राष्ट्रवाद है क्या ?

सामान्य मान्यता है कि राष्ट्रवाद अर्थात राष्ट्र के प्रति श्रृद्धा, समर्पण, कर्तव्यबोध… आदि | लेकिन यदि आप राष्ट्रवादियों को देखें तो वे ऐसा कोई कार्य नहीं कर रहे होते, जिससे राष्ट्र को किसी भी प्रकार का कोई लाभ होता हो, सिवाय दंगे-फसाद, अराजकता और आपसी वैमनस्यता के | राष्ट्रवादी हमेशा उन विषयों को अपने अधिकार में ले लेते हैं, जिनसे प्रजा का भावनात्मक लगाव होता है | जैसे कोई त्यौहार, कोई तीर्थ या धार्मिक स्थल, कोई सामजिक या राजनैतिक या धार्मिक विषय… और फिर उसके आधार पर प्रजा का आर्थिक व भावनात्मक शोषण करना शुरू कर देते हैं | कभी ये हिन्दुओं की शक्ल ले लेकर मुस्लिमों के विरुद्ध दिखाई देते हैं तो कभी मुस्लिमों की शक्ल में हिन्दुओं के विरुद्ध | कभी ये भाईचारा, सद्भाव के पक्ष में दिखाई देते हैं तो कभी ज़हर उगलते किसी सम्प्रदाय विशेष के विरुद्ध |
तो इससे यह सिद्ध होता है कि राष्ट्रवाद किसी राजा के दिमाग का मवाद है, जिसे उसके अनुयाई समाज में फैलाते हैं | यह एक मनोरोग है जो किसी मनोरोगी राजा और उसके समर्थकों में पायी जाती है, लेकिन जिसकी वजह से पूरा राष्ट्र अशांत व अराजकता से ग्रस्त हो जाता है | यह एक ऐसा खेल है, जिसमें खेलने वाला स्वयं को खेल से बिलकुल अलग दिखाता है बाहरी रूप से, लेकिन भीतर से हर चाल वही चल रहा होता है | यह ऐसा युद्ध है जिसमें राजा की शक्ल लगाए खड़ा व्यक्ति केवल रोबोट होता है और रिमोट लेकर राजा कहीं और बैठा होता है |
राष्ट्रवाद का अर्थ शास्त्रों में क्या लिखा है और क्या नहीं, उसपर नहीं पड़ना चाहता, बल्कि जो व्यवहारिक रूप से दिख रहा है मैं उसी पर चर्चा करना चाहता हूँ | और जो दिख रहा है, उसके अनुसार राष्ट्रवाद का अर्थ है राष्ट्र का भौगोलिक रूप से विस्तार करने की मानसिकता, यानि औपनिवेशिकता-वाद | जैसे कि अश्वमेघ यज्ञ, जिसमें राष्ट्र के विस्तार के लिए राजा अश्वमेध युद्ध करवाता था और प्रजा हर्षित होती थी, जयकारा लगाती थी, अपने दुःख-दर्द भूलकर राजा और सैनिकों का मनोबल बढ़ाती थी | राजा अपने घोड़े को छोड़ देता और वह जहाँ-जहाँ जाता, उतना भूमि का हिस्सा राजा के अधिकार क्षेत्र में आ जाता या उस क्षेत्र के अधिकारी राजा से संधि कर लेता | और जहाँ घोड़े को रोका जाता या विरोध होता, वहां घोड़े का पीछा कर रहे सैनिक युद्ध करते | लेकिन यह तो प्राचीन Outdated पद्धती हो चुकी है, अब नई पद्धति अपनाई जाती है |
अब आतंकवादी, नक्सली पाले जाते हैं और उन्हें छोड़ देते हैं, उन क्षेत्रों में जहाँ कब्जा करना है | न आतंकी, नक्सलियों को पता होता है कि खिलाड़ी कौन है, न ही प्रजा को पता होता है और न ही उन्हें, जो नक्सलियों, आतंकियों के विरुद्ध युद्ध कर रहे होते हैं | तो आतंकी हों या नक्सली दोनों के ही दिमाग में राजा के दिमाग का मवाद भर दिया जाता है और उन्हें यह अहसास करवा दिया जाता है कि वे सही हैं और उन्हें मरणोपरांत अतिविशिष्ट सेवाओं व सुविधाओं के साथ साथ सारे ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी | जैसे मुस्लिम हुआ तो जन्नत में प्रथम श्रेणी का रिजर्वेशन, शराब, शवाब, कवाब के साथ साथ ७२ हूरें और कभी न खत्म होने वाली पौरुष क्षमता | यदि हिन्दू हुआ तो जन्नत की बजाये स्वर्ग में प्रथम श्रेणी का रिजर्वेशन और बाकी वही सब सुख सुविधाएँ जो जन्नत में मुस्लिमों को मिलती हैं |
