अब मेरी अनपढ़ बुद्धि से समझिये कि मोक्ष वास्तव में है क्या ?


कल मैंने प्रश्न किया कि मोक्ष के बाद व्यक्ति की दिनचर्या क्या रहती है ? और जितने भी उत्तर मिले वे सभी अनिश्चय में दिए गये उत्तर थे या फिर सुनी-सुनाई बातें | और यदि गूगल पर सर्च करें तो मोक्ष पर कई लेख और विचार मिल जायेंगे और सभी घूम फिर कर यही कहते है;

  • शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि आत्मा तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकती रहती है जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। मोक्ष एक ऐसी दशा है जिसे मनोदशा नहीं कह सकते। इस दशा में न मृत्यु का भय होता है न संसार की कोई चिंता। सिर्फ परम आनंद। परम होश। परम शक्तिशाली होने का अनुभव। मोक्ष समयातीत है जिसे समाधि कहा जाता है।
  • ऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा। ऋषि-मनीषा कहती हैं कि जो मोह का क्षय करे, वही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है।
  • मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्व की ओर अन्मुख होने का पुरूषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु लक्ष्य सभी का एक है- जीव को बंधनों से मुक्त करना।
  • वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरूषार्थ, जिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे दें, के लिए कर्म कर व परमतत्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किए जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी।

मोक्ष कहें, निर्वाण कहें या समाधि कहें मूल भाव यही रहता है कि इसे प्राप्त करने के बाद व्यक्ति कर्म हीन, भाव हीन, विचार हीन, भावना विहीन स्थिति को प्राप्त हो जाता है | सांसारिक रूप से इसे समझें तो व्यक्ति निर्जीव पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है, जिसे न क्रोध आता है न वासना सताता है और न भूख-प्यास लगती है | एक कहानी इसी से सम्बंधित पढ़ने मिली जो इस प्रकार है:

कबीर के पुत्र कमाल की कहानी है ये। कमाल एक वीतरागी आत्मा थे। कबीर को भी इस बात पर काफी गर्व था कि उनका पुत्र कमाल एक ऐसा इंसान है जिसके लिए स्वर्ण और धूलि एक समान हैं। कबीर जानते थे कि कमाल को केवल साधना में लीन रहना पसंद है और साधना में रहते हुए भी वह सामान्य जिंदगी व्यतीत कर सकता है। स्वयं कबीर अपने आप को इस योग्य नहीं समझते थे और अपने आप को केवल त्यागी पुरुष की श्रेणी में रखते थे।

एक बार की बात है जबकि एक सम्राट ने कमाल की परीक्षा लेने की सोची। सम्राट ने कमाल को कुछ बेशकीमती उपहार देने चाहे तो उंसने कहा कि कुटी में कहीं रखवा दें। सम्राट को लगा कि ये तो बहुत ही लालची मनुष्य है और संत होने का दिखावा करता है। फिर भी उसने उपहार को कमाल की कुटी में रखवा दिया।

पुनः एक वर्ष पश्चात सम्राट ने सोचा कि अब तक तो कमाल उपहार बेच कर सुखी-संपन्न जीवन व्यतीत कर रहे होंगे। ऐसे में चल कर देखा जाए कि कमाल का जीवन कितना बदला। इसी जिज्ञासा के साथ सम्राट कमाल की कुटी पर पहुंचा तो हैरान रह गया। कुटी वैसी ही थी और कमाल साधना में लीन थे। सम्राट ने कमाल की साधना भंग होने के बाद सवाल किया कि आपने बेशकीमती उपहार का क्या किया?

