चार बजे से लेकर आठ बजे तक धर्मग्रंथों का पाठ करना चाहिए

अक्सर सोचता हूँ कि जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, वे सभी किसी न किसी राजा महाराजा की ही स्तुतियों से भरी हुईं हैं | वह सर्वसाधारण के हित के लिए कैसे हो सकती है ? यदि हम वर्तमान स्थिति देखें तो यह प्रमाणित भी हो जाता है कि इन धार्मिक ग्रंथों से आम जन का कोई भला नहीं होता | भला होता है नेताओं का, धर्मों के ठेकेदारों, दुकानदारों और उनके दुमछल्लों का | आम जनता तो तब भी दुखी थी और आज भी है | तब भी धर्मों के ठेकेदार उन्हें आपस में लड़वाते थे जाति और वर्ण के नाम पर आज भी लड़वाते हैं जाति और धर्म के नाम पर…. क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है कि धर्म आम जन के हितार्थ उपयोग में आये, बजाय परधर्म निंदा करने के ?

मेरा मानना है कि धार्मिकग्रंथ धर्मों के ठेकेदारों और नेताओं को पढ़ाया जाए ताकि उनमें दैवीय न सही, कम से कम मानवीय गुण ही विकसित हो सकें ? यदि आपको लगता है कि धर्म ग्रंथों को पढ़ने से लोगों में दया, परोपकार, करुणा, त्याग आदि का उदय होता है, तो इसे नेताओं, धर्मों के ठेकेदारों और सड़क छाप लुच्चे-लफंगों की सेनाओं के लिए अनिवार्य क्यों नहीं कर दिया जाता ? आम जनता तो बिना धार्मिक ग्रंथो को पढ़े भी नेताओं और धर्मों के ठेकेदारों के एक इशारे पर अपने बचपन के दोस्त और पड़ोसियों की गर्दने उड़ाने को तैयार रहते हैं | आम जनता तो इतनी भोली होती और करुणामय होती है कि नेताओं के घडियाली आंसुओं, झूठे वादों और जुमलों को भी सच मानकर पिघले हृदय से उन्हें वोट दे देती है जो उन्हें ही लूटने के लिए सत्ता में आते हैं | जनता तो बिना धार्मिक ग्रंथों को पढ़े भी टैक्स और महँगाई की मार झेलती है…. तो मुझे नहीं लगता कि आम जनता को धार्मिक ग्रंथों, पूजा पाठ आदि की कोई आवश्यकता है | इन सबकी आवश्यकता तो धर्मों के ठेकेदारों, राजनेताओं, मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारीयों आदि को अधिक हैं | इन सभी को कम से रोज सुबह चार बजे से लेकर आठ बजे तक धर्मग्रंथों का पाठ करना चाहिए, तभी धर्मग्रंथों का सदुपयोग हो पायेगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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