तिरंगा न हुआ मजाक बन गया | देशभक्ति न हुआ, नुक्कड़-नाटक बन गया

दादरी कांड: अखलाक की हत्‍या के आरोपी के शव पर रखा तिरंगा, शहीद बता मांगा एक करोड़ का मुआवजा |’
साभार: जनसत्ता ऑनलाइन October 6, 2016 19:23 pm

तिरंगा न हुआ मजाक बन गया ! देशभक्ति न हुआ, नुक्कड़-नाटक बन गया !

कभी तिरंगा से हरा रंग हटाकर यह जताने की कोशिश की जाती है कि हमें खेत खलिहान जंगलों की हरियाली पसंद नहीं है और कभी उपद्रवियों, निहत्थो, निर्दोषों के हत्यारों को तिरंगा में लपेटकर यह सन्देश देने की कोशिश की जाती है कि इस देश में देश पर मरमिटने वालों और किसी गरीब की हत्या करने वालों में कोई भेद नहीं है |

जिन्होंने अपने जीवन में कभी तिरंगे के महत्व को नहीं समझा, न कभी सम्मान दिया, लेकिन राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए उसी तिरंगे को मुँह पोंछने वाला रुमाल बनाकर रख दिया | एक सैनिक सीमा पर शत्रुओं की गोलियों का सामना करते हुए शहीद होता है तो वह तिरंगे का अधिकारी होता है, लेकिन वह तिरंगे का अधिकारी कैसे हो गया जिसने निहत्थे, गरीब, निर्दोष की हत्या की और वह भी कायरों का भीड़ ले जाकर ? उसने ऐसा कौन सा महान वीरता का काम कर दिया गुर्दा फेल होने से मरकर ? क्या गुर्दा फेल होने पर मरा कोई हत्यारा तिरंगे का अधिकारी हो सकता है ? क्या ऐसा कहीं लिखा है हमारे संविधान में ?

यदि ऐसा कहीं लिखा है तो मुझे अवश्य बताएं…और यदि नहीं तो देशभक्ति का सर्टिफिकेट बाँटने वाले फिरंगी निक्कर में घुमने वाले जरा यह बताएं कि क्या यह राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं है ?

और अख़बार भी कितनी सफाई से लिखता है कि ग्रामीणों ने तिरंगे में लपेट दिया… इन ग्रामीणों को तिरंगे का सुझाव देने वाले उस नेता का नाम क्यों नहीं खोजा ? क्या वहाँ कोई नेता ज़हर उगलने नहीं आया था ? क्या इस गाँव के ग्रामीण हर गुर्दा फेल होने से मरने वाले हत्यारों का इसी प्रकार सम्मान करते हैं ?

यह तिरंगे का खेल केवल उन मुस्लिमों को भड़काने के लिए खेला गया, जो अख़लाक़ की मौत से विचलित थे | यह खेल यह भी दिखाने के लिए खेला गया कि वे तिरंगे का अपमान इसी प्रकार करते रहेंगे जब तक भगवा झंडा राष्ट्रीय ध्वज नहीं बन जाता | सारा षड्यंत्र ही इसलिए रचा गया ताकि देश में अशांति व अराजकता का वातावरण बना रहे | और अपनी घटिया मानसिकता और करतूत का टोकरा रख दिया मासूम ग्रामीणों पर | सचमुच ये धर्म और राजनीति के ठेकेदार व्यक्तिगत स्वार्थों में इतने अंधे हो चुके हैं कि इंसानियत, धर्म, राष्ट्र की गरिमा व राष्ट्रीय सौहार्द को ताक पर रख दिया |

यह देखिये ज़हर उगलते को | इसे बदला चाहिए गुर्दा फेल होने से हुई एक हत्यारोपी की मौत का और वह भी मुसलमानों से…….शर्म नहीं रही इसे यह सब कहते हुए   और  न ही  शर्म  आ  रही  है  उन्हें  जो वहाँ  खड़े  तमाशा  देख  रहे  हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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