कमाल ने कहा – जह
ां रखा था आपने वहां देखिए……..सम्राट ने देखा तो उपहार वहीं उसी हालत में थे। रियली आश्चर्यचकित कर देने वाला मंजर था।

तो इस कहानी से भी यही सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि मोक्ष का अर्थ है ध्यान में बैठे रहो, और बाकि सब से पूरी तरह विरक्त हो जाओ | इसलिए लोग जीते जी तो सारे कुकर्म कर लेते हैं और भगवान् को चढ़ावा चढ़ाकर, साल में एक बार जोर-शोर से घंटी घड़ियाल बजाकर अपने ही बनाए ईश्वर की जय जय करके मरने के बाद मोक्ष की कामना करते हैं |

अंग्रेजों का सिद्धांत इस विषय में और अधिक स्पष्ट है कि जीवन मिला है जीने के लिए तो जी भर कर जी लो, मरने के बाद क्या होगा उसकी चिंता ही छोड़ दो | रोज पाप करो और सन्डे को चर्च जाकर कन्फेस कर लो, जीसस सारे पाप अपने सर ले लेगा और ईश्वर से आपको मरने के बाद भी सारे सुख सुविधा दिलवा देगा | सभी धर्मों ने इसी प्रकार कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है | कहीं गंगा स्नान तो कहीं तीर्थ, तो कहीं हज…..

यानि जीते जी मोक्ष कोई नहीं चाहता | जीना तो वह खुलकर चाहता है और अपने सारे पाप दूसरों के मत्थे मढ़कर मरना चाहता है |

अब मेरी अनपढ़ बुद्धि से समझिये कि मोक्ष वास्तव में है क्या |

हम सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं, और हम यह भी जानते हैं कि हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं | पहले हम सात चक्रों को समझते हैं:

1. मूलाधार चक्र: जिनके जीवन में भोजन, निद्रा और सेक्स सबसे प्रबल है वे सभी इसी चक्र के अनुभवों को भोगते रहते हैं और अंतत: अपना जीवन किसी पशुवत विचार की तरह जीकर मर जाते हैं। ऐसे लोग बुद्धि से नहीं, भावना से काम लेते हैं। ऐसे लोगों का भविष्य पशुओं की भांति ही होता है।

मूलाधार पर ऊर्जा के गड़बड़ होने के कारण व्यक्ति की प्राकृतिक भूख और नींद में भी गड़बड़ी हो जाती है। यह भी हो सकता है कि व्यक्ति ज्यादा हिंसक हो और उसमें तामसिक प्रवृत्ति का बोलबाला हो। दुनिया में बहुत ही सतही विचारधारा के लोगों की संख्या ज्यादा है चाहे वह राजनीति में हो, साहित्य में या फिल्मों में। गौर से देखने पर सभी भोजन, नींद और सेक्स की ही चर्चा कर रहे हैं।

2. स्वाधिष्ठान चक्र: कुछ लोगों की ऊर्जा स्वाधिष्ठान में ज्यादा सक्रिय रहती है इसीलिए उनके जीवन में आमोद-प्रमोद का ज्यादा महत्व रहता है। वे भौतिक सुख-सुविधाओं की और दौड़ते रहते हैं। हर चीज का लुत्फ उठाते रहते हैं। मनोरंजन ही जीवन बन जाता है। यात्रा, राग, नृत्य और संगीत ही जीवन बना रहता है।

यहां पर ऊर्जा की गड़बड़ी से जीवन में आलस्य बढ़ता, कर्मठता कम हो जाती है। हो सकता है कि व्यक्ति शराब और मौज-मस्ती में ही जीवन बिता दे और अंतत: पछताए।

3. मणिपुर चक्र : अगर आपकी ऊर्जा मणिपुर चक्र पर ही ज्यादा सक्रिय है, तो आप में कर्म की प्रधानता रहेगी। ऐसे व्यक्ति को कर्मयोगी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति ‍दुनिया का हर काम करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

4. अनाहत चक्र : ज्यादातर सृजनशील लोग अनाहत चक्र में जी रहे होते हैं। ऐसे लोग संवेदनशील किस्म के होते हैं। वे लोगों की भावनाओं की कद्र करते हैं। चित्रकार, लेखक, मूर्तिकार आदि लोग इसी श्रेणी में आते हैं।

5. विशुद्धि चक्र: विशुद्धि चक्र में ऊर्जा का सक्रिय होना इस बात का सबूत है कि आप अति शक्तिशाली हैं शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से। ऐसा व्यक्ति निर्भीक और ईमानदार होता है।

