्रों को प्रत्येक व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों के अनुभव के आधार पर ही पढता व उसके अर्थ निकालता है | कुछ लोग धार्मिकता के आढ़ में हिंसात्मक उदाहरण को अपनाते हैं और कुछ लोग कल्याण को अपनाते हैं तो कुछ लोग कायरता को अपनाते हैं | यदि आप इस पोस्ट की गहराई को समझ पाए तो आपके लिए स्वयं को और दूसरों को समझना आसान हो जाएगा | यदि न समझ आये तो मुझसे प्रश्न कर सकते हैं | -विशुद्ध चैतन्य

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