मुझे क्षमा करें, मुझसे बिलकुल भी अपेक्षा न रखें कि मैं इन नेताओं, अधिकारीयों, धर्म व जाति के ठेकेदारों या कूपमंडूक धार्मिकों सभ्य लोगों की तरह भला व सदाचारी, परोपकारी बन जाऊं

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पत्थरों की प्रतिमाओं को भोग लगाने या उनपर लाखों लुटाने की बजाये, ईश्वर की अनुपम रचना यानि जीती जगती प्रतिमाओं पर भी कुछ धन लुटाओ, उन्हें भी कुछ भोग लगाओ, उनके जीवन को थोडा तो सरल बनाओ ?

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“वह कैसा मजनू था जो लैला पर आशिक हो गया | मैं भी कैसा अजीब हूँ कि अपने आप पर आशिक हो गया | जब मैंने अपने अन्दर नज़र की तो सिवाय खुदा के मुझे कुछ न दिखा |”

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“सलाम,  “जनाब एक सवाल था , क्या गरीबी पूंजीवाद का एक महत्वपूण अंग है ??? मैंने कार्ल मार्क्स के कुछ विचार देखे है “YouTube” पर , जिसमे एक बात पे ज़ोर दिया गया है “गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है” ! समय मिले तो…

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क्या आपने कोई उपाय सोचा कि पानी भी व्यर्थ न हो और जिन्हें पानी की आवश्यकता है, उन्हें पानी भी मिल जाए ? क्या आपने कोई उपाय जलविभाग के अधिकारियों को सुझाया ?

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रोम के एक इतिहासकार वलेरियस मैक्सिमस ने अपनी किताब Factorum Ac Dictorum Memorabilium में सदियों पहले एक घटना दर्ज की है. ये घटना नैतिकता के विपरीत होते हुए भी मानवीय मूल्यों पर खरी उतरती है. इसीलिए उसने इसे महान पुण्यशीलता या रोमन सम्मान का नाम…

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सोचा था कि दलितों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाऊंगा, सोचा था कि मुस्लिमों में जो गरीब व शोषित हैं उनके लिए आवाज उठाऊंगा, सोचा था कि हिन्दुओं में जो शोषित वर्ग हैं उनके लिए आवाज उठाऊंगा….. लेकिन मैं होता कौन हूँ आवाज…

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अब हत्याओं के लिए किराए के हत्यारों का चलन है क्योंकि शाकाहारी और धार्मिक लोग खुद हत्या नहीं कर पाते और ये सभी हत्यारे माँसाहारी ही होते हैं |

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