आँखें तरेर कर पूछेंगे कि कहाँ लिखा है ईश्वरीय किताबों में आतंकवाद, दंगा करो ?

जब तक समाज आधुनिक नहीं हुआ था, तब तक नदियों, पोखरों, झीलों और तालाबों का जल पीने लायक ही होता था और पशु से लेकर मानव तक वही जल अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते थे | और तब भी भीष्म, अर्जुन, कर्ण, और भीम जैसे स्वस्थ, बलवान योद्धा बिना बोतल-बंद जल और कोक पेप्सी के जीवित रह लेते थे |

प्रकृति ने इतनी सुंदर व्यवस्था की हुई थी कि कोई कुछ भी व्यर्थ नहीं था, यहाँ तक कि हमारा शरीर भी | शरीर को जब प्राण छोड़ देती है तब शरीर के भीतर ही ऐसे जीव जन्म ले लेते हैं जो उसे हजम कर लेते हैं | और उस पर प्राकृतिक सफाई कर्मी जैसे कि गिद्ध, कौए, लकड़बग्घे आदि निर्जीव शरीर को ठिकाने लगाते देते हैं | लेकिन मानव जो खुद को बहुत ही अधिक विकसित व आधुनिक मानता है, वह आज तक प्राकृतिक व्यवस्था के समतुल्य व्यवस्था भी नहीं बना पाया |

इसी प्रकार सनातन धर्म और किताबी धर्मो में अंतर है | सनातन जीव सभी अपनेअपने कर्म स्वाभाविक रूप से बिना लापवाही के करते हैं, लेकिन किताबी धर्मो के मानने वाले सृष्टि को नर्क बनाने पर तुले हुए हैं | कहते हैं हमारा धर्म यह नहीं सिखाता वह नहीं सिखाता यानि जितने भी गलत कर्म हो रहे हैं, वह उनका धर्म नहीं सिखाता, लेकिन करने वाले से पूछो तो पता चलेगा कि वह फलाने धर्म का है और वह फलाने…..

अक्सर धार्मिक लोग कहते हैं कि हमारा धर्म आतंकवाद, बलात्कार, हिंसा, चोरी, रिश्वत खोरी नहीं सिखाता… और उस पर सीना चौड़ी करके कहते हैं कि कहाँ लिखा है हमारी ईश्वरीय किताबों में दिखाओ तो सही….? लेकिन आतंकवादी हिन्दू भी मिल जायेंगे, ईसाई भी मिल जायेंगे, मुस्लिम भी मिल जायेंगे… | दंगों में शामिल होने वाले भी इन्हीं में से किसी धर्म के होंगे और फिर यही लोग आँखें तरेर कर पूछेंगे कि कहाँ लिखा है ईश्वरीय किताबों में आतंकवाद, दंगा करो ?

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यह कुछ वैसी ही बात हो जाती है कि किसी से कहो कि आपके गाँव के तालाब में जो गन्दा पानी जमा हो रखा है, उससे मलेरिया फ़ैल रहा है, तो छूटते ही कहेंगे कि तालाब की वजह से नहीं, मच्छरों की वजह से मलेरिया फ़ैल रहा है | फिर लोग मच्छरों को सजा सुनाते हैं, फाँसी पर चढ़ाते हैं और इस प्रकार आतंकवाद, अलगववाद, अराजकता से हमारा समाज लड़ता चला आ रहा है सदियों से | इसी प्रकार बलात्कार की घटनाएँ भी हैं | मूल कारण कोई खोज नहीं रहा, लेकिन मच्छरों को फाँसी दो क्योंकि मलेरिया उन्हीं के कारण फ़ैल रहा है के नारे लगाते लोग जनपथ में मिल जायेंगे |

अब मुझे कोई संदेह नहीं रह गया कि अभी सामाजिक उपद्रवों और अनाचार का मूल ये किताबी धर्म और उनके नियम व कानून ही हैं | आप लोगों ने अपने अपने सम्प्रदायों को एक ऐसा तालाब बना दिया है कि उसमें ठहरा जल न बाहर ही जा सकता है और न ही स्वच्छ ताजा जल भीतर ही आ सकता है | आपने प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है अपने काल्पनिक ईश्वरों, पैगम्बरों, अवतारों के नाम पर | आपने प्रकृतिक नियमों जिसे मैं सनातन कहता हूँ उसके विरुद्ध कानून बनाये और उसका परिणाम है कि आतंकवाद, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, शोषण, पूंजीवाद नाम के लाइलाज बीमारियों ने समाज को बुरी तरह कमजोर और लाचार बना दिया | आप लोग अपने अपने धर्म नाम के तालाबों को स्वच्छ जल के लाभ से वंचित कर दिया, इसका परिणाम है कि आज आप लोग मच्छरों को फाँसी पर लटका कर यह मान रहे हैं कि बाकी मच्छर भयभीत हो जायेंगे और मलेरिया नहीं फैलेगा |

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कभी ईश्वरीय किताबों से फुर्सत मिले तो समझने का प्रयास कीजियेगा कि वस्तव में ईश्वर का नियम सही था या आपके किताबी कानून | प्राकृतिक सनातनी व्यवस्था सही है या आपकी आधुनिक व्यवस्था |~विशुद्ध चैतन्य

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