रामकृष्ण परमहंस जैसा सनातनी शायद कहीं देखने को न मिले

अक्सर विद्वान पढ़े-लिखे लोग, सनातन धर्म को भी सम्प्रदाय समझने की भूल कर बैठते हैं | दोष उनका भी नहीं है, दोष तो है उन सम्प्रदायों के धार्मिक विद्वानों, और उनके ईश्वरीय ग्रंथो का | उनके ग्रंथों में लिखा है कि निराकार की अराधना ही सर्वोच्च अराधना है, इसलिए बाकी सब उनके लिए निम्न हो गये, तुच्छ हो गये | उनकी नजर में मूर्ति पूजक भटके हुए हैं, उन्हें सही राह पर लाना है, उनको सही धर्म समझना है | लेकिन सनातन व अन्य किताबी धर्मों में बहुत ही बड़ा अंतर है और वह यह कि किताबी धर्म आपकी मानसिकता को संकुचित कर देता है, आपकी विचारधारा को संकीर्ण कर देता है | अभी इस्लाम पर कोई पोस्ट कर देता हूँ कभी कभी तो इस्लाम के विद्वान राशन-पानी लेकर कूद पड़ते हैं कि इस्लाम का अपमान हो गया… हम यह अपमान सहन नहीं करेंगे….. आदि आदि | तो यह सिद्ध कर देता है कि इस्लाम सबसे संकीर्ण मानसिकता का धर्म है या उनके अनुयाई सबसे संकीर्ण मानसिकता होते हैं | लेकिन हिन्दुओं में अभी इतना नहीं है सिवाय कुछ लफंगों को छोड़कर जो इस्लाम की नकल करने पर आमादा है और हिंदुत्व को भी इस्लाम की तरह ही दड़बा बनाने पर तुले हुए हैं | उनकी भावनाएं आहात हो जाती हैं राम पर कुछ कहने से क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो मुस्लिमों की बराबरी नहीं कर पाएंगे कट्टरता दर्शाने में | तो हिंदुत्व के लफंगे ठेकेदारों की विवशता ही समझ सकते हैं | लेकिन सनातनी तो सम्पूर्ण विश्व को ही समान भाव से देखते हैं, इसलिए मुस्लिमों की विवशता भी समझ में आती है | यदि वे संकीर्ण मानसिकता के नहीं होंगे तो उनका धर्म ही खतरे में पड़ जायेगा |

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नीचे ओशो की सुनाई एक खानी दे रहा हूँ उसे पढ़े तो समझ में आ जायेगा कि सनातनी होने का अर्थ क्या है | समझ में आज जाएगा कि सनातनी कितने विशाल हृदय रखते हैं और शायद इतना विशाल हृदय किसी किताबी धर्म या सम्प्रदाय में देखने को ना मिले |

रामकृष्ण के पास बंगाल के बड़े तार्किक मिलने गये थे—महापंडित थे। रामकृष्ण को हराने गये थे। केशवचंद्र सेन उनका नाम था। बंगाल ने ऐसा तार्किक फिर नहीं दिया। केशवचंद्र अद्वितीय तार्किक थे। उनकी मेधा बड़ी प्रखर थी। सब को हरा चुके थे। किसी को भी हरा देते थे। सोचा, अब इस गंवार रामकृष्ण को भी हरा आयें। क्योंकि ये तो बेपढ़े—लिखे थे। दूसरी बंगाली तक पढ़े थे। न जानें शास्त्र, न जानें पुराण—इनको हराने में क्या देर लगेगी। और भी उनके संगी—साथी देखने पहुंच गये थे कि रामकृष्ण की फजीहत होते देखकर मजा आयेगा। लेकिन फजीहत केशवचंद्र की हो गई।
 

रामकृष्ण जैसे व्यक्ति को तर्क से नहीं हराया जा सकता, क्योंकि रामकृष्ण जैसे व्यक्ति का आधार ही तर्क पर नहीं होता। तर्क पर आधार हो, तो तर्क को खींच लो, तो गिर पड़े। तर्क पर जिसका आधार ही नहीं है, तुम क्या खींचोगे?
 

केशवचंद्र ने तर्क पर तर्क दिये और रामकृष्ण उठ—उठकर उनको छाती से लगा लें! और कहें, ‘क्या गजब की बात कही! वाह! वाह! अहा! आनंद आ गया!’
 

वे जो साथ गये थे, वे भी हतप्रभ हो गये, और केशवचंद्र भी थोड़ी देर में सोचने लगे कि मामला क्या है! मै भी किस पागल के चक्कर में पड़ गया! मैं इसके खिलाफ बोल रहा हूं ईश्वर के खिलाफ बोल रहा हूं शास्त्रों के, खिलाफ बोल रहा हूं और यह किस तरह का पगला है। कि यह उठ—उठकर मुझे गले लगाता है।
 

केशवचंद्र ने कहां, ‘एक बात पूछूं! कि मैं जो बोल रहा हूं यह धर्म के विपरीत बोल रहा हूं ईश्वर के विपरीत बोल रहा हूं शास्त्र के विपरीत बोल रहा हूं। मैं आपको उकसा रहा हूं—आप विवाद करने को तत्पर हो जायें। और आप क्या
करते हैं! आप मुझे गले लगाते हैं! और आप कहते हैं : अहा, आनंद आ गया!’
 

रामकृष्ण ने कहां, ‘आनंद आ रहा है—कहता नहीं हूं। बड़ा आनंद आ रहा है। थोड़ा—बहुत अगर संदेह भी था परमात्मा में, वह भी तुमने मिटा दिया!’
 

केशवचंद्र ने कहां, ‘वह कैसे?’
 

तो कहां कि ‘तुम्हें देखकर मिट गया। जहां ऐसी प्रतिभा मनुष्य में हो सकती है, जहां ऐसी अद्भुत चमकदार प्रतिभा हो सकती है, तो जरूर किसी महास्रोत से आती होगी। इस जगत के स्रोत में महाप्रतिभा होनी ही चाहिए, नहीं तो तुममें प्रतिभा कहां से आती? जब फूल खिलते हैं, तो उसका अर्थ है कि जमीन गंध से भरी होगी। छिपी है गंध, तभी तो फूलों में प्रगट होती है। तुम्हारी गंध को देखकर.. .मैं तो बेपढ़ा—लिखा आदमी हूं, रामकृष्ण कहने लगे, ‘मेरी तो क्या प्रतिभा है! कुछ प्रतिभा नहीं। लेकिन तुम्


हें तो देखकर ही ईश्वर प्रमाणित होता है!’
 

केशवचंद्र का सिर झुक गया। चरण पर गिर पड़े। और कहां, ‘मुझे क्षमा कर दो। मैं तो सोचता था, तर्क ही सब कुछ है। लेकिन आज मैंने प्रेम देखा। मैं तो सोचता था—तर्क ही सब कुछ है—आज मैंने अनुभव देखा। आपने मुझे हराया भी नहीं, और हरा भी दिया! यूं तो मुझे हारने का कोई कारण नहीं था, अगर आप तर्क करते तो। मगर आपने अतर्क्य बात कह दी। अब मैं क्या करूं! मेरी जबान बंद कर दी।’ || ओशो ||

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