Landmafia

भारतवर्ष स्वयं एक पार्टी है और हर भारतीय सदस्य है उसका । संसद भवन केन्दीय कार्यालय है भारतीयों के प्रतिनिधियों का ।

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असामाजिक तत्त्व व नेताओं के पालतू गुंडे-मवालियों के संगठन में वही एकता होती है, जो लकड़बग्घों, सियारों, भेड़ियों, जंगली कुत्तों में होती है

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वे लोग भी राजनीती ही कर रहे होते हैं जो निष्क्रिय होते हैं या यह कहते हैं कि हमें राजनीती से कोई लेना देना नहीं

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साम्प्रदायिक धार्मिकों की रूचि नहीं होती देश व राज्यों के हितों में, उन्हें रूचि होती है मंदिर-मंदिर खेलने में, हिन्दू-मुस्लिम खेलने में, सवर्ण-दलित खेलने में |

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ये नेता तो अपने ही सम्प्रदायों के शोषितों पीड़ितों की कोई सहायता नहीं कर पाते तो राष्ट्र की चिंता भला कहाँ से कर पाएंगे ?

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साधू-संन्यासियों का काम है उपदेश देना, वे अपना काम ही कर रहे हैं, लेकिन यदि बाकी भी उपदेश करने लग जाएँ, तो पतन निश्चित है |

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बीबीसी न्यूज़ की एक हेडिंग; चीन की ऐसी ‘जेल’ जहां बंद हैं दस लाख मुसलमान? पर नजर पड़ी तो सहसा ही स्क्रोल करते-करते ठहर गया. पूरा लेख पढकर और कुछ खोजबीन की तो और भी कई लेख मिले इसी विषय से सम्बंधित | उन्हें भी…

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आपके खून पसीने की मेहनत से खड़ी की कम्पनी कुछ ही दिनों बाद आपकी नहीं रह जाती, बल्कि आप खुद उस कम्पनी के नौकर बनकर रह जाते हैं…..क्या आप इसे कम्पनी और स्वयं का उत्थान कहेंगे ?

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इनका व्यापार इतना व्यापक है कि नेता तक खरीदे बेचे जाते हैं, वोट खरीदे बेचे जाते हैं | ये व्यापारी अपने ही देश के व्यपारियो को बर्बाद करके विदेशी व्यापारियों को लाभ पहुंचाते हैं ताकि मुनाफा अधिक मिले |

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उनको प्राप्त मान-सम्मान सभी को आकर्षित करता था और स्वाभाविक रूप से आस-पड़ोस के लोग ब्राह्मण के पुत्र को ब्राह्मण ही पुकारते थे क्योंकि वह पुत्र भी अपने माता-पिता की तरह ही विश्वसनीय व कर्त्तव्यनिष्ठ होगा यही धारणा होती थी | लेकिन यही मान्यता आगे चलकर घातक सिद्ध हुई

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