"हाथी चले अपनी चाल, कुत्ते भौंकते रहें हज़ार"

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था | हर कोई उसकी एक झलक पाने को बेताब था | मुजरिम को कटघरे में लाया गया | उस पर कई संगीन आरोप थे जैसे बलात्कार, हत्या, डकैती, जालसाजी, करोड़ों का घोटाला, स्विस बैंक में अकाउंट…..आदि इत्यादि |

वकीलों की बहस शुरू हुई, आरोप प्रत्यारोप लगते रहे लेकिन वह चुप रहा | अंत में जज ने उससे पूछा, “अपनी सफाई में आपको कुछ कहना है ?”

“हाथी चले अपनी चाल, कुत्ते भौंकते रहें हज़ार |” उसने केवल इतना कहा और चुप हो गया |

कोर्ट ने उसे सबूतों के आभाव का लाभ देते हुए बाइज्ज़त बरी कर दिया | दरअसल जिस तिजोरी में सबूत रखे थे उसे चूहे चुरा कर ले गये थे अपने बिल में | लेकिन दिल्ली में तेज गर्मी पड़ने के कारण बिल में ही तिजोरी गल गया और….दोषी चूहों की तलाश जारी है |

एक प्रश्न आप सभी से:

  • क्यों कोर्ट के ख़िलाफ़ कोई कुछ नहीं कह सकता है जबकि कोर्ट भी पैसे लेकर सेवा प्रदान करने वाली संस्था है ? जज तनखा लेते हैं, सरकारी वकील तनखा लेते हैं जनता के खून पसीने की कमाई के टैक्स से | वकीलों को फीस भी जनता ही देती है | 
  • क्या न्याय व्यवस्था आज एक प्रोफेशन नहीं बन गया है, जो पैसों के लिए काम करता है ?
  • क्या आज अदालत धनी व समृद्ध लोगों के लिए खिलौना मात्र नहीं रह गया है ?
  • क्या सरकार न्यायालयों का प्रयोग अपने हित में नहीं कर रही है कि उनके मंत्री आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते रहते हैं, जबकि उसी आरोप में एक आम आदमी सलाखों के पीछे पहुँचा दिया जाता है ? बाद में बेशक कोई बेगुनाह साबित हो जाए लेकिन जब तक केस चल रहा होता है वह सलाखों के पीछे ही रहता है |
  • क्या जजों और वकीलों को भगवान माना जा सकता है जो चंद रुपयों में बिक जाते हैं ?
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नोट: अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं | अतः इस क्षेत्र में भी कोई ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ हो सकता है, लेकिन यह अपवाद ही है | जिस प्रकार किसी एक व्यक्ति के गलत होने से पूरी व्यवस्था को गलत नहीं कह सकते, वैसे ही किसी एक व्यक्ति के सही होने से भी पूरी व्यवस्था सही है यह नहीं माना जा सकता | ~विशुद्ध चैतन्य

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