सनातनी को सनातन धर्मानुसार जीने क्यों नहीं देते आप लोग ?

कई जमीनी विद्वान हैं जो जमीन में काम करना पसंद करते हैं और कर भी रहे हैं | मैं उनके जमीनी कार्यों की हृदय से प्रशंसा करता हूँ और आशा करता हूँ कि वे इसी प्रकार जमीन पर कार्य करते रहेंगे |

परेशानी मुझे इनसे तब होती है, जब ये विद्वान जमीन से उड़कर फेसबुक में आ जाते हैं गलती से | तब उनको यह दुनिया बड़ी अजीब सी दिखाई देने लगती है | फिर वे कहते हैं कि फेसबुक में समय व्यर्थ करने से अच्छा है जमीन पर कार्य करो |

हज़ारों वर्षों से न जाने कितने लोगों ने जमीन पर कार्य किया और आज भी कर रहे हैं, सिवाय जंगलों, खेतों को नष्ट करने, वायु और जल प्रदुषण बढ़ाने के और कोई महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हों मुझे ऐसा नहीं लगता | कितने लोग वेदों, पुराणों, कुरान, गीता, बाइबिल… आदि रट और रटा रहे हैं, लेकिन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार बढ़ते ही चले जा रहे हैं | इतने सारे विद्वानों के जमीन पर काम करने के बाद भी नेता हम उसे ही चुनते हैं जो, जुमलेबाज हो, व्यापारियों और उद्योगपतियों का हितैषी लेकिन आदिवासियों और किसानों का शत्रु हो | इतने सारे धार्मिक ग्रंथों, धर्मों, सम्प्रदायों, अवतारों, बाबाओं, पैगम्बरों… आने के बाद भी और न जाने कितने और आयेंगे भी…. जनता वोट उन्हें ही देती है जिन्होंने कई तरह के जघन्य अपराधों में अपना नाम रौशन किया हो |


इतने सारे धार्मिक और राजनैतिक संगठन जमीन पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन किसी को नहीं देखा आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाते हुए | और जो गिने चुने एक्के-दुक्के आवाज उठा भी रहे हैं, तो उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज से अधिक नहीं होती, किसी को पता भी नहीं चलता और कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता |

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तो जब जमीन पर गौतम बुद्ध कुछ नहीं सुधार पाए, जब महावीर कुछ नहीं सुधार पाए, जब ओशो कुछ नहीं सुधार पाए…. और फिर इतने सारे आप लोग जो हजारों वर्षो से जमीन पर काम कर रहे हैं.. सब मिलकर नहीं सुधार पाए,  तो भला मैं जमीन पर क्या उखाड़ लूँगा ?

अब फेसबुक की जहाँ तक बात है उससे एक आशा तो जगी है कि जब एक जुमलेबाज को प्रधानमन्त्री बना सकता है फेसबुक, करोड़ों रूपये सालाना खर्च सकते हैं फेसबुक पर गाली-गलौज वाली सेना के लिए राजनैतिक पार्टियाँ…. तो कुछ न कुछ तो बात होगी ही फेसबुक में | फिर मेरे पास इतने पैसे भी नहीं होते कि मैं आप लोगों की तरह जगह जगह यात्रा कर सकूँ, क्योंकि आश्रम से बाहर निकलते ही जेब से पैसे निकालने पड़ते हैं और मेरी जेब हमेशा खाली ही रहती है | तो बाहर निकलने के लिए मुझे कहीं नौकरी करनी पड़ेगी, फिर पैसे कमाने पड़ेंगे फिर उन पैसों से मकान का किराया से लेकर पानी तक की कीमत चुकानी पड़ेगी और पैसे ख़त्म | फिर अगला महिना भी इसी प्रकार मकानमालिक, पानी, बिजली, भोजन की कीमत चुकाने के लिए कमाने में निकल जाएगा… तो मैं इस दुनिया में दूसरों के लिए कमाने तो आया नहीं हूँ | ऐसी कमाई का लाभ क्या ?

मैं ऐसी कमाई करके देख चुका हूँ, महीने के आखिर में जेब खाली हो जाती… और यही सब करते करते कई वर्षों तक कमाने चुकाने के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाया था | अब निकला हूँ तो समझ में आया कि मैं कितनी मूर्खता कर रहा था | दस प्रतिशत सेलेरी सालाना बढती है और बीस प्रतिशत सालाना महंगाई बढती जाती है… बात वहीं की वहीँ रह जाती है | आज कम से कम मुझे पीने के पानी की कीमत तो नहीं चुकानी पड़ती… अपना कुआँ है जब मन करे जितना मन करे पानी पियो, शहर में तो दो रूपये गिलास पानी मिलता है, वह भी छोटा सा गिलास होता है जिसमें घूंट भर पानी आता है |

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तो एक सनातनी को सनातन धर्मानुसार जीने क्यों नहीं देते आप लोग ? काहे पीछे पड़े रहते हैं कि जमीन पर आओ… आप लोग हैं न जमीन पर लगे रहिये | हमें आसमान पर ही रहने दीजिये, जब मौत आयेगी हम भी जमीन पर ही नजर आयेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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