वहीँ इनके विरुद्ध लड़ने वाले सैनिकों और पुलिसकर्मियों को भी यही सब समझाया जाता है कि आतंकियों नक्सस्लियों का शिकार करने पर जीते जी बेशक अधिक कुछ न मिले, लेकिन मरणोपरांत शाही सम्मान प्राप्त होगा, स्वर्ग मिलेगा, जन्नत मिलेगा, जय जयकर होगी….. प्रजा से कहा जाता है कि जो इनका सम्मान नहीं करेगा मरणोपरांत वह राष्ट्रद्रोही माना जाएगा, जबकि सारा खेल ही शतरंज की बिसात बिछाकर खेला जा रहा है, न राष्ट्रहित से कहीं कुछ जुड़ा है और न ही समृद्धि व विकास से… केवल मौत का खेल है और दोनों ही तरफ मरने वाले वही लोग हैं जो बेरोजगारी, भुखमरी से तंग आकर प्यादे बनने को विवश हुए थे, यह जानते हुए भी कि यह मौत का कुआँ है |
मैं जब दोनों ही तरफ की सेनाओं को देखता हूँ और फिर खिलाड़ियों को खोजता हूँ, तो मुझे मुर्गे लड़ाने वाला खेल सामने दिखाई देने लगता है | शतरंज की बिसात दिखाई देने लगती है, जहाँ प्यादे अपने प्राण न्योछावर कर रहे होते हैं और खिलाड़ी जाम से जाम टकराकर एक दूसरे को अगली चाल चलने के लिए कह रहे होते हैं |
तो राष्ट्रवाद और कुछ नहीं शतरंज की बिसात है, मुर्गे लड़ाने का खेल है |
आइये प्रिंट, सोशल, वेब व ब्रॉडकास्ट मीडिया पर चल रही हलचल से ही इस राष्ट्रवाद को समझने का प्रयास करें |
ओसामा बिन-लादेन तो आपको याद होगा ही जिसका संहार किया था ओबामा ने | लेकिन मीडिया में हलचल थी उस समय कि ओसामा को अमेरिका ने ही ट्रेंड किया था रशिया के विरुद्ध और सोवियत संघ को बिखेरने में ओसामा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | लेकिन बाद में उसका दिमाग फिर गया और अपने ही आका के विरुद्ध हो गया |
लेकिन मेरा मानना है कि या सुनियोजित चाल थी और ओसामा हो सकता है आज भी जिन्दा हो क्योंकि उसकी लाश भी नहीं मिली | और जिसे समुद्र में फेंका गया वह कोई भी हो सकता है ओसामा न रहा हो | क्योंकि ओसामा ने तो वह महत्वपूर्ण कार्य किया था, जिसे कोई और कर ही नहीं सकता था, तो उसे उसके आका कैसे मार देते ? वह अभी भी विशेष सलाहकार की भूमिका निभा रहा हो इसमें कोई संशय मुझे तो नहीं लग रहा |
तो ओसामा का शिकार करने के लिए अफगानिस्तान पर हमला करता है अमेरिका, फिर उसके सैनिक अफगानिस्तान में बिछ जाते हैं | ओसामा अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान में जाकर छिप जाता है | जो अमेरिका आज तक दाउद को नहीं खोज पायी पकिस्तान में, वह ओसामा को खोज निकलता है और फिर अपने विशेष शिकारी दस्ता भेजकर ओसामा का शिकार करता है | उसकी लाश ले जा कर समुद्र में फेंक देते हैं जहाँ समुदी मछलियाँ उसका अंतिम संस्कार कर देती हैं |
इस कहानी में कुछ गड़बड़ दिखाई दे रही है ?
