याद है मुझको बाजार से जाकर दीये लेकर आना

१९७९ के बाद फिर शायद दीपावली नहीं आई मेरे जीवन में | क्योंकि २४-२५ जनवरी १९८० को मेरी माँ का देहान्त हुआ था केंसर के कारण |

आज भी दीपावली मेरी लिए कोई उमंग या ख़ुशी लेकर नहीं आता | बचपन में हो भी त्यौहार मना लिए जैसे उल्लास और हर्ष से मनाये, फिर जीवन में दोबारा कभी नहीं मनाया | क्योंकि दोबारा वैसा कोई त्यौहार नहीं कभी आया ही नहीं दोबारा |

याद है मुझको बाजार से जाकर दीये लेकर आना | फिर दीयों को पानी में डुबाकर छोड़ दिया जाता था, ताकि दीया तेल या घी न पिए | शाम को माँ दिए जलाती थी और हम सब भाई-बहन बाहर लेजाकर लाइन से सजाते थे | जब सारे दिए सजा देते थे तो घर के बाहर जाकर खड़े होकर मुग्ध भाव से घर को देखते थे कि देखो आज हमारा घर कितना जगमगा रहा है !

रिश्तेदारों का आना शुरू हो जाता था कोई हम दस पैसे देता कोई हमें चार आने देता कि जाओ बेटे मिठाई खा लेना | कोई बहुत ही रईस होता तो वह हमें पाँच रूपये भी दे देता था और कोई बहुत ही प्रेम करने वाला होता तो वह दस रूपये देता था | पाँच रूपये और दस रूपये तो हमें तुरंत ही मम्मी के पास जमा करवा देने होते थे, क्योंकि चोर उचक्कों की कोई कमी नहीं थी, कोई भी हमसे छीन सकता था | तब पाँच पैसे में ही पाँच बड़े बड़े तिल के लड्डू मिल जाते थे |

आज उससे भी अधिक लोग मिलने आते हैं, आज हज़ार पाँच सौ मिलते हैं प्रणामी में… लेकिन उन पाँच रूपये और दस रूपये जितने कीमती नहीं होते | आज आज उतनी ख़ुशी नहीं होती जितनी कि पाँच पैसे और पच्चीस पैसे मिलने पर होते थे क्योंकि उसमें प्रेम और अपनापन होता था, लेकिन आज स्वार्थ होता है | देने वाला भी यह सोचकर देता है कि संन्यासी को दे रहे हैं शायद कोई भला हो जाए, शायद ईश्वर खुश हो जाए, शायद कोई पुण्य मिल जाए |

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आज रौशनी भी उससे अधिक होती है, लेकिन ये रौशनी चाइनीज होती है | हमारे आश्रम में भी चाइनीज़ झालरों से रौशनी की गयी है, लेकिन ये रौशनी बेजान हैं, इनमें वह आत्मा नहीं है, जो दीपावली के दीपों से दमकती है | वह ठंडक नहीं है जो दीपों की रौशनी से मिलती है |

सब कुछ बदल गया है अब | अब पूजा नकली है, श्रृद्धा नकली है, सजावट नकली है, प्रेम नकली है, अपनत्व नकली है……और दुःख मुझे इस बात का है कि मैं असली और नकली को आसानी से पहचान लेता हूँ | अब पूजा का ढोंग करते लोगों के चेहरे आसानी से पढ़ लेता हूँ | आज जानता हूँ कि क्यों हमारा देश दिनप्रतिदिन ह्रदयविहीन होता चला जा रहा है |

क्योंकि अब दिखावा मात्र ही रह गया है | अब हमारा कुम्हार दीये बेचकर इतने भी पैसे नहीं कमा पायेगा शायद कि उनके बच्चे दीपावली मना पाए, लेकिन चाइना अरबों की कमाई कर लेगा अपने चाइनीज़ दीयों और झालरों से | आज हम पढ़े-लिखे हो गये हैं, आज हम अंग्रेजी बोलते हैं, इसलिए दीयों से घर सजाना रूढ़िवादिता है, गँवारपन है | लोग क्या कहेंगे कि इतनी बड़ी बड़ी डिग्रियाँ लेकर भी दीयों से घर सजाते हो ? लोग अनपढ़ समझेंगे… .इसलिए अपने मेहनत की कमाई विदेशियों को देने में ही इज्जत बनी रह सकती है |

पहले गाँव के सभी लोग आपस में जुड़े होते थे क्योंकि कुम्हार को गाँव में ही दीये और मटके बेचने होते थे, और गाँव का गुजरा नहीं था कुम्हार के बिना | आज कुम्हार का बच्चा पेड़ के नीचे दीये लेकर बैठा होगा कि शायद कोई अनपढ़ आ जाये और कुछ दीये खरीद ले, तो शाम को वह भी दीपावली मना पायेगा | लेकिन अब अनपढ़ रह ही कहाँ गये हैं ? सभी तो पढ़े लिखे हैं, सभी तो अंग्रेजी बोलते हैं ! ~विशुद्ध चैतन्य

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