वहां मन प्रश्न कर रहा था और अंतर्मन उत्तर दे रहा था

मेरे मित्र ने कुछ प्रश्न पूछे थे और गीता के विषय में जानना चाहा था | ईमानदारी से कहूँ तो मैंने भी गीता धार्मिक ग्रन्थ की तरह नहीं पढ़ी | गीता तो छोड़िये कोई भी धार्मिक ग्रन्थ वैसे नहीं पढ़ा जैसे कि योगी जी, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची आदि ने गहन चिन्तन मनन के साथ अध्ययन किया | यह और बात है कि वे भी आचरण में नहीं ला पाए क्योंकि गीता समझ में उनके भी नहीं आयी  🙂

तो यहाँ मैं अपनी मंद-कुंद अनपढ़ बुद्धि से जितनी भी थोड़ी बहुत समझ में आयी, उसके अनुसार ही बौधाचार्य जी को उत्तर देने जा रहा हूँ |

आदरणीय बौधाचार्य जी,

आपका पहला प्रश्न है, “गीता अगर विश्व का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान वाली किताब है। तो कृष्ण ने इस ज्ञान को आमजन, जनसाधारण से दूर क्यों रखा और ये ज्ञान सिर्फ अर्जुन को ही क्यों दिया ?”

इसका उत्तर है, क्योंकि जब श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था, तब गीता प्रिंट होकर नहीं आयी थी और उनके पास कोई लिखित कॉपी भी नहीं थी | वहाँ एक शिष्य प्रश्न कर रहा था और एक गुरु उत्तर दे रहा था | वहां मन प्रश्न कर रहा था और अंतर्मन उत्तर दे रहा था | वहां शास्त्रों व समाज द्वारा थोपा गया ज्ञान प्रश्न कर रहा था और सनातन ब्रम्हज्ञान उत्तर दे रहा था… तो जो कुछ वहाँ उस समय घट रहा था, वह पूर्वनियोजित नहीं था और एक द्वन्द जो अर्जुन के भीतर चल रहा था, उसी द्वन्द को दूर करने के लिए ही श्रीकृष्ण ने वह उपदेश दिए |

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अब यह कि अर्जुन को ही क्यों दिए ? तो इसका प्रमुख कारण था कि श्रीकृष्ण कान्वेंट एजुकेटेड नहीं थे, इसलिए वे यह नहीं कह सकते थे कि अभी बाद में ट्यूशन में बताऊंगा जब सारे स्टूडेंट्स आ जायेंगे | जो प्रश्न जब उठा, उसी समय यदि गुरु को लगा उत्तर देना चाहिए तो उसी समय दिया जाना चाहिए | और वह स्थिति ऐसी ही थी कि उसी समय उत्तर देना आवश्यक भी था…. श्री कृष्ण प्रिंटेड कॉपी आने की प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे और न ही उन्हें पता था कि कोई और भी उनके उपदेश सुन रहा है और बाद में प्रिंटिंग प्रेस में भिजवा भी देगा प्रिंट करवाने के लिए |

तो इसलिए ही गीता का उपदेश अर्जुन को ही मिला सबसे पहले न कि सर्वसाधारण को | नानक बुद्ध आदि ने जो उपदेश दिए उनमें और कृष्ण के उपदेश में अंतर यह है कि श्रीकृष्ण से प्रश्न करने वाला एक ही व्यक्ति था उस समय |

दूसरा प्रश्न आपका है, “अर्जुन को वह कौन सा ज्ञान दिये जिससे अर्जुन ज्ञान को उपलब्ध हुआ ? जब अर्जुन नही समझ पा रहा था, तो भगवान कृष्ण अंतिम में वह अपना स्वरुप दिखाते है और अर्जुन ज्ञान को उपलब्ध होता है।”

इसका उत्तर यह है कि अर्जुन किताबी ज्ञान से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहा था और जो बचपन से रटाया गया था, सिखाया गया था समाज व शास्त्रों द्वारा, उसे भुलाकर श्रीकृष्ण का ज्ञान स्वीकारने में कठिनाई हो रही थी | श्रीकृष्ण ने कहा कि न कोई किसी को मारता है और न ही कोई मरता है…… तो यह समझने में कठिनाई हो रही थी क्योंकि सामने तो सब अपने ही थे जो आज शत्रु के रूप में खड़े थे | वह अद्वैत को नहीं समझ पा रहा था जिसे समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने विश्वरूप के दर्शन करवाए | और जब विश्वरूप के दर्शन अर्जुन ने किये तो वह यह समझ गया कि मारने व मरने वाला मैं ही हूँ | श्रीकृष्ण भी मैं ही हूँ और अर्जुन भी मैं ही हूँ, दुर्योधन भी मैं ही हूँ और युधिष्ठिर भी मैं ही हूँ…… अहम् ब्रह्मास्मि !

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गीता हमें यही सिखाती है कि हम दूसरों के लिए अहित सोच रहे हैं तो यह निश्चित है कि हम स्वयं से ही नाराज हैं | हम दूसरों को मिटाना चाहते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम स
्वयं से ही असंतुष्ट हैं….. कौरवों की सेना वे लोभ और आकांक्षाएं थीं जो हमारे भीतर ही सर उठाती रहतीं हैं उसे मारना आवश्यक है | अर्जुन हैं हम स्वयं और श्रीकृष्ण हैं हमारा विवेक | रथ है हमारा शरीर और रथ में जूते चारों घोड़े हैं; काम, क्रोध, लोभ, मोह | कुरुक्षेत्र हैं यह संसार जिसमें हमें रथ और इन चारों घोड़ों की आवश्यकता होती है जीवन संग्राम में | लेकिन यदि हम अपने घोड़ों को अपने विवेकानुसार चलायें तो विजय निश्चित है | ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: यह तो था मेरी अनपढ़ बुद्धि का ज्ञान… समझ में आये तो ठीक नहीं तो विद्वानों की कमी नहीं है इस देश में 🙂

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