क्या हम स्वस्थ सुखी समाज कभी भारत को दे पाएंगे ?

Deepika Ghildiyal​ जी का यह लेख जिसे हम संस्मरण भी कह सकते हैं, अतुलनीय है | मुझे नहीं लगता कि फेसबुक में किसी ने इतनी अच्छी तरह से कभी पुरानी घटनाओं और वादों के साथ तुलना की हो वर्तमान परिस्थितियों के साथ |

“आज उत्तराखंड का स्थापना दिवस है.पंद्रह साल पहले,उम्मीदों का एक सूरज उगा था,लगा था,अब देवभूमि मे खुशहाली आएगी,उजड़े हुये गाँव आबाद होंगे.जब उत्तराखंड आंदोलन अपने चरम पर था,तब की बहुत सारी यादें मेरे साथ हैं.हम स्कूल मे थे,आंदोलन का मतलब नहीं जानते थे,बस गला फाड़कर गाँव की गलियों मे नरेंद्र सिंह नेगी के आंदोलन के लिए लिखे हुये गीत गाते थे.कई महीनों के लिए हमारा स्कूल बंद था,और हर किसी की जुबान पर बस एक ही बात होती थी,की अब अपना उतराखंड बनने ही वाला है. नौ नवम्बर को हमारे स्कूल मे भी मिठाइयाँ बांटी गयी थी..तब हमने सुना कि अब शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य,रोजगार से लेकर सुविधाएं,सब अपने लिए,अपने गांवो मे मिलेंगी.किसी को घर नहीं छोड़ना पड़ेगा,आज पंद्रह साल बाद,उन दिनो सुनी हुयी ये बातें एक मज़ाक के अलावा कुछ नहीं लगती.इसी मज़ाक के लिए,कितने जवान लड़के,शहीद हुये,कितनी महिलाओं ने अपनी अस्मत गंवाई.कितनों के शरीर पर अभी भी चोट के निशान हैं.उत्तराखंड बनने से अगर सच मे किसी का फायदा हुआ,तो नेताओं का और माफिया का.विकास के नाम पर सिर्फ अपने घर भरे दोनों पार्टियों ने.देवभूमि की किस्मत अब सिर्फ देवताओं के हाथ मे है,क्योंकि यहाँ की जनता,बस एक आंदोलन से ही इतना थक चुकी है कि किसी तरह के प्रतिरोध की शक्ति अब नहीं बची उसमे.” -दीपिका घिल्डियाल

जितने भी राज्य बंटे हैं आज तक, जितने भी देश बंटे हैं आज तक अच्छे दिनों के नाम पर, उनकी स्थिति देख लीजिये | केवल सत्ता लोभी लोग हमें बाँटते चले जा रहे हैं और हम बँटते चले जा रहे हैं | स्थिति वहीँ की वहीँ है | झारखण्ड नया राज्य बना, छत्तीसगढ़ बना…. और न जाने कितने नए राज्य और अभी बनने वाले हैं, न जाने भारत के ही कितने टुकड़े और होने वाले हैं… केवल अच्छे दिनों के सपने दिखाकर…. !!!

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पाकिस्तान की स्थिति सभी के सामने है ही, बंगलादेश की स्थिति सबके सामने है ही, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ की स्थिति सबके सामने है ही…..फिर भी हम हैं कि सुधरने को तैयार नहीं हैं | फिर भी हम हैं कि समझने को तैयार ही नहीं हैं | कुछ नेता और उनके पालतू चापलूस चले आते हैं बहकाने के लिए और हम बहक जाते हैं बिना पिए ही | फिर कोसते हैं भाग्य को और फिर इंतजार करते हैं, करण-अर्जुन की |

हम समर्थन करते हैं उनका जो हमें नफरत करना सिखाता है, हम समर्थन करते हैं उनका जो दो सम्प्रदायों के बीच दीवारें खड़ी करता है, हम समर्थन करते हैं उनका जो हमको उल्लू बनाकर सत्ता सुख भोगता है, भूमाफियाओं, पूंजीपतियों की चाकरी में लगा रहता है… लेकिन जो वादे किये होते हैं जनता से, उसे भूल जाता है |

थोडा आत्मचिंतन कीजिये और सोचिये कि क्या इसी तरह से बँटते रहने से, नए राज्य, नए देश बनाते रहने से हमारा कल्याण होगा ? धर्मों के नाम पर आपस में ही लड़ते रहने से कोई भला होगा हमारा ? क्या हम स्वस्थ सुखी समाज कभी भारत को दे पाएंगे ? क्या हमारी आने वाली पीढ़ी सुखी रह पायेगी खंडित समाज और राष्ट्र में ? ~विशुद्ध चैतन्य

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