बलिदान, राजनीती और भावनात्मक शोषण

जब बात बलिदान यानि शहादत की हो और वह भी सेना से जुड़ी हो, तब आम प्रजा का भावुक होना स्वाभाविक है | देश का प्रत्येक नागरिक अपने देश की सेना के प्रति सम्मान का भाव रखता है क्योंकि वे निरंतर हमारी सुरक्षा में रहते हैं और घर परिवार से दूर, अपने प्राणों को संकट में डालकर कठिन परिस्थितियों में अपना कर्तव्य निभाते हैं | जितना कठिन उनका प्रशिक्षण होता है, उससे भी अधिक कठिन उनका जीवन भी होता है | एक तरफ अपने देश के प्रति उनका कर्तव्य होता है, वहीं दूसरी तरफ अपने परिवार के प्रति उनकी जिम्मेदारियाँ भी होतीं हैं | दोनों में सामंजस्यता रखकर कार्य करना वास्तव में बहुत ही कठिन कार्य होता है | तो सैनिक सम्मान के अधिकारी हैं इसमें कोई संदेह नहीं हैं | उनकी मृत्यु पर भी उन्हें सम्मान देने की प्रथा है |

उरी के शहीदों को नम आंखों और राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई

सैनिक सीमा पर शत्रुओं से निर्भीक होकर इसीलिए लड़ पाता है क्योंकि उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे कुछ हो भी गया तो सरकार उसके परिवार की देखभाल करेगी | देश की जनता उसके बलिदान को महत्व देगी और उसके पारिवारिक सदस्यों को गर्व से सर उठाकर जीने का अधिकार मिलेगा | और जनता भी शहीद के परिवार के प्रति सम्मान का भाव रखती ही है |

लेकिन इसी भावनात्मक संबंधों को जब राजनीतिज्ञों की गिद्ध दृष्टि लग जाती है, तब ये सम्बन्ध बिलकुल वैसे ही बिगड़ने लगते हैं जैसे राम, गाय, राममंदिर, अयोध्या आदि से सम्बन्ध बिगड़े रामराज के नाम पर | पति-पत्नियों के सम्बन्धों में खटास बढीं, समानता व नारीवादी राजनीती के कारण | हिन्दू-मुस्लिमों के बीच दीवार की ऊँचाई बढ़ी धर्म के नाम पर हुई राजनीती के कारण | सेना अभी तक अछूती रही लेकिन अब वह भी राजनैतिक गिद्धों की नजर में चढ़ गयी | जंगली गिद्ध तो कम से कम किसी के मर जाने पर ही उसका माँस नोचते हैं, लेकिन राजनैतिक गिद्ध तो जिन्दों के माँस नोचने में कोई कसर नहीं छोड़ते |

पहले धर्म के नाम पर उत्पात मचाया, फिर महँगाई और एफडीआई के विरोध में उत्पात मचाया, फिर राममंदिर के नाम पर, फिर गौहत्या के नाम पर, फिर जेएनयु में कन्हैया और देशद्रोही नारों के नाम पर, अब सेना के नाम पर | क्योंकि इनके पीछे छुप कर या इनका स्टीकर लगाकर ये लोग खुद को उतना ही सुरक्षित अनुभव करते हैं, जितना पीके फिल्म में आमिर खान देवी देवताओं के स्टीकर गाल में लगाकर सुरक्षित अनुभव करता था | ये कभी राम का स्टीकर लगा लेते हैं, कभी गाय का और कभी सेना का | फिर जो मर्जी उत्पात करें, जिसका मर्जी बलात्कार करें, जिसकी चाहे हत्या करें, न कानून इनका कुछ बिगाड़ सकता है और न ही जनता | कानून आगे बढ़ेगा तो ये धर्म, गाय और सेना को आगे कर देंगे और कहेंगे कि देखो कानून इनका सम्मान नहीं करता और जतना विरोध करे तो अधर्मी, देशद्रोही, पाकिस्तानी करार दे देंगे | और जनता इतनी मुर्ख है कि इनके कुकर्मों को भी अनदेखा कर देगी है धर्म और भक्ति के नाम पर | फिर चाहे इस्लाम के नाम पर कोई उपद्रव करे या हिंदुत्व के नाम पर…जनता इनके साथ खड़ी दिखाई देगी |

