हमारे देश की मूल समस्या है दुम्छल्लापन

क्या हम जानते हैं कि हम दिन प्रतिदिन कमजोर क्यों होते जा रहे हैं ? क्या हम जानते हैं कि हमारी सोचने समझने की क्षमता दिन प्रतिदिन क्यों कम होती जा रही है ? क्या हम जानते हैं कि हम इंसान बनने की अपनी योग्यता खोकर मात्र मशीन बनते जा रहे हैं ?

नहीं जानते न ?

जानेंगे कैसे, उसके लिए विवेक चाहिए होता है सोचने समझने की क्षमता चाहिए होता है और वह तो हम पहले ही खो चुके हैं | अब तो हम केवल कुछ नेताओं, धर्मों के ठेकेदारों के इशारे पर नाचने गाने वाले खिलौने मात्र रह गये हैं | नेता ही हमें बताता है कि कब खुश होना है और कब दुखी होना है | नेता ही हमें बताता है कि कौन हमारा शत्रु है और कौन मित्र | नेता ही हमें बताता है कि देशभक्ति क्या है और देशद्रोह क्या है | नेता ही हमें बताता है कि महँगाई डायन है या विकास……. और हम पचपन रूपये किलो की दाल पर छाती पीट-पीट कर सड़कों पे लोट रहे होते हैं कि महँगाई ने जीना मुश्किल कर दिया, चूल्हा भी नहीं जलता अब तो घर का….. आदि इत्यादि और फिर एक दिन पता चलता है कि दो सौ रूपये दाल खाने वाले विकसित देश के लोग होते हैं, जीडीपी बहुत तेजी से बढ़ रही है, इसलिए अब देश गरीब नहीं है और न ही महँगाई है….और सब लोग नाचने लगते हैं कि अच्छे दिन आ गये, महँगाई और भुखमरी चली गयी, हम सब अमीर और विकसित हो गये….. फिर एक दिन पता चलता है कि विकासशील देश नहीं रहा भारत और फिर से दुखी हो जाते हैं… फिर एक दिन पता चलता है कि अमेरिका ने तारीफ़ कर दी कि भारत बहुत अच्छा देश है और फिर सब नाचने लगे अच्छे दिन आ गये….

तो अपना विवेक नहीं है, अपनी आँखें नहीं हैं, सोचने समझने की शक्ति नहीं है….एक नेता कहेगा कि नाचो तो नाचने लगेंगे, एक नेता कहेगा कि धर्म खतरे में हैं और हर कोई अपना अपना धर्म तिजोरी में छुपाने दौड़ पड़ेगा | एक नेता कहेगा कि पाकिस्तान की बिरयानी बहुत अच्छी है इसलिए मैं बिन बुलाये ही चला गया खाने, तो पाकिस्तान के प्रति प्रेम उमड़ आएगा, पाकिस्तान भाई नजर आने लगेगा….फिर एक दिन नेता कहेगा कि पाकिस्तान शत्रु है…तो फिर वह शत्रु हो जाएगा, पकिस्तान को मिटा देने के सपने देखे जाने लगेंगे… फिर कोई नेता कहेगा कि पाकिस्तान से हमारा पुराना सम्बन्ध है, अम्बानी अडानी सब का व्यापार वहां जमा हुआ है… बस फिर से पाकिस्तान के लिये प्रेम उमड़ आएगा…..

तो मजा आता है न कभी इधर, कभी उधर डोलने में ? क्योंकि इसमें अपना दिमाग तो खर्च होता नहीं है…. लॉकर में सेफ रख रखा है अपना दिमाग…जब बुढ़ापा आयेगा तब पेंशन के रूप प्रयोग करेंगे इसी दिमाग को क्योंकि तब तक अच्छा ख़ासा ब्याज भी जमा हो जाएगा दिमाग का |

चलिए कोई बात नहीं डोलते रहिये ऐसे ही यदि आपको ऐसे में ही संतुष्टि मिल रही है, आनन्द मिल रहा है | लेकिन मैं कुछ जागरूक नागरिकों से यह जानना चाहता हूँ कि क्या उन्हें पता है हमारे देश की मूल समस्या क्या है ?

चलिए मैं ही बता देता हूँ | हमारे देश की मूल समस्या है दुम्छल्लापन या बिना जाने समझे किसी एक पीछे दुम हिलाने लगना | हमारे देश की मूल समस्या है आत्मनिर्भरता को महत्व न देकर गुलामी को महत्व देना |

अब आप कहेंगे कि हम तो नौकरी करते हैं, गुलामी थोड़े ही करते हैं ?

