मान लिया कि पूरा देश डिग्रीधारी हो गया और बोरों में भर-भर कर डिग्रियाँ आ गयीं हर घर में

सरकार चाहती है कि शिक्षा के व्यापार में वृद्धि हो, हर शिक्षण संस्था अरबपति हों और हर नागरिक डिग्रीधारी हों…..

मान लिया कि पूरा देश डिग्रीधारी हो गया और बोरों भर-भर कर डिग्रियाँ आ गयीं हर घर में | कल्लू प्रिंटिंग प्रेस के साथ साथ देश भर के सारे प्रिंटिंग प्रेस, न्यूज़ व शादी ब्याह के कार्डों कि प्रिंटिंग छोड़, डिग्रियाँ प्रिंट करने में दिन रात लग गये….अब ?

अब क्या करें सब ? उनको रोजगार कहाँ से देंगे ? हर कोई डिग्री लेकर घूम रहा होगा, एक की जगह सौ सौ डिग्रियाँ दिखा रहा होगा… उनको नौकरी कैसे देगी सरकार ? नौकरी ही नहीं मिलेगी उनको तो उनकी शादियाँ कैसे होंगी ? शादियाँ ही नहीं होंगी तो दस-दस बच्चे पैदा करवाकर धर्म बचाने का सपना कैसे पूरा होगा ?

ये बेरोजगार खायेंगे कैसे ? क्योंकि इनके माँ-बाप तो अपने खेत-खलिहान बेचकर इनके लिए डिग्रियाँ खरीद लिए होंगे…. तो वे खेती भी नहीं कर सकते | मजदूरी करके भी वे कितना कमा लेंगे ? रिक्शा चलाकर भी वे कितना कमा लेंगे ?

मुझे नहीं लगता कि वे शिक्षा पर खर्च हुए मूल धन का एक अंश भी निकाल पायेंगे |

फिर क्या करेंगे ?

विदेशी कंपनियों को भारत बुलाना पड़ेगा ईस्ट इण्डिया कंपनी की ही तरह | सारे विदेशी कम्पनियाँ नाटो की तरह ही कोई संगठन बना लेंगे और East India Company की ही तरह Prosper India Company नाम रख लेंगी | Prosper India Company से नेताओं और धर्मों के ठेकेदारों, नफरत के सौदागरों को तो मोटा कमीशन मिल जायेगा, लेकिन डिग्रीधारियों, बचे खुचे किसानों और लुप्त हो चुके आदिवासियों के साथ साथ बाकी मिडल-क्लास जनता को क्या लाभ होगा ? तब भी कितने लोगों को नौकरी पर रख पायेंगे ये विदेशी कम्पनियाँ ?

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चलिए मान लिया कि देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी विदेशी कम्पनी उठा लेती है, बिल्कल ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरह | उन्हीं के मंत्री, प्रधानमंत्री भी बन जाते हैं यहाँ, उन्हीं का राष्ट्रपति भी अपना ऑफिस यहीं बना लेते हैं | उनके देश और हमारे देश में आने जाने के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता ही नहीं होती और One Nation का फार्मूला लागु हो जाता है | झंडा भी उन्हीं के देश का और हमारी देश की सुरक्षा भी विलायती सेनाओं के जिम्मे हो जाता है…… इतना विकास कर लेने के बाद जब कभी हमारे बच्चे पूछेंगे कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने किन लोगों से देश आजाद करवाया था, तो हम क्या जवाब देंगे ?

यह भी इतनी बड़ी बात नहीं, बड़ी बात तो यह है कि क्या तब वे विलायती सरकार और कम्पनियाँ भारत से बेरोजगारी बिलकुल उसी प्रकार मिटा पाएंगी, जैसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मिटाया था ? जैसे मुगलों ने मिटाया था ?

सुना है कि जब तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज रहा भारत में, तब तक कोई भूखा नहीं मरा, कोई बेरोजगार नहीं रहा… बस शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्ला खान, खान अब्दुल गफ्फार खान, गाँधी जी जैसे लोगों ने देश में अस्थिरता और अराजकता उत्पन्न किया, जिसके कारण वे लोग नाराज हो गये और हमें छोड़ कर भाग गये | उनके जाने के बाद से ही यह देश भुखमरी और बेरोजगारी झेल रहा है, इसलिए हमारे देश के प्रधानमंत्री विदेश घूम-घूम कर सबको मनाने की कोशिश कर रहे हैं और हो सकता है कि कह भी रहे हों; “हमने गाँधी को मारकर आप लोगों के अपमान का बदला ले लिया है, अब आप लोग वापस आ जाओ अ
पने देश में | यह देश तो आज भी आपकी ही भाषा और संस्कृति अपनी मातृभाषा व संस्कृति समझता है | हमारे देश में बच्चे पैदा ही किये जाते हैं, आप लोगों की सेवा के लिए और बच्चा पैदा होते ही कहता है मुझे अमेरिका जाना है, ब्रिटेन जाना है…. इतना प्रेम तो हम भारतीय अपने देश, भाषा और संस्कृति से भी नहीं करते…. “

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मेरा मानना है कि शिक्षा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, डिग्रियाँ नहीं | शिक्षित व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए बहुत कीमती होता है, वह आत्मनिर्भर होता है, चाहे वह रिक्शा ही चलाये | चाहे वह खेती-मजदूरी ही करे….. लेकिन पढ़ा लिखा डिग्रीधारी राष्ट्र व समाज में बोझ ही होता है क्योंकि वह पढ़ लिखकर विदेश भागता है या बेरोजगारों की लाइन में खड़ा हो जाता है | कोई उद्योग नहीं शुरू कर पाता, आत्मनिर्भर नहीं हो पाता यदि उसे नौकरी नहीं मिली तो…. खैर जाने दीजिये…. मेरे जैसे अनपढ़ की बातें पढ़े-लिखों को वैसे भी समझ नहीं आती….. बाँटिये डिग्रियाँ | कुछ नहीं तो कम से कम शिक्षा जगत के व्यापारी और प्रिंटिंग प्रेस वाले तो बेरोजगार नहीं ही रहेंगे, फिर चाहे सारा देश ही बेरोजगार क्यों न हो जाए !

मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि सारा विश्व भारत के नागरिकों को ही रोजगार देने, समृद्ध करने, व विकसित करने पर क्यों तुला हुआ है, अपने देश के बेरोजगारों को रोजगार व समृद्धि क्यों नहीं दे रहे यदि इतने ही सक्षम हैं तो ? ~विशुद्ध चैतन्य

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