…. तो मानवता, पशुता, पाशविकता आदि सभी मौलिक गुण धर्म हैं

एक मैसेज में एक मित्र ने विचार रखे, “हमारी समझ में धर्म में अकर्म ,अकार्य और पाप नहीं है।ये तो अधर्म में समाहित है। अगर इन्हें धर्म में समाहित किया गया तो अधर्म कोरा रह जायेगा। अगर धर्म में परोपकारी कार्य और कर्तव्य नहीं होगा तो धर्म खाली डिब्बा रह जायेगा। ऐसे धर्म की क्या आवश्यकता जहाँ परोपकार यानि कि मानवता ना हो ?”

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं यह हमें भली भाँती समझ लेना चाहिए | धर्म और अधर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं | भूमाफियाओं द्वारा भूमि पर जबरन कब्ज़ा करना अधर्म है, लेकिन लालच देकर, बहकाकर, दारु पिलाकर, नकली दस्तावेज बनाकर, रिश्वत देकर अफसरों, मजिस्ट्रेट से पास करवाकर कब्जा कर लेना धर्म है | जबरदस्ती किसी लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बनाना अधर्म है, लेकिन बहकाकर, ब्लैकमेल करके, माँ-बाप को राजी करके जबरदस्ती शादी करके शारीरिक सम्बन्ध बनाना धर्म है |

शायद वैधता को आप धर्म मान रहे हैं | यानि समाज जिसे वैध मानता है वह धर्म है बाकी सभी अधर्म | जैसे सती प्रथा कभी धर्म थी, देवदासी प्रथा कभी धर्म थी, बलि प्रथा कभी धर्म थी | फिर वर्तमान समाज में रिश्वत लेना, घोटाले करना, धार्मिक/जातिगत द्वेष व घृणा का प्रचार प्रसार करना धर्म है |

अगर कर्म को, कर्तव्य को आप धर्म मान रहे हैं, तब भी अधर्म कहाँ मिलेगा देखने ? हत्या करना अधर्म है, लेकिन गौरक्षा के नाम पर हत्या करना पुण्य धर्म | इस्लाम या हिंदुत्व के नाम पर हत्या करना धर्म है | ईश निंदा के आरोप में हत्या करना धर्म है | धार्मिक उन्माद व दंगों में बलात्कार और हत्याएं करना धर्म है | धर्म के नाम पर करोड़ों रूपये हजम कर लेना धर्म है |

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तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि कौन सा कर्म अधर्म है और कौन सा धर्म ? मेरी समझ में तो अभी तक यही आया है न्यायव्यवस्था और न्याय देखकर कि धनवान होना धर्म है और गरीब होना अधर्म है | यदि आप धनवान हैं तो कई लोगों को गाड़ी से कुचलकर भी बेदाग बरी हो सकते हैं और यदि आप गरीब हैं और अपने भूखे बच्चे के लिए एक रोटी भी चुराते हैं तो जेल हो सकती है | यदि आप अमीर हैं, तो आप कितने ही बड़े घोटाले कर लो आप अधर्मी नहीं माने जायेंगे, बल्कि ससम्मान चुनाव जीत कर कानून बनायेंगे | वहीं यदि आप गरीब हैं और झूठे आरोप ही लग गये आप पर तो बीस साल गुजर जायेंगे खुद को बेगुनाह साबित करने में और उसके बाद भी कलंक ढोना पड़ेगा जीवन भर |

रही मानवता और पशुता की बात…. तो मानवता, पशुता, पाशविकता आदि सभी मौलिक गुण धर्म हैं, और इन्हीं से उनकी पहचान होती है | पशु को पशुता सिखाने की आवश्कता नहीं पड़ती और न ही उसे किसी तरह के शास्त्रों धर्मग्रंथों को पढ़ने की आवश्यकता पड़ती है | उसी प्रकार मानवों का स्वाभाविक धर्म ही है मानवता उसके लिए किसी धर्म ग्रन्थ शास्त्र को पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती | उलटे इन धर्म ग्रंथों को पढकर मानव हिंदु मुसलमान बन जा जाता है मानव या इन्सान नहीं बन पाता | धर्म ग्रंथो को पढ़कर मानव दड़बों में कैद हो जाता है, सनातनी नहीं हो पाता | जबकि आदिवासी सनातनी होते हैं क्योंकि वे कोई धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़ते, पशु-पक्षी सनातनी होते हैं क्योंकि कोई धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़ते…. और जो सनातनी होते हैं वे किसी पर अपनी मान्यताएं नहीं थोपते और न ही दूसरों के खान-पान, रहन सहन पर मीन-मेख निकालते हैं | वे सभी के साथ सहज रहना जानते है लेकिन तभी तक, जब तक सामने वाले से उसे असुविधा न हो रही हो | जैसे कोई सनातनी शांति और एकांत चाहता है और कोई रामभक्त जोर जोर से रामायण पढ़ने का शौक रख
ता है, तो सनातनी रामायण पढ़ने वाले से दूरी बना लेगा | क्योंकि सनातनी सभी को स्वाभाविक रूप में रहने देना चाहता है | सनातनी यही समझेगा कि रामायण बांचने वाला जोर जोर से रामायण इसलिए बाँच रहा है, क्योंकि उसे अपने ईश्वर को विश्वास दिलाने की आवश्यकता पड़ रही है कि वह उसका सच्चा भक्त है | इसी प्रकार स्पीकर में फ़िल्मी गानों की धुनों में माता की भेंटे व भजन बजाने वाले भी यही सिद्ध करना चाहते हैं कि वे सच्चे भक्त हैं क्योंकि होते नहीं हैं |

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तो धर्म और अधर्म सिक्के के दो पहलू हैं और सनातनी दोनों पहलू को स्वीकारता है | अधर्म वास्तव में और कुछ नहीं, केवल ज्ञान का अभाव मात्र है | जिस प्रकार अँधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, ठीक वैसे ही अधर्म का भी अपना कोई अस्तित्व नहीं है | अधर्म वास्तव में धार्मिक लोगों कायरता, दिशा हीनता, संकीर्णता और स्वार्थ की ही उपज है | जितने भी आतंकी पैदा हुए, जितने भी अत्याचारी पैदा हुए, जितने भी धर्मों के ठेकेदार और नफरत के सौदागर आज आस्तित्व में हैं, वे सभी धार्मिकों की कायरता, भीरुता, स्वार्थलोलुपता की देन हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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