6. आज्ञा चक्र : बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन को बहुत महत्व दिया है और जो हर कार्य और व्यवहार को बौद्धिक स्तर से करते हैं तो यह माना जाएगा कि उनकी ऊर्जा आज्ञा चक्र पर ज्यादा सक्रिय है। बौद्धिक अनुभव से शांति मिलती है।
ऐसे व्यक्ति के आस-पास चाहे कुछ भी हो रहा हो या कैसी भी परिस्थितियां निर्मित हो रही हों, उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। निर्भीकता उसका स्वाभाविक गुण है।

ऊर्जा की गड़बड़ी से बौद्धिक अहंकार पैदा होता है, जो कु‍बुद्धि और कुतर्कों की ओर ले जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज और राष्ट्र को दिशाहीन कर देता है।

7. सहस्त्रार चक्र: बहुत कम लोग हैं जिनकी ऊर्जा सहस्रार पर ज्यादा सक्रिय रहती है। ऐसा व्यक्ति सदा आनं‍दित रहता है। सुख-दुख का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। बिना कारण ही व्यक्ति खुश रहता है।

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि कौन सा व्यक्ति किस चक्र से प्रभावित है | अब यदि मोक्ष की बात करें तो जो जिसका सहस्त्रार चक्र सक्रिय हो गया, उसने मोक्ष प्राप्त कर लिया माना जायेगा यदि मोक्ष के जानकारों की मानें तो  
अब समझते हैं मस्तिष्क को

 
हमारे मस्तिष्क में दो गोलार्ध (सेक्शन) होते है, लेफ्ट साइड और राईट साइड ! ब्रेन के लेफ्ट साइड से हम तर्कसंगत विचार करते है, यह विवेक और बुद्धि का केंद्र होता है, इस हिस्से का उपयोग सामन्यतः दैनिक जीवन में होने वाले घटनाओ के विवेचन हेतु होता है, और दुसरे राईट साइड वाले हिस्से का उपयोग हम अतार्किक, चित्रीय, मनोरंजन, प्रदर्शन सम्बंधित और दृश्य चित्रों का आकलन करने हेतु करते है! एक सामान्य व्यक्ति के दोनों ही हिस्से सामान रूप से विकसित होते है! यद्यपि कुछ लोग या आर्टिस्ट जिनमे बचपन से लेफ्ट साइड का ब्रेन ज्यादा विकसित होता है वे आर्टिस्ट कला को नियमो में और तार्किक रूप से परखते है, और कला के नियमो को सीखने व उसे क्रमबद्ध याद करने में महारथ हासिल कर लेते है जब वे अपना विषय चुनते है तो उसके हर पहलु पर गहन अध्यन करते है और उसे जितना सम्भव हो सके उतना यथार्थ बनाने का प्रयास करते है!

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि कौन सा व्यक्ति मस्तिष्क के कौन से भाग से प्रभावित है |

अब आप सोच रहे होंगे कि इन सब बातों का मोक्ष से क्या लेना देना है ?

आइये समझाता हूँ | मोक्ष वह अवस्था है जब हम पूर्णानंद का अनुभव करते हैं और हमें यह चिंता नही रहती कि कल क्या होगा | यह चिंता इसलिए नहीं रहती क्योंकि हम संतुलन में आ जाते हैं | जैसे एक ताकतवर व्यक्ति, कुशल योद्धा भयमुक्त व निश्चिन्त रहता है कि कोई उसे हानि नहीं पहुँचा सकता क्योंकि वह सक्षम है शत्रु से निपटने में, ठीक उसी प्रकार मोक्ष प्राप्ति के बाद भी होता है | और मरने के बाद ही मोक्ष की प्राप्ति की बात इसलिए की जाती है क्योंकि मोक्ष या निर्वाण की अवस्था जिन्होंने जानी वे जो समझा रहे थे, वह किसी की समझ में नहीं आया या जीते जी इसे असंभव समझ लिया, या फिर तय कर लिया कि हम इनकी तरह नहीं होना चाहते जीते जी |