अखलाख के हत्यारोपी का सम्मान

अभी हाल ही में अखलाक का हत्यारोपी बीमारी से मर गया तो नेता अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए तिरंगे में लपेट दी उसकी लाश शहीद बना कर | और नेता भी ऐसे धूर्त कि बेशर्मी से उनको इनाम बाँटते नजर आये, जबकि तिरंगे के अपमान पर उसके परिवार को जेल में डाल दिया जाना चाहिए था | यह बड़े ही आश्चर्य की बात है, कि जिस देश में नेता और जनता ही तिरंगे का सम्मान नहीं करते, उस देश में शहीदों को तिरंगा ओढ़ा कर सम्मान देने की रस्म निभाई जाती है | इसी तिरंगे के लिए न जाने कितने सैनिक अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं हँसते हँसते… और ये नेता और जनता उनकी आहुति को, उनके बलिदानों को हँसते-हँसते स्वाहा कर देते हैं |

तो राजनीति का न तो राष्ट्र के गौरव व सम्मान से कुछ लेना देना होता है और न ही धर्म और मानवता से, ये तो कोरा लाभ-हानि का धंधा है, व्यापार है और जो जनता का जितना भावनात्मक शोषण कर सकता है, वह उतना महान नेता माना जाता है इस जुमलायुग में | आज सही और गलत का निर्णय इस बात पर नहीं लिया जाता कि कोई सही है या गलत है, बल्कि इस बात पर लिया जाता है कि किससे कितना लाभ मिलने वाला है | चुनाव आएगा तो कश्मीर अपने हो जायेंगे, दलित के घर खाना भी खा लेंगे, चारपाई सभा भी लगा लेंगे….लेकिन चुनाव होने के बाद वही कश्मीरी पाकिस्तानी हो जायेंगे, वही दलित देशद्रोही हो जायेंगे, वही आदिवासी नक्सली हो जायेंगे |

इसी प्रकार सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर राजनीती करने वालों अपने ही देश की सेना व उसके कामकाज पर कलंक लगा दिया | जिस सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पिछली सरकार हमेशा मुकरती रही और पाकिस्तान हमेशा भारत पर आरोप लगता रहा, उसे आज दुनिया के सामने नंगा कर दिया हमारे अपने ही नेताओं और मीडिया ने | आज पाकिस्तान को बिना कहे ही सारे सबूत हमारी अपनी ही मीडिया और नेता उपलब्ध करवा रहे हैं कि हमने पहले जो कहा था वह झूठ था | अब पाकिस्तान चला गया भारत के विरुद्ध याचिका लेकर यूएन में ताकि भारत को आतंकी देश घोषित करवा सके | यह तो सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के लिए यह एक सुंदर कल्पना से अधिक कुछ नहीं है… लेकिन फिर भी क्या हमारी मीडिया और नेताओं ने राष्ट्रभक्ति निभाई ?

“इससे पहले भी सेना ऐसी कार्रवाई को अंजाम देती रही है और आतंकियों सहित पाकिस्तानी सेना के जवानों को निशाना बनाती रही है, लेकिन इस तरह की किसी भी जानकारी को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया। हां, यह पहली बार हुआ कि भारत ने एेसी किसी कार्रवाई की बात को स्वीकारा है…” –विस्तार से पढ़ें…

