सारे शंख अपनी-अपनी मौजूदगी की घोषणा करते हैं

कृष्ण का पांचजन्य, उनका शंख बड़े प्रतीक अर्थ रखता है। आदमी की पांच इंद्रियां हैं, आदमी के पांच द्वार हैं, आदमी अपने पांच द्वारों के माध्यम से उद्घोष करता है। उसके जीवन का सारा उद्घोष पांच द्वारों के किया गया उद्घोष है–उसकी आंख से, उसकी नाक से, उसके कान से, उसके मुंह से। पांच इंद्रियां पांच द्वार हैं जगत से हमारे संबंध के। और जब कथाकार कहते हैं कि कृष्ण ने पांचजन्य बजाया, उसका कुल मतलब इतना है कि युद्ध में वे अपनी पांचों इंद्रियों सहित समग्र रूप से मौजूद हुए। इससे ज्यादा कोई मतलब नहीं है। युद्ध उनके लिए कोई एक काम न था, उनके लिए कोई चीज काम न थी। कबीर जैसा कपड़ा बेचने बाजार चला गया था, पूरा-का-पूरा, ऐसे ही कृष्ण पांचजन्य बजाकर उद्घोष करते हैं कि मैं पूरा-का-पूरा युद्ध में आ गया हूं। कुछ पीछे छोड़ आया नहीं। वह पीछे छोड़कर चलते ही नहीं। वह पूरे-के-पूरे, जहां होते हैं पूरे होते हैं। इसलिए पांच इंद्रियों के प्रतीक पांचजन्य को वह बजाते हैं और वह कहते हैं कि मेरी समस्त इंद्रियों सहित मैं यहां मौजूद हूं। मेरी मौजूदगी की घोषणा है। वह सारे शंख अपनी-अपनी मौजूदगी की घोषणा करते हैं। सबके शंखों के अलग-अलग नाम हैं। और प्रत्येक अपना-अपना शंख बजाता है, वह उसकी घोषणा है। प्रत्येक शंख का अलग-अलग स्वर है। और प्रत्येक शंख का प्रत्येक व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व से संबंध है। लेकिन कृष्ण के शंख का मुकाबला कोई भी नहीं है। समग्र रूप से वहां कोई भी उपस्थित नहीं है, समग्र रूप से वह अकेले ही उपस्थित हैं। और मजे की बात है कि वही वहां युद्ध करने को उपस्थित नहीं है।

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कृष्ण-स्मृति, ओशो

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