किताबें रटते रहो और दुनिया भर के उपद्रव करो धर्म के नाम पर और नारे लगाओ, "धर्मग्रंथों से ऊपर कोई नहीं है !"


एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा गया मुझसे, “विशुद्ध चैतन्य जी आप इस्लाम को किस तरह समझते है ।।कुरान को देख कर या सलमान खान को देख कर ??”

उत्तर: इंसान को देखकर !

वस्तुतः किसी भी धर्म, संस्कार, परम्परा, विधि-विधान को समझना हो तो किताबों से नहीं, बल्कि उनके अधिकारी, अनुयाइयों के व्यवहारों, आचरणों का अध्ययन करना चाहिए | जैसे किसी होटल में जाएँ या किसी रेस्तराँ में, भोजन का स्वाद, वेटर व मैनजेर का व्यवहार ही तय करता है कि वहाँ दोबारा कोई आना चाहेगा या नहीं | यदि वेटर का व्यवहार अच्छा नहीं है मैनजेर के पास शिकायत सुनने की फुर्सत नहीं हैं, और भोजन खाने लायक नहीं है, तो फिर उस होटल में कितनी ही महँगी पाकशास्त्र की पुस्तक रखी हो, कितने ही सजे-धजे वेटर रखें हों…. कोई फर्क नहीं पड़ता | लोग आयेंगे ही नहीं और न ही कोई होटल के इतिहास और महान शैफों के किस्से कहानियों में रूचि लेगा |

मैं भी कभी किसी धर्म या सम्प्रदाय को किताबों से नहीं, व्यवहारों से देखता व समझता हूँ | हिन्दू शास्त्रों में जो कुछ कहा गया, वह मानवों के आचरण में नहीं देखने मिला तो समझ में आ गया कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है | पहले सनातन धर्म आर्य समाजियों का धर्म समझता था, लेकिन जब मुझे उनको पास से जानने व समझने का अवसर मिला तो पाया कि वे भी मुस्लिमों की तरह ही किताबों में सिमटे हुए हैं | समय के साथ समझ में आया कि सनातन धर्म किताबी धर्म नहीं है और उसे समझने के लिए वन्य पशु-पक्षियों व प्रकृति को समझना पड़ेगा | और जब उनको समझा तो समझ में आ गया कि गौतम बुद्ध को जंगल में ही जाकर धर्म क्यों समझ में आया, किताबें पढ़कर, समाज में रहकर धर्म क्यों नहीं समझ में आया |

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वास्तव में धर्म तो केवल सनातन ही है क्योंकि वह कभी भी किताबों में सीमित नहीं हो सकता और न ही कोई दड़बा या समाज उसे अपने अधीन कर सकता है | वह तो मुक्त है, शाश्वत है सनातन है, इसलिए ही सनातन कहलाता है | वह किसी कबीले का धर्म नहीं है जिसका कोई मालिक या ठेकेदार हो…… तब मैंने ऐसी जगह तलाश करनी शुरू की जहाँ वास्तव में सनातन धर्मानुसार जीया जा सके और कई वर्षों भटकने के बाद मुझे यह आश्रम मिला | एक ऐसा आश्रम जो जात-पात, छुआ-छूत से मुक्त था और आज भी है | यहाँ आने के बाद मुझे सनातन धर्म को और अच्छी तरह समझने का अवसर मिला |

यह ठीक है कि यहाँ मूर्ति की पूजा की जाती है, यह ठीक है कि मुझसे यह अपेक्षा की जाती है कि मैं पूजा-पाठ करवाऊँ…. लेकिन दबाव नहीं दिया जाता | हाँ यह देखकर अवश्य दुःख होता है कि शास्त्रों में भी सनातन धर्म ही समझाया गया है, गौतम बुद्ध ने भी सनातन धर्म ही समझाया है….. लेकिन कुछ मूर्खों ने खुद को धर्म का ठेकेदार मान लिया और सनातन धर्म को हिन्दू धर्म नाम के दड़बे में रूपांतरित करने का प्रयास शुरू कर दिया | हिन्दू तो भौगोलिक नाम है उसे धर्म बना दिया इन मूर्खों ने | खैर….. जिस प्रकार संविधान, विधि व विधान के नाम पर अदालतों ने न्याय का मजाक बना रखा है और नारा लगाते हैं, “संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं !” उसी प्रकार सभी सम्प्रदायों की अपनी अपनी किताबें हैं | किताबें रटते रहो और दुनिया भर के उपद्रव करो धर्म के नाम पर और नारे लगाओ, “धर्मग्रंथों से ऊपर कोई नहीं है !” ~विशुद्ध चैतन्य

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