नहीं न ?
जी बिलकुल् कोई गड़बड़ नहीं है, सिवाय इसके कि उस शिकार के बाद अमेरिका के सैनिक आज तक पाकिस्तान में टिके हुए हैं, अफगानिस्तान में भी शायद टिके हुए हैं | इसे कहते हैं राष्ट्रवाद !
फिर राष्ट्रवाद और आगे बढ़ा अमेरिका का और मोदी प्रधानमंत्री बन गये | ब्रिटिश कम्पनी को भारत में पेट्रोल पम्प बनाने का लाइसेंस मिल गया और अमेरिका को सैनिक छावनी बनाने का भारत में | अब ब्रिटिश और अमेरिकी भारत की रक्षा करेंगे चीन और पाकिस्तान से क्योंकि भारत स्वयं इनसे निपट पाने में अक्षम है | तीन चार वर्ष पहले तक तो पाकिस्तान और चीन दोनों से निपटने का सामर्थ्य था भारत में, लेकिन अचानक ही हम कमजोर हो गये और ब्रिटेन और अमेरिका की सहायता की आवश्यकता पड़ी | तो इस प्रकार औपनिवेशिकतावाद ही राष्ट्रवाद है और अमेरिका और ब्रिटेन इस खेल के बहुत पुरानी और अनुभवी खिलाड़ी हैं |
अब ईराक, सीरिया की घटना को लें | अबू बकर जो कि अमेरिका में कैदी था, अचानक आईसीस का सरदार बन गया और ईराक से लेकर सीरिया तक कहर बरपा दिया…. अमेरिका फिर इनके शिकार पर उसी तरह निकला जैसे ओसामा के शिकार पर… और फिर आगे क्या हो रहा है वह तो आप सबके सामने है ही, बाकि नीचे दिए विडियो व अन्य लिंक से समझ सकते हैं | यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि अमेरिका से भी गलतियाँ होतीं है और वह गलती से आईसीस के केम्प में हथियार और गोलाबारूद पहुँचा देता है अपने सैनिक समझकर और आइसिस के विरोधियों पर बम गिराकर मार देता है आइसिस समझ कर |
भारत में वापस लौटें तो पायेंगे कि नक्सलवादियों का शिकार करने के नाम पर आदिवासियों का शिकार किया जा रहा है, उनकी भूमि हथियाई जा रही वह भी जिंदल, अडानी, अम्बानी जैसे रईसों के लिए | क्योंकि विकसित भारत में आदिवासियों के लिए कोई स्थान नहीं है, यहाँ तो अंग्रेजी बोलने वाले गुलामों की ही आवश्यकता है, जिनके पास सिवाय नौकरी के और कोई विकल्प ही न हो अपनी आजीविका चलाने के लिए | जबकि आदिवासी तो बिना नौकरी किये भी आसानी से जंगलों में अपना जीवन बसर कर सकते हैं, इसलिए उनसे जंगल भी छीन लिया गया, अब वे जंगल में भी नहीं जा सकते क्योंकि वहां भी घात लगाए राजा के शिकारी बैठे हैं |
इसलिए राष्ट्रवाद को राष्ट्रभक्ति न समझें और न ही राष्ट्रवाद राष्ट्रीय हित से जुड़ा कोई सम्मानित संबोधन या उपाधि है | ~विशुद्ध चैतन्य
ध्यान दें: अपनी असहमति एक शब्द में न व्यक्त करके, स्पष्ट करें विस्तार से, ताकि आपका पक्ष समझने में मुझे सुविधा हो |

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