"बड़ी बड़ी बातें लिख देने से कोई महान नहीं हो जाता !"

“बेवकूफ हैं वे लोग जो बड़े बड़े पोस्ट लिखते हैं फेसबुक पर ! न केवल अपना समय बर्बाद करते हैं, बल्कि दूसरों का भी समय बर्बाद करते हैं ! मैं तो बस एक दो लाइन के पोस्ट कर देता हूँ और कोई सूचना होती है तो वह देता हूँ….. ! और मिलता है क्या है फेसबुक पर लिखने से ? बस दो चार लोग लाइक कर देते हैं, दो चार कमेन्ट आ जाते हैं उससे क्या कोई फायदा होता है ? अपना पैसा और टाइम बर्बाद करो और वह भी ऐसे लोगों के लिए जिनसे न कुछ मिलना है और न कभी देखा है…. !”

उपरोक्त प्रवचन अक्सर गुरुजनों, विप्रजनों, विश्वविख्यात संतों-महंतों से मुझे सुनने मिलता है | और सुनने मिलता है;

“बड़ी बड़ी बातें लिख देने से कोई महान नहीं हो जाता !”

“यह तो अपना सौभाग्य समझो कि हिन्दू धर्म में जन्म लिए हो, इसलिए इतना कुछ बोल जाते हो, वरना किसी और धर्म में होते तो सोचने के लिए सर भी नहीं होता धड़ में !”

“आपने जमीन पर अभी तक क्या किया है ? कुछ करके दिखाओ तो कोई बात है, फेसबुक पर लिखने से दुनिया नहीं बदल जाने वाली !”

तो यह सब सुनाने वाले लोग और विद्वान कभी सोचते हैं कि आप लोग मुझे यह सब सुना कहाँ रहे हैं ? कभी सोचते हैं कि मुझे आप लोग जानते कैसे हो ? कभी आप लोगों ने सोचा है कि मुझे यह सब सलाह आप लोग दे क्यों रहें हैं ?

शायद नहीं ! क्योंकि इतना सब सोचने समझने लायक दिमाग ही नहीं बचा | बचेगा भी कैसे क्योंकि विद्वान बनने के लिए दुनिया भर का कबाड़ जो इकठ्ठा कर लिया दिमाग में, तो कुछ और नई बातों के लिए जगह बची ही कहाँ होगी ?

जितने लोग यह मानते हैं कि फेसबुक समय की बर्बादी के सिवाय कुछ और नहीं है, उनसे कहना चाहता हूँ कि उन्हें फेसबुक छोड़ देना चाहिए या फिर केवल सीमित मित्रों को रखें ताकि क्या खाया क्या पिया आदि गपशप कर सकें | मेरे लिए फेसबुक वरदान सिद्ध हुआ |

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क्योंकि फेसबुक एक ऐसा माध्यम है, जो सनातन धर्म के सिद्धांत पर कार्य करता है | और आश्चर्य की बात यह है कि सभी दड़बों के विद्वान इसमें पाए जाते हैं और सभी एक दूसरे की बुराई करते दिखाई देते हैं | और उन्हें देखकर मुझे हँसी आती है कि जो अपने अपने दड़बों को महान बता रहे हैं, उनके दड़बों ने फेसबुक जैसा कुछ नहीं बनाया | यह एक ऐसा प्लेटफार्म हैं जो व्यक्ति को स्वयं से पहचान करवाता है | यह ऐसा प्लेटफार्म है जो आपकी खोई प्रतिभा को फिर से जानने व समझने का अवसर देता है |

मेरे जैसा व्यक्ति जो जीवन भर अकेला रहा, ऐसे दोस्त या साथी नहीं खोज पाया जो यह कहता हो कि मैं अपनी जगह सही हूँ | जितने भी मिले मुझे ही बदलने में लगे रहे… तो ऐसे में २००८ में फेसबुक की दुनिया में उतरा | शुरू में लोगों को पढ़ता था क्योंकि मुझे लिखने में संकोच होता था | मुझे भय होता था कि यदि मेरी कोई बात किसी को बुरी लगी तो वह मुझसे दोस्ती तोड़ देगा | यह भय मुझे वास्तविक जीवन में बिलकुल नहीं था, लेकिन यहाँ था | मैं जानता था कि मैं जो कुछ कहता हूँ वह भेड़ों के समाज व मानसिकता के विरुद्ध होता है, इसलिए वास्तविक जीवन में तो कोई मुझसे जुड़ा नहीं, फेसबुक में भी कोई नहीं जुड़ेगा |