बिलकुल ठीक, आप नौकरी ही करते हैं और एक नौकर ही नौकरी करता है और नौकर गुलाम ही होता है तब तक,  जब तक वह आत्मनिर्भर न हो जाए | और आत्मनिर्भरता आएगी तभी जब आपके पास अपनी भूमि हो, अपने खेत हों, निःशुल्क जल हो और निश्चिन्त वातावरण हो | आपके पास अपना व्यापार हो, अपना कुटीर उद्योग हो और किसी भी परिस्थिति में किसी से समझौता न करके अपने अंदाज़ में जीने का अधिकार हो |

लेकिन यदि आप इस डर से नौकरी कर रहे हैं कि नौकरी चली जायेगी तो बेघर हो जायेंगे, बच्चों को कैसे खिलाएंगे, पढ़ाएंगे लिखाएंगे कैसे…. तो फिर आप गुलाम हैं | क्योंकि नौकरी भय से की जा रही हो तो आप स्वतंत्र नहीं हैं | लेकिन यदि आप अपने घर परिवार को लेकर सुरक्षित व सुनिश्चित हैं.. तब नौकरी आपके लिए नौकरी नहीं, बल्कि समाज को कुछ महत्वपूर्ण सहयोग देने का माध्यम बन जाता है | तब आप पैसों के लिए नौकरी नहीं करते, बल्कि अपने शौक से नौकरी करते हैं |  और ऐसी स्थिति में कोई आप पर दबाव नहीं बना सकता है और न ही काम आपको बोझ लगता है |

ठीक इसी प्रकार देश में जब हर किसान को उसकी मेहनत की पूरी कीमत मिलने लगती है तो देश मजबूत होता है…….

अभी खबर पढ़ रहा था कि पुतिन ने पुरे विश्व को जैविक अनाज उपलब्ध करवाने का संकल्प लिया है…. जरा सोचिए एक नेता अपने देश को आत्मनिर्भर करने के लिए तत्पर है | वह जानता है कि यदि किसान मजबूत होंगे तो देश मजबूत होगा…..

लेकिन हमारे यहाँ तो यह सब बेकार की बातें हैं | हमारे लिए यह कोई समस्या है ही नहीं, हमारे लिए तो समस्या है कि किसने इस्लाम कबूल लिया और किसने हिन्दू या इसाई धर्म | हमारे देश में तो चर्चा यह नहीं होती कि कितनी बंजर भूमि का सदुपयोग किया गया, कितना अनाज उपजा, कितने किसान समृद्ध हुए… हमारे यहाँ चर्चा होती है केजरीवाल ने क्या कहा, मोदी ने क्या कहा, पाकिस्तान में किसी हिन्दू लड़की का बलात्कार हो गये, बांग्लादेश में मुसलमान ने हिन्दू बच्चे के हाथ टॉफी छीन ली…..यह जानते हुए भी इन सब विषयों से भारत को कोई लाभ नहीं होने वाला…फिर भी लगे हुए हैं देश की आनबान शान की खातिर |

तो न तो हमारे नेता को पता है कि आत्मनिर्भरता का अर्थ क्या है और न ही जनता को…. बच्चे पैदा किये, अंग्रेजी पढ़ा दी और भेज दिया विदेश… हो गया देश आत्मनिर्भर, हो गया परिवार आत्मनिर्भर |  दोगुनी कीमत में हथियार और लड़ाकू जहाज खरीद लिए, पकिस्तान को हम सबक सिखा देंगे, चीन को मिटटी में मिला देंगे वाला डायलॉग मार दिया… बस हो गया देश आत्मनिर्भर.. अरे मूर्खो देश नहीं वे लोग आत्मनिर्भर हो रहे हैं जो इन सबका सौदा कर रहे हैं……चार सैनिक चीन से घुस आयेंगे और तुरंत दौड़ पड़ेंगे नए हथियार और जहाज खरीदने, चार आतंकी पकिस्तान से घुस आयेंगे और दौड़ पड़ेंगे हथियार खरीदने….. अरे इतने सारे हथियार जो आज तक खरीदते आये, उनका क्या आचार डाल दिया ? जब आतंकी आते हैं तो हमारे सैनिक मारे जाते हैं, नागरिक मारे जाते हैं… चार आतंकियों से निपट नहीं पाते…. फिर हथियारों पर इतने पैसे बर्बाद करके लाभ क्या ?

मुझे तो बड़ा अजीब लगता है हथियारों की यह होड़ | सारा पैसे इस होड़ में बर्बाद हुआ जाता है, और देश की स्थिति बद से बदतर हुई चली जाती है… तेजस विमान से जब हम युद्ध नहीं लड़ सकते, जब पाकिस्तान से ही मुकाबला नहीं कर सकते… और बाहर से विमान खरीदने हैं तो क्यों खर्च कर रहे हैं हम तेजस आदि बनाने पर ? सीधे हर साल बाहर ही की कंपनियों को ही ऑर्डर कर दिया करें… अपने देश के हवाई जहाज बनाने वाले कारखानों में खिलौने आदि बनाने का काम शुरू कर दें…. उन खिलौनों को बेचकर ही काफी कमाई हो जायेगी….

तो अपनी अक्ल लगाइए… हम तो आज तक इस लायक भी नहीं हुए कि ढंग की कील बना लें, वह भी चाइना से मंगवा रहे हैं….तो आत्मनिर्भर कब होंगे ?

~विशुद्ध चैतन्य

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