क्योंकि यह वह अवस्था होती है, जिसे समाज स्वीकार नहीं करता क्योंकि समाज के लिए वह अनुपयोगी हो जाता है | उसे मूर्ख बनाकर कोई भेड़-बकरियों की तरह नहीं हाँक सकता और न ही सामाजिक भेड़चाल में उसे खींच सकता है | वह स्वयं में मस्त रहता है, और उसकी सभी भौतिक आवश्यकतायें प्रकृति स्वयं ही पूरी करती है | क्योंकि वह प्रकृति के साथ पूरी तरह हार्मनी में रहता है | उसपर कोई विपदा भी आनी हो तो उसकी सुरक्षा की तैयारी प्रकृति स्वयं ही करती है | वह विपरीत परिस्थिति या समाज में भी रहे, तब भी वह अपनी स्थिति को यथावत बनाए रखता है | वह जो कुछ समझ सकता है, देख सकता है, वह सामान्य व्यक्ति नहीं समझ सकता |

यहाँ यह ध्यान रखें कि मोक्ष का अर्थ यह नहीं कि कोई हमेशा श्री श्री रवि शंकर की तरह मुस्कुराता रहे या पागलों की तरह हँसता रहे | और न ही इसका अर्थ यह है
कि गौतम बुद्ध की तरह धीर-गंभीर ही बना रहे हमेशा,  या किसी कीर्तनियां की तरह कीर्तन ही करता रहे, मीरा की तरह नाचती ही रहे, गाते ही रहे……. मोक्ष में व्यक्ति एक चैतन्यता का अनुभव करता है, और समाज के लिए अधिक हितकारी हो जाता है, क्योंकि वह भेदभाव से परे हो जाता है |

यह मोक्ष की प्राप्ति तब होती है जब हम केंद्र में होते हैं यानि अनाहत चक्र में स्थिर होते हैं और ऊपर और नीचे के तीनों चक्रों पर पूरा नियंत्रण रहता है | जब हम अपनी आवश्यकतानुसार किसी भी चक्र की उर्जा बढ़ा व घटा सकते हैं | हम भौतिक और अध्यात्मिक दोनों सुखों का भरपूर आनंद लेते हैं, और बैर का भाव मिट जाता है | उसके लिए सेक्स और ध्यान दो अलग विषय नहीं रह जाते बल्कि एक ही विषय हो जाता है | उसके लिए मूलाधार और सहस्त्रार में भेद नहीं रह जाता क्योंकि दोनों ही स्थिति उसके लिए सहज हो जाती है | उसके लिए मूलाधार घृणित और सहस्त्रार श्रेष्ठ, पूजनीय नहीं रह जाता बल्कि दोनों ही आनंद प्रदान करने वाली उर्जायें हैं | उसके लिए सर श्रेष्ठ और पैर निकृष्ट या घृणित नहीं रह जाता क्योंकि दोनों ही उसके शरीर के अंग हैं | जितना व अपने सर और चेहरे का ध्यान रखता है, उतना ही वह पैरों का भी ध्यान रखेगा |

भय से मुक्त होता है वह क्योंकि मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का प्रयोग करना जानता है | वह कल्पनाएँ भी कर सकता है सुगमता से और व्यावहारिक भी जायेगा आवश्यकतानुसार | यदि मैं अपनी समझ से कहूँ तो श्रीकृष्ण ने मोक्ष को व्यवहारिक रूप में जीकर दिखाया | ओशो ने जीया मोक्ष को, गौतम बुद्ध ने जीया मोक्ष को |

जो मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, यदि समाज चाहे तो उनसे सही दिशा ले सकते हैं, लेकिन समाज कभी भी ऐसे लोगों को जीते जी स्वीकार नहीं कर पाता | जब तक ऐसे लोग जीवित होते हैं समाज उनकी जान का दुश्मन बना रहता है क्योंकि समाज अपने खोखले आडम्बरों, परमपराओं, और दिखावों से मुक्त होने में घबराता है | ~विशुद्ध चैतन्य

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