फिर एक दिन एक मित्र ने ताना मारा कि कॉपी पेस्ट करने के सिवाय कुछ और आता भी है या नहीं ? बस तय कर लिया कि अब अपना ही कुछ लिखूँगा | तीन चार लाइन लिखना भी मेरे लिए बहुत ही मेहनत का काम होता था | लेकिन लिखना शुरू किया और उसके बाद पता ही नहीं चला कि कब कितना लिखने लगा | जैसे जैसे लिखता गया भीतर से नई नई बातें निकलने लगीं और फिर मुझे आवश्यकता नहीं पड़ी कॉपी पेस्ट करने की | आज भी मैं कॉपी पेस्ट करता हूँ तो लेखक का नाम अवश्य देता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि एक लेख को लिखने में
लेखक को कितनी मेहनत करनी पड़ती है | मैं यह भी जानता हूँ कि फेसबुक पर लिखने पर कोई कीमत नहीं मिलती, इसलिए कम से कम उस लेखक का सम्मान तो किया ही जा सकता है उसके लेख के साथ उसका नाम देकर |

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तो फेसबुक से बेहतर इस समय ऐसा कोई माध्यम नहीं है, जहाँ आप अपना मौलिक विचार रख सकें और जान सकें कि आपके विचारों के समर्थक भी दो चार तो हैं ही इस दुनिया में | जब नफरत फ़ैलाने वालों के समर्थक हैं, जब धर्म की राजनीती करने वालों के समर्थक हैं, जब देश को बर्बाद करने वालों के समर्थक हैं, जब आपस में लड़वाने वालों के समर्थक हैं, जब गाली-गलौज करने वालों के समर्थक हैं, जब हिंसा व मारकाट के समर्थक हैं….. तो फिर मेरे जैसे सनातनी के समर्थक भी दो चार भी मिल जाएँ तो बहुत बड़ी बात है | मुझे ख़ुशी है कि मुझसे जुड़ने वाले जाति व धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि केवल विचारों के आधार पर जुड़ रहे हैं | यही मेरी उपलब्धि है | यहाँ सभी अपनी राय रखते हैं वह भी धर्म के आधार पर नहीं बल्कि राष्ट्रहित व मानवहित के आधार पर | हाँ कभी कभी कुछ लोग धर्म के नाम पर उपद्रव करते हैं तो उन्हें मैं बाहर कर देता हूँ ताकि वे अपने लोगों में खुश रहें और दूसरों के घर गंदगी फ़ैलाने की आदत छोड़ने का प्रयास कर सकें | न भी छोड़ें तो उनके चाहने वाले तो लाखों में हैं उन्हें मुझसे जुड़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है |

जिन्हें लगता है कि मुझे जमीन पर काम करना चाहिए, जिन्हें लगता है कि मुझे पैसे कमाने के लिए काम करना चाहिए, जिन्हें लगता है कि मुझे अपनी आध्यत्मिक व पराविज्ञान की शक्तियों से लोगों की सहायता के लिए कार्य करना चाहिए… उनसे अनुरोध है कि वे स्वयं करें, मुझे सलाह न दें | मुझे क्या कब और कैसे करना है, वह मैं स्वयं तय करता हूँ | मैं जब फेसबुक में नहीं आया था तो आप लोग मुझे जानते भी नहीं थे, और आज मुझे आप लोग सीखा रहे हैं कि मुझे क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए ?

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फिर मुझे न तो विद्वान बनने में कोई रूचि है, न महान बनने में और न ही धनवान बनने में | यदि आपको लगता है कि आपकी सलाह से मैं यह सब प्राप्त कर सकता हूँ तो कृपया स्वयं पर प्रयोग करें और महान बनें, विद्वान बने, धनवान बनें…. मुझे अब इन सब की कोई आवश्यकता नहीं है | मैं लिखता हूँ ताकि किसी को कोई राह मिल जाए, लेकिन यदि आपको लगता है कि मैं ही भटका हुआ हूँ, तो आप गलती कर रहे हैं | यह मेरा अपना चुना हुआ मार्ग है और इस मार्ग में जब मुझे जिस वस्तु या सुविधा की आवश्यकता होगी उसकी व्यवस्था प्रकृति स्वयं करेगी या यह कहें कि ईश्वर स्वयं ही मेरे सुख सुविधा की व्यस्था करता है तो गलत नहीं होगा | कल मैं फिर से फुटपाथ पर पड़ा होऊंगा तो भी आप लोगों को दोष नहीं दूँगा | इसलिए आप लोग मेरी चिंता न किया करें | यदि आपको लगता है कि मेरे पोस्ट आपका समय व्यर्थ करते हैं, तो अन्फ्रेंड कर दें, लेकिन मुझे सुधारने के चक्कर में न पड़ें | ~विशुद्ध चैतन्य

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