तो सारे बलिदान, आहुति या शहादत सेना और देश की आमप्रजा को ही करने होते हैं, बाकि सभी इनकी मौत और पीड़ा को अपने अपने लाभ के लिए भुनाने में लगे रहते हैं | मीडिया को राष्ट्र व प्रजा से अधिक महत्वपूर्ण टीआरपी और विज्ञापनों से होने वाली कमाई लगती है, तो नेताओं और राजनीतिज्ञों को सत्ता में टिके रहना | उसके लिए वे किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं, ईमान से लेकर देश तक बेचने को तैयार हैं | और इन्हीं नेताओं के दुम्छल्ल्ले गरीबों को, आम नागरिकों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बाँटते फिरते हैं | दस-पन्द्रह रूपये के चाइनीज़ झालर वाली लाइट दीवाली पर लगा लेने से देशद्रोही हो जायेंगे और पटेल की मूर्ति चाइना में बनवाकर अपने देश में लगाकर राष्ट्रभक्त…किसी गरीब के फ्रिज में रखा माँस गौमांस होने के संदेह पर ही जान से मार देने का अधिकार मिल जाता है इन राष्ट्रभक्तों को लेकिन करोड़ों, अरबों रूपये के गौमांस निर्यातकों के कारखानों में इनको गौमांस नहीं मिलता | क्योंकि गरीब से इनको उतना चंदा नहीं मिलता जितना बड़े कारोबारियों से मिलता है | तो राष्ट्रभक्ति इनकी बिकाऊ है |

सर्जिकल स्ट्राइक पर  राजनीती 

और यही बिकाऊ राष्ट्रभक्त नेता और उनके दुमछल्ले, सेना के नाम पर जनता का भावनातमक शोषण करते हैं और वहीं सैनिकों का भी भावनात्मक शोषण होता है | शहीद होने पर बहुत सम्मान जताया जाता है, लेकिन उसके बाद उनके परिवारों की क्या दुर्दशा हो रही है, कोई पूछने भी नहीं जाता | अभी हाल ही में सुनने में आया कि सेना का जो जवान आंशिक या पूर्ण रूप से सेना में कार्य करने के योग्य न रहे उनकी पेंशन में कटौती की जायेगी | यानि कोई जवान यदि किसी मिशन में घायल हो जाता है और सौ प्रतिशत अयोग्य हो जाता है तो उसका मासिक पेंशन ४५,२०० से घटकर २७००० या उससे भी कम १८००० तक हो सकता है |

It was just as well that the commandos returned without significant casualties. If a young soldier with severe injuries — what cold medical jargon terms “100 per cent disability” — from that operation had been invalided out from service, he would have found his monthly pension slashed from Rs 45,200 to just Rs 27,200 — down by Rs 18,000 a month.

The team leaders in the “surgical strikes”, majors with 10 years of service, have been hit even harder — with pension for 100 per cent disability slashed by over Rs 70,000 a month. Junior commissioned officers, the spine of the army, are also badly affected. Naib subedars with 26 years of service will find their 100 per cent disability pensions slashed by Rs 40,000 a month.

“Shocked is an understatement to describe what we feel,” said a top serving general. “Instead of joining us in celebrating the strikes, the MoD has stabbed us in the back.”read full story

अब यदि हम टाइम्स ऑफ इण्डिया की खबर पर नजर डालें तो यह खबर ही झूठी है कि सैनिकों की पेंशन घटाई गई है.. यह महज अफवाह है….

“There was a dramatized article in the media today describing how the pensions of Army personnel who participated in the surgical strike get cut drastically if they got severely injured during the surgical strike. But the fact is, that the disability pensions for war injury cases for personnel who have been invalidated have not been touched, according to the recommendations of the 7th pay commission,” government sources clarified. -read full story

एक तरफ ये लोग कहते हैं कि सेना के कार्यों पर प्रश्न उठाने से, प्रमाण माँगने से उनका मनोबल कम होगा और ये लोग जो कर रहे हैं, उससे सेना का मनोबल बढेगा ???

