मैं साक्षरता के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही विरुद्ध हूँ धार्मिकता के | साक्षर होना चाहिए हर इंसान को और धार्मिक भी | लेकिन न तो किताबी विद्वानों बने रहना लाभदायक है और नहीं किताबी धार्मिक बने से कोई भला होने वाला है

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स्वयं की उपेक्षा मत कीजिए::: स्वयं ही स्वयं का आदर कीजिए ::::दूसरों के साथ भी प्रेमपूर्ण बर्ताव कीजिए

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आपसे कहा जाता है कि जो पूर्वजों ने अपने अनुभवों से लिखा या कहा वही सही है और आप अपने अनुभवों से जो कुछ भी जानते समझते हैं वह गलत | इसका अर्थ तो यह हुआ कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान व विद्वान थे ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि उन्होंने जितना जाना, समझा, उससे आगे की यात्रा हमने की ही नहीं, उन प्राचीनकालीन विद्वानों के लेवल तक भी नहीं उठ पाए, बल्कि उस लेवल पर ही टिके रह गये, जिस लेवल के लोगों को वे विद्वान समझा रहे थे ?

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क्या आप किसी ऐसे धर्म या सम्प्रदाय का सहयोग करते हैं जो अपने सम्प्रदाय के लोगों को अत्याचार, शोषण व भुखमरी से बचाता हो ?

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अब समस्या यह हो जाती है कि लोग कहते हैं कि यदि ईश्वर आपके साथ है, आपके ही भीतर है तो कोई चमत्कार दिखाओ, या फिर कोई प्रमाण दिखाओ जिससे हमें विश्वास हो जाए कि आप सही कह रहे हो

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मुझे क्षमा करें, मुझसे बिलकुल भी अपेक्षा न रखें कि मैं इन नेताओं, अधिकारीयों, धर्म व जाति के ठेकेदारों या कूपमंडूक धार्मिकों सभ्य लोगों की तरह भला व सदाचारी, परोपकारी बन जाऊं

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द्रोणाचार्य, भीष्म के शिष्य कौरव भी थे और पांडव भी । लेकिन दोनों ही पक्ष ने शिक्षा अपनी अपनी योग्यतानुसार ही प्राप्त की । वास्तव में गुरु आपको वह सिखाता है, जो शिक्षक, अध्यापक, टीचर, ट्यूटर नहीं सिखा पाते । गुरु आपको किताबी ज्ञान या…

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अपना नेता यह देखकर मत चुनिए कि वह नौलखा सूट पहनता है, तीसहज़ारी सब्जी खाता है, सवा लाख के पेन से सिग्नेचर करता है……बल्कि यह देखकर चुनिए कि उसमें न्याय करने की योग्यता है या नहीं

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बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन…

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संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को…

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