यही है भेड़चाल !


मैं जब भी कभी यह खबर पढ़ता हूँ कि किसी मंदिर से किसी दलित को निकाल दिया गया या किसी को पूजा करने नहीं दिया गया तो निकालने वाले और जाने की जिद करने वाले दोनों पर ही हँसी आती है | अब बिलकुल भी ऐसा नहीं लगता कि कुछ भी गलत हो रहा है | क्योंकि दोनों ही ईश्वर से अपरिचित हैं और दोनों ही मुर्खता की सीमाओं से परे हो चुके हैं | मंदिर को इतना महत्वपूर्ण बना दिया कि वह अब मान सम्मान से जुड़ गया |

इसी प्रकार अंग्रेजी का महत्व है | असाम, बंगाल आदि में तो कोई अंग्रेजी की पढ़ाई कर ले तो उसे अंग्रेज सरकार से भी अधिक सम्मान मिलने लगता है, वहीँ जो अंग्रेजी नहीं जानता फिर वह कितना ही श्रेष्ठ कार्य कर रहा हो, कोई महत्व नहीं मिलता |

अब जरा सोचिये, इस्लामिक देश में कोई मंदिर न जाए तो वहां ईश्वर नाराज नहीं होता लेकिन मस्जिद न जाने पर नाराज हो जाता है | ईसाई देशों में कोई मंदिर या मस्जिद न जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन गिरजाघर न जाए तो ईश्वर नाराज हो जाता है | कोई भारतीय यदि चाइनीज़, जापानीज़, हिंदी न जाने तो शर्मिंदा नहीं होता, लेकिन अंग्रेजी न जाने तो शर्मिंदा हो जाता है | चाइना में कोई हिंदी न जाने तो कोई शर्मिंदा नही होता…..

यही है भेड़चाल ! यदि हम महान दार्शनिकों को देखें तो सभी अपनी अपनी भाषाओँ में ही अपनी बात कही, और महान हो गये | वे लोग शर्मिंदा नहीं थे दूसरी भाषा जानने में | श्रीकृष्ण हों या भीष्म, चाणक्य हों या चन्द्रगुप्त… कोई भी इस बात पर शर्मिंदा नहीं थे कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती | तक्षशिला और नालंदा विश्वविख्यात हुए बिना अंग्रेजी के | लेकिन आज हमारा समाज मानता है कि बिना अंग्रेजी के कोई कुछ नहीं कर सकता | यानि हमने किसी के गुण व योग्यता से अधिक विदेशी भाषा को महत्व दे दिया | परिणाम यह हुआ कि हम पिछड़ते चले गये | अब कोई मुझे यह मत बताने लगना कि अंग्रेजी के कारण कितना विकास हुआ…क्योंकि विकास की परिभाषा आपकी और मेरी अलग अलग है |

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मंदिर हो या अंग्रेजी…. यदि हम भेड़चाल से मुक्त हों और तय कर लें कि हम स्वयं में सम्पूर्ण हैं, तो हमें शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा | हम शर्मिंदा होते हैं क्योंकि हम भेड़चाल और भीड़ को महत्व देते हैं | यदि हम अपनी मौलिकता को खोजें, अपनी ही योग्यताओं पर ध्यान दें, तो मंदिरों में धक्के खाने के स्थान पर अपने ही घर में मंदिर बना सकते हैं | अंग्रेजी के लिए शर्मिंदा होने के स्थान पर अंग्रेजों के लिए आदर्शं बन सकते हैं | वैसे भी अंग्रेजी को महत्व देने से बेहतर है अंग्रेजों से सीखें कि वे अपनी मातृभाषा को किस प्रकार महत्व देते हैं | अंग्रेजों से सीखें कि कैसे वे दूसरों के मंदिरों और मस्जिदों को महत्व देते हैं लेकिन अपनी गरिमा खोये बिना |

यह ध्यान रखें | जब तक आप खुद का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, दुनिया की ठोकरें खाते रहेंगे, दुनिया आपको शर्मिंदा करने के नए नए उपाय खोजती ही रहेगी और आप आजीवन शर्मिंदा होते रहेंगे | अपने घर अपनी जमीन, अपने खेतों को महत्व दीजिये…. नये नये प्रयोग कीजिये ताकि आप आत्मनिर्भर हो सकें… फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि आप मंदिर जाते हैं या नहीं, आप अंग्रेजी जानते हैं या नहीं…. ईश्वर भी आपका साथ देगा और अंग्रेज भी आपकी प्रशंसा करेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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