ये खेल कौन खेल रहा है और क्यों खेल रहा है ? दो भागों में बंटा मीडिया प्रजा को समाचार दे रहा है या गुमराह कर रहा है ? कहीं यह जानबूझ कर खेला जा रहा खेल तो नहीं है ? कैसे पता चले कि कौन सही कह रहा है और कौन गलत, वह भी तब, जब जुमलायुग चल रहा है ? यहाँ प्रधानमंत्री की जबान पर भरोसा नहीं कर सकते, तो सोचिये इस देश के किसी और अधिकारी के जबान पर कैसे भरोसा किया जाए ? कल कह देंगे कि जुमला था कोई क्या बिगाड़ लेगा ?

खैर फिर भी प्रार्थना कीजिये कि सेना का कोई जवान किसी भी अभियान में विकलांग होकर न लौटे, वरना वह आजीवन अपने उस दिन के निर्णय के लिए स्वयं को कोसेगा जब उसने राष्ट्र के प्रति समर्पित होने का संकल्प यह सोचकर लिया था कि उसके जाने के बाद भी राष्ट्र उसके परिवार का ध्यान रखेगा | यह भी हो सकता है कि युद्ध के समय कोई सैनिक अपने को घायल होने से बचाने के चक्कर में पुरे मनोयोग से लड़े ही न ?

तो नेताओं, राजनीतिज्ञों और व्यापारियों को सैनिकों या जनता से कोई मोह नहीं है, उनके लिए तो अपना फायदा ही महत्वपूर्ण है | ये लोग अम्बानी अदानी के करोड़ों के कर्जे माफ़ कर सकते हैं, लेकिन अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिको को पेंशन देने में भी कंजूसी करते हैं | फिर कहते हैं कि सेना के कार्यो पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए, उनसे प्रमाण नहीं माँगना चाहिए, इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है… लेकिन ये पिछली सरकार के समय हुए सर्जिकल स्ट्राइक्स के प्रमाण मिडिया में जो उछल रहे हैं, उससे राष्ट्र का भला हो रहा है ???

अब दूसरा पहलू देखते हैं:

जिस सेना पर प्रजा विश्वास करती है, जिसका वह सम्मान करती है क्या वास्तव में वह सेना जनता का भी सम्मान करती है ?

शायद नहीं क्योंकि उनके संविधान में प्रजा के पक्ष में  होना राजद्रोह है | उन्हें राजा के प्रति ही निष्ठावान होना है हर परिस्थिति में, फिर चाहे राजा गलत ही क्यों न हो और प्रजा सही ही क्यों न |

अपनी भूमि, स्त्री, पशुओं व धन की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है | लेकिन यदि राजा को किसी की भूमि पसंद आ जाये अपने उद्योपति, व्यापारी मित्रों के लिए या कोई उनके किसी मित्र को ही किसी किसान या आदिवासी की भूमि पसंद आ जाये, और किसान या आदिवासी विरोध करें, तब राजा अपने सैनिकों का प्रयोग करता है | राजा को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी की भी भूमि स्त्री या धन हड़प सकता है और सेना व पुलिस इसमें राजा का सहयोग करते हैं | तब यही सैनिक और पुलिस भूल जाते हैं कि ये सभी उसी राष्ट्र के नागरिक हैं जिसकी रक्षा करने की उन्होंने सौगंध खाई थी | ये वही नागरिक हैं जिनकी रक्षा के लिए उन्हें हथियार दिए गये थे | वही सम्मानित सैनिक अपने ही देश के नागरिकों को कभी नक्सली तो कभी आतंकी बताकर मार देते हैं और उनके हाथ नहीं काँपते | क्योंकि उनकी निष्ठा राष्ट्र के नागरिकों के प्रति नहीं, राजा के प्रति होती है | छत्तीसगढ़ में किसी भी आदिवासी महिला या बच्ची को उठा ले जाना पुलिस व सेना के बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे मुगलों के लिए भारतीय स्त्रियों को उठा ले जाना था | क्योंकि सेना व पुलिस की नजर में अपनी भूमि की रक्षा करने के लिए तत्पर ये लोग देशद्रोही हैं | जो सभ्य समाज शहरों में बसा है, उनके लिए भी अपनी भूमि की रक्षा के लिए लड़ रहे ये लोग देशद्रोही हैं | क्योंकि उनको सारे ऐश मिल रहे हैं, उन्हें यहाँ की समस्याओं का कोई ज्ञान नहीं और न ही उनकी रूचि है यहाँ की समस्याओं को देखने जानने में | तो वही सम्मानित सेना व पुलिस क्रूर बन जाती है उन्ही के प्रति जिनसे वे अपेक्षा रखते हैं कि उनका सम्मान सम्मान करें |

