मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि समाज जिसे न्याय समझता है वह न्याय नहीं है | धर्म और न्याय दोनों के ही वास्तविक परिभाषाओं को तिरोहित करके समाज ने नई ही परिभाषाएं गढ़ ली हैं इनकी | उदाहरण के लिए सम्प्रदायों, परम्पराओं, मान्यताओं को धर्म कहा…

दैत्य, दानव, पिशाच आदि उन्हें कहा जाता है, जिनके पास असीम शक्तियाँ होती हैं | अर्थात सत्ता और पुलिस जिनके सामने नतमस्तक रहती है

राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के भक्त और अनुयायी नहीं होते, केवल समर्थक होते हैं, चापलूस होते हैं, चाटुकार होते हैं |

जब तक राम-मंदिर नहीं बन जाता, यह देश इसी प्रकार गरीबी में जियेगा क्योंकि राम जी बहुत नाराज हैं मंदिर नहीं बनने से

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मैं यहाँ आपको भुत-प्रेत वशीकरण या उनके चमत्कारिक किस्से कहानियाँ नहीं सुनाने जा रहा | इन सबके लिए तो ढेर सारी पुस्तकें हैं, धार्मिक ग्रन्थ हैं, हदीसें हैं, पुराण हैं…..

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पढ़े-लिखों ने जितनी क्षति सृष्टि को पहुंचाई है विकास के नाम पर, उतनी किसी भी जीव जंतु या आदिवासियों ने नहीं पहुँचाई |

अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है |

धर्म और जाति के आधार पर जो भेदभाव हैं, उन्हें दूर करने में धर्म गुरु और धार्मिक ग्रन्थ पुर्णतः असफल हो चुके हैं

पिछले कुछ वर्षों से देख रहा हूँ कि समाज घृणा व द्वेष में ऐसा डूबा कि होश ही खो बैठा | ऊपर से सोशल मिडिया ने और बर्बाद कर दिया

रिलीजन कभी भी धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्येक रिलीजन में भले और बुरे लोग होते हैं | रिलिजन केवल मिश्रित समूह है भयभीत व स्वार्थी अच्छे व बुरे लोगों का |

सभी मत-मान्यताओं, कर्मकांडों, रहन-सहन, ईष्टों और आराध्यों से मिलकर जो धर्म बना वही हिन्दू धर्म कहलाया और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिन नियमों और धर्मों को अपनाकर सहजता से आपसी समन्वय बनाये हुए हैं, उसे हम सनातन के नाम से जानते हैं |