किताबी रेस्टोरेंट

चुनमुन परदेसी पूरी दुनिया का चक्कर लगा कर आ गया लेकिन उसे यही नहीं समझ में आया कि कौन सा किताबी-धर्म व्यावहारिक है | जिससे भी मिला सभी ने उसे यही कहा कि यदि धर्म को समझना है तो ईश्वरीय किताबों को पढ़ना पढ़ेगा, ईश्वर/अल्लाह द्वारा लिखी किताबी धर्म व्यावहारिक नहीं होते और न ही कोई आचरण में ही लाता है | बस कुछ किताबें पढ़ लो, कुछ आयतें, कुछ श्लोक रट लो, बस हो गये धार्मिक | फिर किसी का घर जलाओ, किसी की इज्ज़त लूटो, भ्रष्टाचार करो या भ्रष्टाचारियों को वोट दो, अपराध करो या अपराधियों को सत्ता दो…. सब माफ़ है |

तो आखिर उदास हो कर उसने किताबी धार्मिक होने का इरादा त्याग दिया और सनातनी ही रह गया | इस भ्रमण से उसे एक अत्याधुनिक किताबी रेस्टोरेंट खोलने का विचार आया | उसे पूरा विश्वास था कि जिस प्रकार किताबी धर्म पूरे विश्व में प्रसिद्द है, उसी प्रकार किताबी रेस्टोरेंट भी प्रसिद्द हो सकता है क्योंकि लोग व्यवहारिक चीजें अब पसंद नहीं करते शायद |

तो उसने रेस्टोरेंट खोल लिया और लोग पहले ही दिन भारी संख्या में पहुँच भी गये | चुनमुन ने सभी को बड़े प्रेम से बैठाया और मेनू पकड़ा दिया | लोगों ने मेनू देखा और अपने अपने पसंद का आइटम ऑर्डर कर दिया | थोड़ी देर बाद चुनमुन सभी के पसंद की आयटम के अनुसार किताबें लेकर आया और सभी देते हुए कहा, “यह रेस्टोरेंट आपके किताबी धर्म की तरह ही किताबी भोजन देता है और मुझे पूरा विश्वास है कि जिस प्रकार आप लोग अपने अपने धर्मो का सम्मान करते हैं और उसकी तरक्की के लिए अधिक से अधिक लोगों का धर्मपरिवर्तन करवाते हैं, वैसे ही मेरे इस किताबी रेस्टोरेंट के लिए भी अधिक से अधिक मित्रों को आमंत्रित करेंगे | आपकी पसंद का आइटम किताब में लिखा है और यह किताब विश्व के बहुत बड़े शेफ ने लिखी है | किताब पढ़िए, बिल चुकाइए और बताइये कि भोजन कैसा लगा ?” ~विशुद्ध चैतन्य

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