आइये आज मैं ऐसे शब्दों के आधुनिक अर्थ व परिभाषाएं बताता हूँ, जो भारतीय जनमानस के हृदय में बसता है, जिनके बिना भारतीय समाज का आस्तित्व नहीं

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मैं साक्षरता के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही विरुद्ध हूँ धार्मिकता के | साक्षर होना चाहिए हर इंसान को और धार्मिक भी | लेकिन न तो किताबी विद्वानों बने रहना लाभदायक है और नहीं किताबी धार्मिक बने से कोई भला होने वाला है

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भीड़ में कोई किसी की फ़िक्र नहीं करता, सभी अपनी अपनी फ़िक्र में खोये हुए हैं और सभी इसी भ्रम में जी रहे हैं कि भीड़ के साथ हैं इसीलिए सुरक्षित हैं

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त्यागी, बैरागी, करोड़पति, अरबपति साधू-संतों की तरह धन, स्त्री, ऐश्वर्य, भौतिक सुखों को अछूत नहीं मानता हूँ मैं | न ही त्यागी बैरागी साधू-संतों की तरह धन को हाथ नहीं लगाता स्वयं अपितु उसके लिय सेक्रेटरी, या सेवक रखता हूँ |

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स्वयं की उपेक्षा मत कीजिए::: स्वयं ही स्वयं का आदर कीजिए ::::दूसरों के साथ भी प्रेमपूर्ण बर्ताव कीजिए

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आपसे कहा जाता है कि जो पूर्वजों ने अपने अनुभवों से लिखा या कहा वही सही है और आप अपने अनुभवों से जो कुछ भी जानते समझते हैं वह गलत | इसका अर्थ तो यह हुआ कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान व विद्वान थे ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि उन्होंने जितना जाना, समझा, उससे आगे की यात्रा हमने की ही नहीं, उन प्राचीनकालीन विद्वानों के लेवल तक भी नहीं उठ पाए, बल्कि उस लेवल पर ही टिके रह गये, जिस लेवल के लोगों को वे विद्वान समझा रहे थे ?

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मुझे आज भी दिल्ली के अंडे के पराठें अवश्य याद आते हैं | सर्दियों के दिनों में ये पराठें मेरी पहली पसंद हुआ करती थी | लेकिन आज मैं इन परांठों के विषय में सोच भी नहीं सकता क्योंकि तब मेरा भगवा कलंकित हो जाएगा

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बचपन में एक गीत बहुत पसंद था मुझे, ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ | जब भी गाँव में कोई धार्मिक या वैवाहिक समारोह होता था, तो लाउडस्पीकर मंगवाया जाता और यह गीत अवश्य बजता था और दिन में कई बार बजता था | मैंने कभी गंगा…

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भाग्य

मैं ऐसे लोगों से दूरी बना लेता हूँ जो केवल दूसरों की बुराई करने में ही अपना जीवन नष्ट करते हैं | मैं ऐसे लोगों से भी दूरी बना लेता हूँ, जो दिन रात अभावों, आर्थिक तंगी का रोना लिए बैठे रहते हैं | क्योंकि ऐसे लोग अपने ही भाग्य के दुश्मन होते हैं और ऐसे लोगों की संगत, आपके अपने भाग्य को प्रभावित करती है

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मेरे एक मित्र श्री D.r. Godara जी ने इस पुस्तक के विषय में जानकारी दी और मुझसे अपनी राय व्यक्त करने का आग्रह किया | मैंने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े, लेकिन पूरी नहीं पढ़ी | फिर भी मैं इतना तो समझ ही चुका था कि पुस्तक के लेखक गोकुलजी, बहुत ही सुलझे विचारों वाले, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं |

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