क्यों करें फिर ये पीड़ित, शोषित प्रजा सेना का सम्मान ?

राजा का सैनिक (पुलिस हो या सेना का जवान) राजा का वफादार होता है, बिलकुल वैसे ही जैसे किसी जमाने में जमींदारों, साहूकारों के गुण्डे होते थे | जनता तो तब भी सुखी नहीं थी, और आज भी नहीं |  आज लोकतंत्र के नाम पर जनता को गुलाम बनाकर रखा जाता है पहले राजतन्त्र के नाम पर | आज जनता पर लोकतंत्र के नाम पर अत्याचार होते हैं, पहले राजतन्त्र व जमींदारी के नाम पर | क्या बदला ???

न महँगाई कम हुई, न जनता आत्मनिर्भर हो पायी, न देश आत्मनिर्भर हो पाया… विदेशियों के मोहताज आजादी से पहले भी थे और आज भी | आज भी विदेशी आकर भीख न दें, तो भारत का विकास हो पाना असंभव है और पहले भी | आज भी हम विदेशियों के तलुए चाटते है और पहले भी | क्या बदला ?

शोषण तब भी हो रहा था जब हम गुलाम थे और आज भी हो रहा है जब हम तथाकथित आजाद हैं….जमीनें तब भी छीनी जाती थी और आज भी छीनी जाती हैं…. क्या बदला ?

तो प्रजा को स्वयं अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए, इन दोगले नेताओं के बयानों और जबानो को जुमलों से अधिक कुछ नहीं समझना चाहिए | क्योंकि इनकी करनी और कथनी में जमीन आसमान का अंतर होता है | ये लोग केवल भावनात्मक शोषण करते हैं व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए, न कि राष्ट्र व नागरिकों के हित के लिए | ये खोज में लगे रहते हैं कि किसका किससे भावनात्मक लगाव है और किस नब्ज़ को दबाकर कितना अधिक लाभ उठाया जा सकता है, बस उससे अधिक सोचने समझने की शक्ति इनमें नहीं होती | फिर चाहे देश का सत्यानाश हो, फिर चाहे जनता आपस में कट मरे, फिर चाहे कोई बेघर हो जाए, फिर चाहे कोई अनाथ हो जाए… सब इनकी बला से… इनको इन सब से कोई मतलब नहीं |  और यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी भी इनके गलत का विरोध करेगा तो उसे सरकार दण्डित कर सकती है | हमें ही यह सोचना है कि यह देश हमारा है और हम इसके नागरिक तो हम सभी आपस में इसी प्रकार एक दूसरे से लड़ते रहेंगे, एक दूसरे के प्रति सहयोगी नहीं रहेंगे तो क्या राष्ट्र व नागरिकों का उत्थान हो पायेगा ? क्या हम समृद्ध हो पाएंगे ?

नेताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, वे तो पाँच वर्षों में इतना कमिशन कमा लेंगे, जितने में साथ पुश्तें आराम से ऐश कर सकेंगी, लेकिन आम जनता का क्या होगा ? इस देश का क्या होगा ? उन सैनिकों के परिवारों का क्या होगा जो शहीद हो जाते हैं ? क्या कभी किसी गरीब परिवार के शहीद के घर गये आप देखने कि वे कैसी जिन्दगी जी रहे हैं ? ~विशुद्ध चैतन्य

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